आसान से टोटके जो आपकी विदेश यात्रा करवा सकते हैं

हर व्यक्ति विदेश की यात्रा करना चाहता है और मान-सम्मान को प्राप्त करना चाहता है लेकिन कुंडली के कुछ ग्रह ऐसे होते हैं जो व्यक्ति को विदेश जाने से रोकते रहते हैं.
तो अगर आपको विदेश जाने में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है या विदेश जाने की आप आप सोच रहे हैं और मुमकिन नहीं हो रहा है तो आज हम आपको 10 विदेश जाने के टोटके बताने वाले हैं जिनकी मदद से आपका यह सपना पूरा हो सकता है-

1. चमेली हरश्रृंगार या किसी भी सफ़ेद फूल को 6 लौंग और एक टुकड़े कपूर के साथ

रुपदेवी सर्वभूतेषु विद्यारुपेण संस्तिथा नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नम:

पढ़ते हुए 54 आहुतियाँ नित्य माँ दुर्गा के सामने देने से आपके विदेश जाने के योग खुलने लगते हैं.

2. मंगलवार और शनिवार के दिन आप हनुमान जी पर चोला चढायें और मंदिर के पंडित से बात करके हनुमान जी पर लगने वाला सिंदूर भी आप लेकर जाये. हनुमान मंदिर में चोला चढाने के बाद मंदिर में ही कम से कम 11 बार हनुमान चालीसा पढ़े. आपको इस कार्य से कुछ ही दिनों में लाभ मिलेगा.

3. एक नारियल लें और पहले उसे घर के मंदिर में कुछ दिन रखा रहने दें और कुछ दिन बाद उसे अपने सर से ऊपर सात बार उतारने के बाद, इस नारियल को मंदिर में ले जायें. मंदिर में भगवान के सामने अपनी विदेश यात्रा की इच्छा जाहिर करें और नारियल को फोड़ दें. आपको निश्चित रूप से लाभ होगा.

4. सफ़ेद कपड़े में पांच लाल फूल, एक चांदी का छोटा सा टुकड़ा लें, गुड़ और चावल लें और इसकी पोटली बना लें. इसके बाद कम से कम 108 बार गायत्री मन्त्र का जाप करें. मन्त्र के अंत में अपनी इच्छा को जाहिर करें और इस सफ़ेद कपड़े की पोटली को नदी के बहते पानी में प्रवाहित कर दें.

5. जो व्यक्ति विदेश यात्रा करके आया है, उस व्यक्ति से उसका रुमाल लें और उसको अपने साथ रखा करें. ध्यान रहे कि यह कपड़ा उपयोग नहीं करना है, बस आप इसको अपने साथ रखें.

6. सफेद तिल और थोड़ा गुड़ लें. सूर्यास्त के समय एक मिट्टी के कुल्हड़ में डालकर उस कुल्हड़ को पीपल के एक स्वयं गिरे हुये पत्ते से ढक लें. ध्यान रखें कि आते समय पीछे मुड़कर न देखें. घर में आकर स्नान जरूर कर लें. नहाने के पानी में थोड़ा सा शुद्ध केसर मिला लें. ऐसा हर माह एक बार करें, जब तक विदेश यात्रा ना हो जाये.

7. हर बुधवार को भगवान गणेश को लड्डू का भोग लगायें और गणेश जी की आरती रोज करे. गणेश जी से अपनी समस्या बतायें. आपको महीने भर में लाभ होगा.

8. हल्दी की सात गांठे और इसी तरह से गुड़ की सात गाठें, इनको एक छोटी सी पोटली में बांध लें और किसी रेलवे क्रोसिंग पर जाकर फ़ेंक दें.

9. भगवान शिव को अलग-अलग तरह के 12 फल, हर सोमवार को अर्पित करते रहें और ॐ नमः शिवाय का जाप करें, विदेश जाने के योग बनने लगेंगे.

तो ये थे विदेश जाने के टोटके – इन आसान टोटकों का उपाय करके, व्यक्ति विदेश जाने के योगों को उत्पन्न करा सकता है.

astrologyofmylfie

What is astrology all about?

The question might seem trivial in nature but astrology has been mired in controversy and confusion since its advent. People believe it, people deride it and there is even large number of people who accept astrology. People with great affiliation with sun signs assume that it is somehow similar to other psychic disciplines. However, the truth is astrology is quite different as it is very different from all these disciplines. Astrology is primarily concerned the planets, the sun, the moon, asteroids and comets and stellar bodies outside the solar system. In more methodical sense it is the science of studying celestial bodies and how what is their effect on human life. Did you ever think why when their is a Full Moon people are angry and there are more cases of road rage? Is this mere coincidence? No, not at all. Many famous people have contributed in astrology such as Pythagoras and Sir Isaac Newton were astrologers. The Bible is filled with astrological information. Surprisingly, Christ had 12 disciples and their were 12 tribes of Israel associated with the 12 signs of the zodiac.

Astrology of My Life

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शिव चालीसा

॥दोहा॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान। कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

॥चौपाई॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे॥
मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद माहि महिमा तुम गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥
कीन्ही दया तहं करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनन्त अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै। भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। येहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट ते मोहि आन उबारो॥
मात-पिता भ्राता सब होई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु मम संकट भारी॥
धन निर्धन को देत सदा हीं। जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं॥
नमो नमो जय नमः शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है शम्भु सहाई॥
ॠनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र होन कर इच्छा जोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा। ताके तन नहीं रहै कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्त धाम शिवपुर में पावे॥
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

॥दोहा॥
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा। तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान। अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

श्री दुर्गा चालीसा

नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूँ लोक फैली उजियारी॥
शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥
रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥1॥

तुम संसार शक्ति लै कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥
प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥2॥

रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा। परगट भई फाड़कर खम्बा॥
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो। हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥3॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥
मातंगी अरु धूमावति माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥
श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥4॥

केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥
कर में खप्पर खड्ग विराजै ।जाको देख काल डर भाजै॥
सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥
नगरकोट में तुम्हीं विराजत। तिहुँलोक में डंका बाजत॥5॥

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥
रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥
परी गाढ़ सन्तन र जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥6॥

अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नरनारी॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावें। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्ममरण ताकौ छुटि जाई॥7॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥
शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥
शक्ति रूप का मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥8॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥
आशा तृष्णा निपट सतावें। मोह मदादिक सब बिनशावें॥9॥

शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥
करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धिसिद्धि दै करहु निहाला॥
जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ । तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ ॥
श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥10॥

देवीदास शरण निज जानी। कहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

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