September Archives - Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India https://www.astrologyofmylife.com/category/blog-post-2018/september/ Best Astrologer and Vastu Consultant at Pitampura Delhi - Acharya Dr. MSD Arya, Astrologer, Numerologist, Vastu Consultant, Gems Suggestions, best vastu consultant, moksha mukti, Best Astrologer, Astrology, Lal Kitab, Numerology, Horoscope, Matchmaking Astrologer, Astro SHop, Acharya Arya, Astro Arya, Astro arjuna, BlackMagic, hindu Panchang, Rashifal, Love, vashikaran, Thantrik, Raghava Bhatt, Moksha Mukti Jyotish and vastu Sansthan Delhi INdia Fri, 22 Sep 2023 06:59:06 +0000 en-GB hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0.2 https://www.astrologyofmylife.com/wp-content/uploads/2024/02/cropped-Moksha-Mukti-logo-latest-32x32.png September Archives - Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India https://www.astrologyofmylife.com/category/blog-post-2018/september/ 32 32 शादी मे बाधक योग ( Problems in Marital Life ) https://www.astrologyofmylife.com/problems-in-marital-life/ https://www.astrologyofmylife.com/problems-in-marital-life/#respond Fri, 28 Sep 2018 17:25:30 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=2791 शादी_मे_बाधक_योग ( Problems in Marital Life ) वैवाहिक समस्या पर एक पोस्ट मे जितना उचित है उतना लिख सकते हैं पर ज्योतिष का हर योग लिख देना असम्भव है । विवाह_बाधक_योगो_पर_शुभ_प्रभाव – विवाह बाधक योग के होने पर भी यदि शादी के 7 भाव पर 2,4,5,9,11 के स्वामियों का अच्छा प्रभाव हो,गुरु की दृष्टि आदि …
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शादी_मे_बाधक_योग ( Problems in Marital Life )

वैवाहिक समस्या पर एक पोस्ट मे जितना उचित है उतना लिख सकते हैं पर ज्योतिष का हर योग लिख देना असम्भव है ।

विवाह_बाधक_योगो_पर_शुभ_प्रभाव – विवाह बाधक योग के होने पर भी यदि शादी के 7 भाव पर 2,4,5,9,11 के स्वामियों का अच्छा प्रभाव हो,गुरु की दृष्टि आदि हो तो शादी की समस्याओं मे कमी आ जाती है
For example – 5 का स्वामी 7 मे हो यह एक शुभ राजयोग है ।

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जन्म कुंडली में विवाहयोग के लिये ये चीजें देखना जरूरी है –

सप्तम भाव की स्थिति ।

सप्तम भाव के स्वामी की स्थिति

सप्तम भाव पर दृष्टि डालने वाले ग्रह

सप्तम भाव मे बैठे ग्रहों की स्थिति, उनका भावाधिकार

महिला और पुरुषों के दोनो के लिये शुक्र और बृहस्पति की स्थिति ।

Married Life Report

यदि इन चीजों मे कोई समस्या होती है तो विवाह बाधा, विवाह मे देरी, विवाह टूटना, कष्ट बन सकता है ।

उदाहरण के लिये निम्नांकित विवाह बाधक योगों को समझें –

सप्तमेश_छठवें_का सम्बंध – सप्तम मे 6 का स्वामी हो या 7 का स्वामी 6th मे चला जाये तो जीवनसाथी स्वयं का नुकसान करेगा,आपको चिंता देगा या फिर आपके विवाह की ही हानि हो जायेगी, या विवाह होने मे कई समस्या, दूरी, शादी मे देर होना होगा।

सप्तमेश_अष्टम_बारह से सम्बंध – for Example – सप्तमेश यदि 8 मे बैठा हो और 12 का स्वामी 7 मे आ गया हो तो ये योग साथी के साथ दूरी, अकेलापन, शारीरिक हानि को दर्शाता है ।

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सप्तमेश_नीच_राशि – मे हो , नीच भंग नहो,शुभ परिवर्तन योग न हो, बृहस्पति आदि शुभ ग्रहों की दृष्टि न मिल रही हो तो वैवाहिक सुख मे आनंद की कमी हो जाती है ।

शुक्र_कन्या राशि मे – ये एक बाधक योग है यदि शुक्र का नीचभंग न हो रहा हो तो ।

मंगली_योग – भी देखना जरुरी है यदि मंगल की दृष्टि सप्तम पर है या मंगल 7th मे है और इसके साथ ही मंगल_की_राशि_7_मे_नही_है तो उग्रता बढ जाने से सुख मे दिक्कत करता है ।
यदि सप्तम मे मेष या वृश्चिक राशि हो तो मंगल ऐसी समस्या देकर विवाह को कभी नही तोड़ेगा बल्कि मंगल_ही_विवाह_करायेगा

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शुक्र_अस्त – नही होना चाहिये ,अस्त गुरु परिवार के लिये अच्छा नही माना जाता ,
वर – वधू की कुंडली मे उनके सप्तम भाव का स्वामी भी अस्त नही होना चाहिये ।

शनि_का_प्रभाव – शनि शादी को स्थिरता और सावधानी देता है , शादी तोड़ता नही है पर यह  देरी का कारक है !
जिनकी कुंडली मे शनि का प्रभाव, स्थिति, दृष्टि , योग सप्तम भाव, सप्तमेश, या शुक्र ग्रह पर हो उनके विवाह मे देरी होती है ।
30,32,35 जैसी उम्र मे शादी होती देखी गयी है।

Prashna Kundli by Acharya Arya

पाप_ग्रहों_का_प्रभाव – 7th पर राहू,केतू,सूर्य,मंगल,शनि ये 5 ग्रह विवाह मे कठोरता का व्यवहार देते हैं जिससे संबंध खराब होते है इसलिये इनकी शांति करवानी चाहिये ।

इन योगो लग्न के अलावा नवांश कुंडली से भी देखें।

http://www.astrologyofmylife.com/car-numbercolour-numerology/

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श्राद्ध में ‘क्या करें’ और ‘क्या न करें’ (Pitra Paksha) https://www.astrologyofmylife.com/do-what-and-do-not-do-in-shraddha-pitra-paksha/ https://www.astrologyofmylife.com/do-what-and-do-not-do-in-shraddha-pitra-paksha/#respond Fri, 28 Sep 2018 16:51:58 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=2786 श्राद्ध में ‘क्या करें’ और ‘क्या न करें’ पितरों के कार्य में बहुत सावधानी रखनी चाहिए, अत: श्राद्ध में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए- ▪️वर्ष में दो बार श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। जिस तिथि पर व्यक्ति की मृत्यु होती है, उस तिथि पर वार्षिक श्राद्ध करना चाहिए। पितृपक्ष में मृत व्यक्ति की जो तिथि …
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श्राद्ध में ‘क्या करें’ और ‘क्या न करें’

पितरों के कार्य में बहुत सावधानी रखनी चाहिए, अत: श्राद्ध में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए-

▪वर्ष में दो बार श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। जिस तिथि पर व्यक्ति की मृत्यु होती है, उस तिथि पर वार्षिक श्राद्ध करना चाहिए। पितृपक्ष में मृत व्यक्ति की जो तिथि आए, उस तिथि पर मुख्यरूप से पार्वणश्राद्ध करने का विधान है।

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▪मनु ने श्राद्ध में तीन चीजों को अत्यन्त पवित्र कहा है-

कुतप मुहूर्त (दोपहर के बाद कुल 24 मिनट का समय)-ब्रह्माजी ने पितरों को अपराह्नकाल दिया है। असमय में दिया गया अन्न पितरों तक नहीं पहुंचता है। सायंकाल में दिया हुआ कव्य राक्षस का भाग हो जाता है।तिल, श्राद्ध की जगह पर तिल बिखेर देने से वह स्थान शुद्ध व पवित्र हो जाता है।दौहित्र (लड़की का पुत्र)।

▪पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए। पुत्र न हो तो पत्नी कर सकती है।

▪श्राद्ध में पवित्रता का बहुत महत्व है। पितृकार्य में वाक्य और कार्य की शुद्धता बहुत जरुरी है और इसे बहुत सावधानी से करना चाहिए।

▪श्राद्धकर्ता को क्रोध, कलह व जल्दबाजी नही करनी चाहिए।

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▪श्राद्धकर्म करने वाले को पितृपक्ष में पूरे पन्द्रह दिन क्षौरकार्य (दाढ़ी-मूंछ बनाना, नाखून काटना) नहीं करना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

▪श्राद्ध में सात्विक अन्न-फलों का प्रयोग करने से पितरों को सबसे अधिक तृप्ति मिलती है। काला उड़द, तिल, जौ, सांवा चावल, गेहूँ, दूध, दूध के बने सभी पदार्थ, मधु, चीनी, कपूर, बेल, आंवला, अंगूर, कटहल, अनार, अखरोट, कसेरु, नारियल, तेन्द, खजूर, नारंगी, बेर, सुपारी, अदरक, जामुन, परवल, गुड़, मखाना, नीबू आदि अच्छे माने जाते हैं।

▪कोदो, चना, मसूर, कुलथी, सत्तू, काला जीरा, टेंटी, कचनार, कैथ, खीरा, लौकी, पेठा, सरसों, काला नमक व कोई भी बासी, गला-सड़ा, कच्चा व अपवित्र फल और अन्न श्राद्ध में प्रयोग नहीं करना चाहिए।

▪श्राद्ध-कर्म में इन फूलों का प्रयोग नहीं करना चाहिए-कदम्ब, केवड़ा, बेलपत्र, कनेर, मौलसिरी, लाल व काले रंग के पुष्प और तेज गंध वाले पुष्प। इन पुष्पों को देखकर पितरगण निराश होकर लौट जाते हैं।

Prashna Kundli by Acharya Arya

▪श्राद्ध में अधिक ब्राह्मणों को निमन्त्रण नहीं देना चाहिए। पितृकार्य में एक या तीन ब्राह्मण पर्याप्त होते हैं। ज्यादा ब्राह्मणों को निमन्त्रण देकर यदि उनके आदर-सत्कार में कोई कमी रह जाए तो वह अकल्याणकारी हो सकता है।

▪श्राद्ध के लिए उत्तम ब्राह्मण को निमन्त्रित करना चाहिए जो योगी, वैष्णव, वेद-पुरान का ज्ञाता, विद्या, शील व तीन पीढ़ी से ब्राह्मणकर्म करने वाला व शान्त स्वभाव का हो। श्राद्ध में केवल अपने मित्रों और गोत्र वालों को खिलाकर ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए।

▪अंगहीन, रोगी, कोढ़ी, धूर्त, चोर, नास्तिक, ज्योतिषी, मूर्ख, नौकर, काना, लंगड़ा, जुआरी, अंधा, कुश्ती सिखाने वाले व मुर्दा जलाने वाले ब्राह्मण को श्राद्ध-भोजन के लिए नहीं बुलाना चाहिए।

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▪श्राद्ध में निमन्त्रित ब्राह्मण को आदर से बैठाकर पाद-प्रक्षालन (पैर धोना) चाहिए।

▪श्राद्धकर्ता हाथ में पवित्री (कुशा से बनाई गई अंगूठी) धारण किए रहे।

▪ब्राह्मण-भोजन से श्राद्ध की सम्पन्नता-ब्राह्मणों को भोजन कराने से वह पितरों को प्राप्त हो जाता है। मृत व्यक्तियों की तिथियों पर केवल ब्राह्मण-भोजन कराने की परम्परा है। किसी कारणवश ब्राह्मण-भोजन न करा सकें तो मन में संकल्प करके केवल सूखे अन्न, घी, चीनी, नमक आदि वस्तुओं को श्राद्ध-भोजन के निमित्त किसी ब्राह्मण को दे दें। यदि इतना भी न कर सकें तो कम-से-कम दो ग्रास निकालकर गाय को श्राद्ध के निमित्त खिला देना चाहिए।

Gemstone Suggestion

▪श्राद्ध में हविष्यान्न के दान से एक मास तक और खीर के दान से एक वर्ष तक पितरों की तृप्ति बनी रहती है।

▪यदि कुछ भी न बन सके तो केवल घास ले आकर पितरों की तृप्ति के निमित्त से गौओं को अर्पित करे या जल और तिल से पितरों का तर्पण करे।

▪यदि पत्नी रजस्वला है तो ब्राह्मण को केवल दक्षिणा देकर श्राद्ध-कर्म करे।

▪तुलसी से पिण्डार्चन करने पर पितरगण प्रलयपर्यन्त तृप्त रहते हैं।

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▪भोजन करते समय ब्राह्मणों से ‘भोजन कैसा बना है?’ यह नहीं पूछना चाहिए; इससे पितर अप्रसन्न होकर चले जाते हैं।

▪श्राद्ध में भोजन करने व कराने वाले को मौन रहना चाहिए। यदि कोई ब्राह्मण उस समय हंसता या बात करता है तो वह हविष्य राक्षस का भाग हो जाता है।

▪श्राद्ध-कर्म में ताम्रपात्र का बहुत महत्व है। परन्तु लोहे के पात्र का उपयोग नहीं करना चाहिए। केवल रसोई में फल, सब्जी काटने के लिए उनका प्रयोग कर सकते हैं।

▪श्राद्ध में भोजन कराने के लिए चांदी, तांबे और कांसे के बर्तन उत्तम माने जाते है। इन बर्तनों के अभाव में पत्तलों में भोजन कराना चाहिए किन्तु केले के पत्ते पर श्राद्धभोजन नहीं कराना चाहिए।

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▪श्राद्ध की रात्रि में यजमान और ब्राह्मण दोनों को ब्रह्मचारी रहना चाहिए।

पितरों से क्या मांगना चाहिए?

महर्षि वेदव्यास ने ‘पितरों से क्या-क्या मांगना चाहिए’ का बहुत ही सुन्दर वर्णन किया है। श्राद्ध के अंत में पितररूप ब्राह्मणों से यह आशीर्वाद मांगना चाहिए-

दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदा: सन्ततिरव च।
श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहुदेयं च नोऽस्त्विति।। (अग्निपुराण)

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अर्थात्-‘पितरगण आप ऐसा आशीर्वाद प्रदान करें कि हमारे कुल में दान देने वाले दाताओं की वृद्धि हो, नित्य वेद और पुराण का स्वाध्याय करने वालों की वृद्धि हो, हमारी संतान-परम्परा लगातार बढ़ती रहे, सत्कर्म करने में हमारी श्रद्धा कम न हो और हमारे पास दान देने के लिए बहुत-सा धन-वैभव हो।

 

Kaal Sarp Dosh

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Where did Shriram stay during the fourteen years of exile ? https://www.astrologyofmylife.com/where-did-shriram-stay-during-the-fourteen-years-of-exile/ https://www.astrologyofmylife.com/where-did-shriram-stay-during-the-fourteen-years-of-exile/#respond Fri, 28 Sep 2018 16:30:57 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=2780 चौदह वर्ष के वनवास के दौरान श्रीराम कहाँ कहाँ रहे? प्रभु श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास हुआ। इस वनवास काल में श्रीराम ने कई ऋषि-मुनियों से शिक्षा और विद्या ग्रहण की, तपस्या की और भारत के आदिवासी, वनवासी और तमाम तरह के भारतीय समाज को संगठित कर उन्हें धर्म के मार्ग पर चलाया। संपूर्ण …
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चौदह वर्ष के वनवास के दौरान श्रीराम कहाँ कहाँ रहे?

प्रभु श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास हुआ। इस वनवास काल में श्रीराम ने कई ऋषि-मुनियों से शिक्षा और विद्या ग्रहण की, तपस्या की और भारत के आदिवासी, वनवासी और तमाम तरह के भारतीय समाज को संगठित कर उन्हें धर्म के मार्ग पर चलाया। संपूर्ण भारत को उन्होंने एक ही विचारधारा के सूत्र में बांधा, लेकिन इस दौरान उनके साथ कुछ ऐसा भी घटा जिसने उनके जीवन को बदल कर रख दिया।
जाने-माने इतिहासकार और पुरातत्वशास्त्र
ी अनुसंधानकर्ता डॉ. राम अवतार ने श्रीराम और सीता के जीवन की घटनाओं से जुड़े ऐसे 200 से भी अधिक स्थानों का पता लगाया है, जहां आज भी तत्संबंधी स्मारक स्थल विद्यमान हैं, जहां श्रीराम और सीता रुके या रहे थे। वहां के स्मारकों, भित्तिचित्रों, गुफाओं आदि स्थानों के समय-काल की जांच-पड़ताल वैज्ञानिक तरीकों से की। आओ जानते हैं कुछ प्रमुख स्थानों के बारे में;

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1. श्रृंगवेरपुर: – राम को जब वनवास हुआ तो वाल्मीकि रामायण और शोधकर्ताओं के अनुसार वे सबसे पहले तमसा नदी पहुंचे, जो अयोध्या से 20 किमी दूर है। इसके बाद उन्होंने गोमती नदी पार की और प्रयागराज (इलाहाबाद) से 20-22 किलोमीटर दूर वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो निषादराज गुह का राज्य था। यहीं पर गंगा के तट पर उन्होंने केवट से गंगा पार करने को कहा था।

2. सिंगरौर: – इलाहाबाद से लगभग 35.2 किमी उत्तर-पश्चिम की ओर स्थित ‘सिंगरौर’ नामक स्थान ही प्राचीन समय में श्रृंगवेरपुर नाम से परिज्ञात था। रामायण में इस नगर का उल्लेख आता है। यह नगर गंगा घाटी के तट पर स्थित था। महाभारत में इसे ‘तीर्थस्थल’ कहा गया है।

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3. कुरई: – इलाहाबाद जिले में ही कुरई नामक एक स्थान है, जो सिंगरौर के निकट गंगा नदी के तट पर स्थित है। गंगा के उस पार सिंगरौर तो इस पार कुरई। सिंगरौर में गंगा पार करने के पश्चात श्रीराम इसी स्थान पर उतरे थे।
इस ग्राम में एक छोटा-सा मंदिर है, जो स्थानीय लोकश्रुति के अनुसार उसी स्थान पर है, जहां गंगा को पार करने के पश्चात राम, लक्ष्मण और सीताजी ने कुछ देर विश्राम किया था।

4. चित्रकूट के घाट पर: – कुरई से आगे चलकर श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सहित प्रयाग पहुंचे थे। प्रयाग को वर्तमान में इलाहाबाद कहा जाता है। यहां गंगा-जमुना का संगम स्थल है। हिन्दुओं का यह सबसे बड़ा तीर्थस्थान है। प्रभु श्रीराम ने संगम के समीप यमुना नदी को पार किया और फिर पहुंच गए चित्रकूट। यहां स्थित स्मारकों में शामिल हैं, वाल्मीकि आश्रम, मांडव्य आश्रम, भरतकूप इत्यादि।

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चित्रकूट में श्रीराम के दुर्लभ प्रमाण,,चित्रकूट वह स्थान है, जहां राम को मनाने के लिए भरत अपनी सेना के साथ पहुंचते हैं। तब जब दशरथ का देहांत हो जाता है। भारत यहां से राम की चरण पादुका ले जाकर उनकी चरण पादुका रखकर राज्य करते हैं।

5. अत्रि ऋषि का आश्रम: – चित्रकूट के पास ही सतना मध्यप्रदेश स्थित अत्रि ऋषि का आश्रम था। महर्षि अत्रि चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे। वहां श्रीराम ने कुछ वक्त बिताया। अत्रि ऋषि ऋग्वेद के पंचम मंडल के द्रष्टा हैं। अत्रि ऋषि की पत्नी का नाम है अनुसूइया, जो दक्ष प्रजापति की चौबीस कन्याओं में से एक थी।
अत्रि पत्नी अनुसूइया के तपोबल से ही भगीरथी गंगा की एक पवित्र धारा चित्रकूट में प्रविष्ट हुई और ‘मंदाकिनी’ नाम से प्रसिद्ध हुई। ब्रह्मा, विष्णु व महेश ने अनसूइया के सतीत्व की परीक्षा ली थी, लेकिन तीनों को उन्होंने अपने तपोबल से बालक बना दिया था। तब तीनों देवियों की प्रार्थना के बाद ही तीनों देवता बाल रूप से मुक्त हो पाए थे। फिर तीनों देवताओं के वरदान से उन्हें एक पुत्र मिला, जो थे महायोगी ‘दत्तात्रेय’। अत्रि ऋषि के दूसरे पुत्र का नाम था ‘दुर्वासा’। दुर्वासा ऋषि को कौन नहीं जानता?
अत्रि के आश्रम के आस-पास राक्षसों का समूह रहता था। अत्रि, उनके भक्तगण व माता अनुसूइया उन राक्षसों से भयभीत रहते थे। भगवान श्रीराम ने उन राक्षसों का वध किया। वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में इसका वर्णन मिलता है।
प्रातःकाल जब राम आश्रम से विदा होने लगे तो अत्रि ऋषि उन्हें विदा करते हुए बोले, ‘हे राघव! इन वनों में भयंकर राक्षस तथा सर्प निवास करते हैं, जो मनुष्यों को नाना प्रकार के कष्ट देते हैं। इनके कारण अनेक तपस्वियों को असमय ही काल का ग्रास बनना पड़ा है। मैं चाहता हूं, तुम इनका विनाश करके तपस्वियों की रक्षा करो।’
राम ने महर्षि की आज्ञा को शिरोधार्य कर उपद्रवी राक्षसों तथा मनुष्य का प्राणांत करने वाले भयानक सर्पों को नष्ट करने का वचन देखर सीता तथा लक्ष्मण के साथ आगे के लिए प्रस्थान किया।

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6. दंडकारण्य: – अत्रि ऋषि के आश्रम में कुछ दिन रुकने के बाद श्रीराम ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के घने जंगलों को अपना आश्रय स्थल बनाया। यह जंगल क्षेत्र था दंडकारण्य। ‘अत्रि-आश्रम’ से ‘दंडकारण्य’ आरंभ हो जाता है। छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों पर राम के नाना और कुछ पर बाणासुर का राज्य था। यहां के नदियों, पहाड़ों, सरोवरों एवं गुफाओं में राम के रहने के सबूतों की भरमार है। यहीं पर राम ने अपना वनवास काटा था। यहां वे लगभग 10 वर्षों से भी अधिक समय तक रहे थे।
‘अत्रि-आश्रम’ से भगवान राम मध्यप्रदेश के सतना पहुंचे, जहां ‘रामवन’ हैं। मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ क्षेत्रों में नर्मदा व महानदी नदियों के किनारे 10 वर्षों तक उन्होंने कई ऋषि आश्रमों का भ्रमण किया। दंडकारण्य क्षेत्र तथा सतना के आगे वे विराध सरभंग एवं सुतीक्ष्ण मुनि आश्रमों में गए। बाद में सतीक्ष्ण आश्रम वापस आए। पन्ना, रायपुर, बस्तर और जगदलपुर में कई स्मारक विद्यमान हैं। उदाहरणत: मांडव्य आश्रम, श्रृंगी आश्रम, राम-लक्ष्मण मंदिर आदि।
शहडोल (अमरकंटक): – राम वहां से आधुनिक जबलपुर, शहडोल (अमरकंटक) गए होंगे। शहडोल से पूर्वोत्तर की ओर सरगुजा क्षेत्र है। यहां एक पर्वत का नाम ‘रामगढ़’ है। 30 फीट की ऊंचाई से एक झरना जिस कुंड में गिरता है, उसे ‘सीता कुंड’ कहा जाता है। यहां वशिष्ठ गुफा है। दो गुफाओं के नाम ‘लक्ष्मण बोंगरा’ और ‘सीता बोंगरा’ हैं। शहडोल से दक्षिण-पूर्व की ओर बिलासपुर के आसपास छत्तीसगढ़ है।
वर्तमान में करीब 92,300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस इलाके के पश्चिम में अबूझमाड़ पहाड़ियां तथा पूर्व में इसकी सीमा पर पूर्वी घाट शामिल हैं। दंडकारण्य में छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आंध्रप्रदेश राज्यों के हिस्से शामिल हैं। इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण तक करीब 320 किमी तथा पूर्व से पश्चिम तक लगभग 480 किलोमीटर है।
दंडक राक्षस के कारण इसका नाम दंडकारण्य पड़ा। यहां रामायण काल में रावण के सहयोगी बाणासुर का राज्य था। उसका इन्द्रावती, महानदी और पूर्व समुद्र तट, गोइंदारी (गोदावरी) तट तक तथा अलीपुर, पारंदुली, किरंदुली, राजमहेन्द्री, कोयापुर, कोयानार, छिन्दक कोया तक राज्य था। वर्तमान बस्तर की ‘बारसूर’ नामक समृद्ध नगर की नींव बाणासुर ने डाली, जो इन्द्रावती नदी के तट पर था। यहीं पर उसने ग्राम देवी कोयतर मां की बेटी माता माय (खेरमाय) की स्थापना की। बाणासुर द्वारा स्थापित देवी दांत तोना (दंतेवाड़िन) है। यह क्षेत्र आजकल दंतेवाड़ा के नाम से जाना जाता है। यहां वर्तमान में गोंड जाति निवास करती है तथा समूचा दंडकारण्य अब नक्सलवाद की चपेट में है।
इसी दंडकारण्य का ही हिस्सा है आंध्रप्रदेश का एक शहर भद्राचलम। गोदावरी नदी के तट पर बसा यह शहर सीता-रामचंद्र मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर भद्रगिरि पर्वत पर है। कहा जाता है कि श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान कुछ दिन इस भद्रगिरि पर्वत पर ही बिताए थे।

Gemstone Suggestion

स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे। ऐसा माना जाता है कि दुनियाभर में सिर्फ यहीं पर जटायु का एकमात्र मंदिर है।
दंडकारण्य क्षेत्र की चर्चा पुराणों में विस्तार से मिलती है। इस क्षेत्र की उत्पत्ति कथा महर्षि अगस्त्य मुनि से जुड़ी हुई है। यहीं पर उनका महाराष्ट्र के नासिक के अलावा एक आश्रम था।

7. पंचवटी, नासिक: – दण्डकारण्य में मुनियों के आश्रमों में रहने के बाद श्रीराम कई नदियों, तालाबों, पर्वतों और वनों को पार करने के पश्चात नासिक में अगस्त्य मुनि के आश्रम गए। मुनि का आश्रम नासिक के पंचवटी क्षेत्र में था। त्रेतायुग में लक्ष्मण व सीता सहित श्रीरामजी ने वनवास का कुछ समय यहां बिताया।
उस काल में पंचवटी जनस्थान या दंडक वन के अंतर्गत आता था। पंचवटी या नासिक से गोदावरी का उद्गम स्थान त्र्यंम्बकेश्वर लगभग 32 किमी दूर है। वर्तमान में पंचवटी भारत के महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी के किनारे स्थित विख्यात धार्मिक तीर्थस्थान है।
अगस्त्य मुनि ने श्रीराम को अग्निशाला में बनाए गए शस्त्र भेंट किए। नासिक में श्रीराम पंचवटी में रहे और गोदावरी के तट पर स्नान-ध्यान किया। नासिक में गोदावरी के तट पर पांच वृक्षों का स्थान पंचवटी कहा जाता है। ये पांच वृक्ष थे- पीपल, बरगद, आंवला, बेल तथा अशोक वट। यहीं पर सीता माता की गुफा के पास पांच प्राचीन वृक्ष हैं जिन्हें पंचवट के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि इन वृक्षों को राम-सीमा और लक्ष्मण ने अपने हाथों से लगाया था।
यहीं पर लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी थी। राम-लक्ष्मण ने खर व दूषण के साथ युद्ध किया था। यहां पर मारीच वध स्थल का स्मारक भी अस्तित्व में है। नासिक क्षेत्र स्मारकों से भरा पड़ा है, जैसे कि सीता सरोवर, राम कुंड, त्र्यम्बकेश्वर आदि। यहां श्रीराम का बनाया हुआ एक मंदिर खंडहर रूप में विद्यमान है।
मरीच का वध पंचवटी के निकट ही मृगव्याधेश्वर में हुआ था। गिद्धराज जटायु से श्रीराम की मैत्री भी यहीं हुई थी। वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड में पंचवटी का मनोहर वर्णन मिलता है।

8. सीताहरण का स्थान सर्वतीर्थ: – नासिक क्षेत्र में शूर्पणखा, मारीच और खर व दूषण के वध के बाद ही रावण ने सीता का हरण किया और जटायु का भी वध किया जिसकी स्मृति नासिक से 56 किमी दूर ताकेड गांव में ‘सर्वतीर्थ’ नामक स्थान पर आज भी संरक्षित है।
जटायु की मृत्यु सर्वतीर्थ नाम के स्थान पर हुई, जो नासिक जिले के इगतपुरी तहसील के ताकेड गांव में मौजूद है। इस स्थान को सर्वतीर्थ इसलिए कहा गया, क्योंकि यहीं पर मरणासन्न जटायु ने सीता माता के बारे में बताया। रामजी ने यहां जटायु का अंतिम संस्कार करके पिता और जटायु का श्राद्ध-तर्पण किया था। इसी तीर्थ पर लक्ष्मण रेखा थी।

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9.पर्णशाला, भद्राचलम: – पर्णशाला आंध्रप्रदेश में खम्माम जिले के भद्राचलम में स्थित है। रामालय से लगभग 1 घंटे की दूरी पर स्थित पर्णशाला को ‘पनशाला’ या ‘पनसाला’ भी कहते हैं। हिन्दुओं के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से यह एक है। पर्णशाला गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहां से सीताजी का हरण हुआ था। हालांकि कुछ मानते हैं कि इस स्थान पर रावण ने अपना विमान उतारा था।
इस स्थल से ही रावण ने सीता को पुष्पक विमान में बिठाया था यानी सीताजी ने धरती यहां छोड़ी थी। इसी से वास्तविक हरण का स्थल यह माना जाता है। यहां पर राम-सीता का प्राचीन मंदिर है।

10. सीता की खोज तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र: – सर्वतीर्थ जहां जटायु का वध हुआ था, वह स्थान सीता की खोज का प्रथम स्थान था। उसके बाद श्रीराम-लक्ष्मण तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र में पहुंच गए। तुंगभद्रा एवं कावेरी नदी क्षेत्रों के अनेक स्थलों पर वे सीता की खोज में गए।

11. शबरी का आश्रम पम्पा सरोवर: – तुंगभद्रा और कावेरी नदी को पार करते हुए राम और लक्ष्मण चले सीता की खोज में। जटायु और कबंध से मिलने के पश्चात वे ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे। रास्ते में वे पम्पा नदी के पास शबरी आश्रम भी गए, जो आजकल केरल में स्थित है।
पम्पा नदी भारत के केरल राज्य की तीसरी सबसे बड़ी नदी है। इसे ‘पम्बा’ नाम से भी जाना जाता है। ‘पम्पा’ तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है। श्रावणकौर रजवाड़े की सबसे लंबी नदी है। इसी नदी के किनारे पर हम्पी बसा हुआ है। यह स्थान बेर के वृक्षों के लिए आज भी प्रसिद्ध है। पौराणिक ग्रंथ ‘रामायण’ में भी हम्पी का उल्लेख वानर राज्य किष्किंधा की राजधानी के तौर पर किया गया है।

12. हनुमान से भेंट: – मलय पर्वत और चंदन वनों को पार करते हुए वे ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़े। यहां उन्होंने हनुमान और सुग्रीव से भेंट की, सीता के आभूषणों को देखा और श्रीराम ने बाली का वध किया।
ऋष्यमूक पर्वत वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानरों की राजधानी किष्किंधा के निकट स्थित था। इसी पर्वत पर श्रीराम की हनुमान से भेंट हुई थी। बाद में हनुमान ने राम और सुग्रीव की भेंट करवाई, जो एक अटूट मित्रता बन गई। जब महाबली बाली अपने भाई सुग्रीव को मारकर किष्किंधा से भागा तो वह ऋष्यमूक पर्वत पर ही आकर छिपकर रहने लगा था।
ऋष्यमूक पर्वत तथा किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है। विरुपाक्ष मंदिर के पास से ऋष्यमूक पर्वत तक के लिए मार्ग जाता है। यहां तुंगभद्रा नदी (पम्पा) धनुष के आकार में बहती है। तुंगभद्रा नदी में पौराणिक चक्रतीर्थ माना गया है। पास ही पहाड़ी के नीचे श्रीराम मंदिर है। पास की पहाड़ी को ‘मतंग पर्वत’ माना जाता है। इसी पर्वत पर मतंग ऋषि का आश्रम था।

13. कोडीकरई: – हनुमान और सुग्रीव से मिलने के बाद श्रीराम ने अपनी सेना का गठन किया और लंका की ओर चल पड़े। मलय पर्वत, चंदन वन, अनेक नदियों, झरनों तथा वन-वाटिकाओं को पार करके राम और उनकी सेना ने समुद्र की ओर प्रस्थान किया। श्रीराम ने पहले अपनी सेना को कोडीकरई में एकत्रित किया।
तमिलनाडु की एक लंबी तटरेखा है, जो लगभग 1,000 किमी तक विस्तारित है। कोडीकरई समुद्र तट वेलांकनी के दक्षिण में स्थित है, जो पूर्व में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में पाल्क स्ट्रेट से घिरा हुआ है।
लेकिन राम की सेना ने उस स्थान के सर्वेक्षण के बाद जाना कि यहां से समुद्र को पार नहीं किया जा सकता और यह स्थान पुल बनाने के लिए उचित भी नहीं है, तब श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम की ओर कूच किया।

14.रामेश्वरम: – रामेश्वरम समुद्र तट एक शांत समुद्र तट है और यहां का छिछला पानी तैरने और सन बेदिंग के लिए आदर्श है। रामेश्वरम प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केंद्र है। महाकाव्य रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के पहले यहां भगवान शिव की पूजा की थी। रामेश्वरम का शिवलिंग श्रीराम द्वारा स्थापित शिवलिंग है।

Horoscope

15.धनुषकोडी: : – वाल्मीकि के अनुसार तीन दिन की खोजबीन के बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्र में वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो। उन्होंने नल और नील की मदद से उक्त स्थान से लंका तक का पुनर्निर्माण करने का फैसला लिया।
छेदुकराई तथा रामेश्वरम के इर्द-गिर्द इस घटना से संबंधित अनेक स्मृतिचिह्न अभी भी मौजूद हैं। नाविक रामेश्वरम में धनुषकोडी नामक स्थान से यात्रियों को रामसेतु के अवशेषों को दिखाने ले जाते हैं।
धनुषकोडी भारत के तमिलनाडु राज्य के पूर्वी तट पर रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक गांव है। धनुषकोडी पंबन के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। धनुषकोडी श्रीलंका में तलैमन्नार से करीब 18 मील पश्चिम में है।
इसका नाम धनुषकोडी इसलिए है कि यहां से श्रीलंका तक वानर सेना के माध्यम से नल और नील ने जो पुल (रामसेतु) बनाया था उसका आकार मार्ग धनुष के समान ही है। इन पूरे इलाकों को मन्नार समुद्री क्षेत्र के अंतर्गत माना जाता है। धनुषकोडी ही भारत और श्रीलंका के बीच एकमात्र स्थलीय सीमा है, जहां समुद्र नदी की गहराई जितना है जिसमें कहीं-कहीं भूमि नजर आती है।
दरअसल, यहां एक पुल डूबा पड़ा है। 1860 में इसकी स्पष्ट पहचान हुई और इसे हटाने के कई प्रयास किए गए। अंग्रेज इसे एडम ब्रिज कहने लगे तो स्थानीय लोगों में भी यह नाम प्रचलित हो गया। अंग्रेजों ने कभी इस पुल को क्षतिग्रस्त नहीं किया लेकिन आजाद भारत में पहले रेल ट्रैक निर्माण के चक्कर में बाद में बंदरगाह बनाने के चलते इस पुल को क्षतिग्रस्त किया गया।
30मील लंबा और सवा मील चौड़ा यह रामसेतु 5 से 30 फुट तक पानी में डूबा है। श्रीलंका सरकार इस डूबे हुए पुल (पम्बन से मन्नार) के ऊपर भू-मार्ग का निर्माण कराना चाहती है जबकि भारत सरकार नौवहन हेतु उसे तोड़ना चाहती है। इस कार्य को भारत सरकार ने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट का नाम दिया है। श्रीलंका के ऊर्जा मंत्री श्रीजयसूर्या ने इस डूबे हुए रामसेतु पर भारत और श्रीलंका के बीच भू-मार्ग का निर्माण कराने का प्रस्ताव रखा था।

16.’नुवारा एलिया’ पर्वत श्रृंखला: –वाल्मिकी रामायण अनुसार श्रीलंका के मध्य में रावण का महल था। ‘नुवारा एलिया’ पहाड़ियों से लगभग 90 किलोमीटर दूर बांद्रवेला की तरफ मध्य लंका की ऊंची पहाड़ियों के बीचोबीच सुरंगों तथा गुफाओं के भंवरजाल मिलते हैं। यहां ऐसे कई पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं जिनकी कार्बन डेटिंग से इनका काल निकाला गया है।
श्रीलंका में नुआरा एलिया पहाड़ियों के आसपास स्थित रावण फॉल, रावण गुफाएं, अशोक वाटिका, खंडहर हो चुके विभीषण के महल आदि की पुरातात्विक जांच से इनके रामायण काल के होने की पुष्टि होती है। आजकल भी इन स्थानों की भौगोलिक विशेषताएं, जीव, वनस्पति तथा स्मारक आदि बिलकुल वैसे ही हैं जैसे कि रामायण में वर्णित किए गये है।

नक्षत्र -योनी – गण -नाड़ी सामान्य चरित्र, व्यवसाय व मुहूर्त

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सभी परेशानियां हो सकती हैं खत्म https://www.astrologyofmylife.com/all-troubles-can-be-over/ https://www.astrologyofmylife.com/all-troubles-can-be-over/#respond Sat, 22 Sep 2018 17:47:24 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=2726 लाल धागे में 7 गांठ लगाएं और एक मंत्र बोलते हुए गणेशजी को चढ़ाएं, पूजा के बाद ये धागा अपने पर्स में रख लें, सभी परेशानियां हो सकती हैं खत्म 23 सितंबर को भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी है। इस दिन घर-घर में विराजित गणेशजी की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा। भगवान गणपति …
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लाल धागे में 7 गांठ लगाएं और एक मंत्र बोलते हुए गणेशजी को चढ़ाएं, पूजा के बाद ये धागा अपने पर्स में रख लें, सभी परेशानियां हो सकती हैं खत्म

23 सितंबर को भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी है। इस दिन घर-घर में विराजित गणेशजी की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा। भगवान गणपति प्रथम पूज्य देव हैं और इनकी पूजा से घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। कुछ ऐसे उपाय जो 23 सितंबर से गणेशजी के सामने कर लेंगे तो आपकी कुंडली के सभी दोष दूर हो सकते हैं, बुरे समय से मुक्ति मिल सकती है।

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पहला उपाय

परेशानियों को दूर करने के लिए किसी मंदिर में गणेशजी को 4 नारियल की माला बनाकर चढ़ाएं।

दूसरा उपाय

वाणी से संबंधित दोष दूर करने के लिए गणेशजी को 11 केलों की माला बनाकर चढ़ाएं।

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तीसरा उपाय

अगर बात-बात पर गुस्सा आता है तो गणेशजी को लाल गुलाब चढ़ाना चाहिए।

चौथा उपाय

गणेशजी उन लोगों पर विशेष कृपा बरसाते हैं, जो अपने माता-पिता की सेवा करता है। इसीलिए दिन की शुरुआत माता-पिता के पैरों का स्पर्श कर करें। माता-पिता के आशीर्वाद से सभी परेशानियां दूर हो सकती हैं।

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पांचवां उपाय

गणेशजी का ध्यान करते हुए ऊँ गं गणपतयै नमः मंत्र का जाप 108 बार करें।

छठा उपाय

कच्चे लाल धागे में 7 गांठ लगाकर जय गणेश काटो क्लेश कहते हुए गणेशजी को चढ़ाएं, उसके बाद ये धागा पर्स में रखें। ऐसा करने से सभी बाधाओं से आपकी रक्षा हो सकती है।

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सातवां उपाय

स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए गणपति अथर्वशीर्ष के अंतिम श्लोक का पाठ करें

महाविघ्नात्प्रमुच्यते।। महादोषात्प्रमुच्यते।। महापापात् प्रमुच्यते।

स सर्व विद्भवति स सर्वविद्भवति। य एवं वेद इत्युपनिषद।।

इस श्लोक का पाठ कम से कम 108 बार करें।

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Blue Sapphire Neelam Gemstone Benefit https://www.astrologyofmylife.com/blue-sapphire-neelam-gemstone-benefit/ https://www.astrologyofmylife.com/blue-sapphire-neelam-gemstone-benefit/#respond Sat, 22 Sep 2018 07:19:12 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=2719 आइये जानते हैं नीलम पहनने के 9 महत्वपूर्ण फायदे के बारे में: यह सबसे तेज़ असर करने रत्नों में से एक है और इसका प्रभाव तुरंत महसूस होता है। यह १ पहनने के पहले दिन से ही यह धन, शुभकामनाएं, अवसर और पदोन्नति आदि लाभ दे सकता है। Gemstone Suggestion यदि नीलम उपयुक्त है तो …
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आइये जानते हैं नीलम पहनने के 9 महत्वपूर्ण फायदे के बारे में:

यह सबसे तेज़ असर करने रत्नों में से एक है और इसका प्रभाव तुरंत महसूस होता है।

यह १ पहनने के पहले दिन से ही यह धन, शुभकामनाएं, अवसर और पदोन्नति आदि लाभ दे सकता है।

Gemstone Suggestion

यदि नीलम उपयुक्त है तो यह आश्चर्यजनक परिणाम दिखाता है। ऊर्जा और निराशा की मंदता को दूर करने में कोई भी तेजी से राहत महसूस कर सकता है।

नीलम स्टोन एक उच्च सुरक्षात्मक रत्न है यह दुश्मन, बुरी नज़र, ईर्ष्या आदि से सुरक्षा में मदद करता है।

यह पाचन में सुधार, सुस्ती को दूर करता है और फोकस और एकाग्रता को बेहतर बनाने में मदद करता है।

यह उत्कृष्ट चिकित्सा क्षमता है इंद्रियों को शांत करना और शांति और धैर्य देता है।

Prashna Kundli by Acharya Arya

यह कुंडली में नकारात्मकता, अज्ञात भय और परिसरों स्थितियों को हटा देता है।

नीलम का धन पर सीधा प्रभाव पड़ता है यह वित्त में सकारात्मक वृद्धि प्रदान करता है यह आय के कई स्रोतों के साथ आशीष दे सकता है।

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यह नाम, प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा देता है

इसके अलावा यह कानून क्षेत्र में व्यक्तियों के लिए बहुत अच्छा रत्न है जैसे मैजिस्ट्रेट्स और कानून प्रैक्टिशनर, उनके पेशे में सफलता के लिए।

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घर में कुत्ता पालना चाहिये या नहीं? https://www.astrologyofmylife.com/should-dog-in-the-house/ https://www.astrologyofmylife.com/should-dog-in-the-house/#respond Sat, 22 Sep 2018 06:54:47 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=2714 घर में कुत्ता पालना चाहिये या नहीं? घर में कुत्ता नहीं रखना चाहिये। कुत्तेका पालन करनेवाला नरकों में जाता है। महाभारत में आया है कि जब पाँचों पाण्डव और द्रौपदी संन्यास लेकर उत्तर की ओर चले तो चलते-चलते भीमसेन आदि सभी गिर गये। अन्त में जब युधिष्ठिर भी लड़खड़ा गये, तब इन्द्रकी आज्ञा से मातलि …
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घर में कुत्ता पालना चाहिये या नहीं?

घर में कुत्ता नहीं रखना चाहिये। कुत्तेका पालन करनेवाला नरकों में जाता है। महाभारत में आया है कि जब पाँचों पाण्डव और द्रौपदी संन्यास लेकर उत्तर की ओर चले तो चलते-चलते भीमसेन आदि सभी गिर गये।
अन्त में जब युधिष्ठिर भी लड़खड़ा गये, तब इन्द्रकी आज्ञा से मातलि रथ लेकर वहाँ आया और युधिष्ठिर से कहा कि आप इसी शरीर से स्वर्ग पधारिए। युधिष्ठिर ने देखा कि एक कुत्ता उनके पास खड़ा है।
उन्होंने कहा कि यह कुत्ता मेरी शरण में आया है, अतः यह भी मेरे साथ स्वर्ग में चलेगा।

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इन्द्र ने युधिष्ठिरसे कहा‒

स्वर्गे लोके श्ववतां नास्ति धिष्ण्यमिष्टापूर्तं क्रोधवशा हरन्ति ।
ततो विचार्य क्रियतां धर्मराज त्यज श्वानं नात्र नृशंसमस्ति ॥
(महाभारत, महाप्र॰ ३ । १०)

“धर्मराज ! कुत्ता रखने वालोंके लिये स्वर्गलोक में स्थान नहीं है। उनके यज्ञ करने और कुआँ, बावड़ी आदि बनवानेका जो पुण्य होता है, उसे क्रोधवश नामक राक्षस हर लेते हैं। इसलिये सोच-विचारकर काम करो और इस कुत्तेको छोड़ दो। ऐसा करने में कोई निर्दयता नहीं है ।”

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तात्पर्य है कि घर में कुत्ता नहीं रखना चाहिये।

महाभारत में आया है‒

भिन्नभाण्डं च खट्‌वां च कुक्कुटं शुनकं तथा ।
अप्रशस्तानि सर्वाणि यश्च वृक्षो गृहेरुहः ॥
भिन्नभाण्डे कलिं प्राहुः खट्वायां तु धनक्षयः ।
कुक्कुटे शुनके चैव हविर्नाश्नन्ति देवताः ।
वृक्षमूले ध्रुवं सत्त्वं तस्माद् वृक्षं न रोपयेत् ॥
(महाभारत, अनु॰ १२७ । १५-१६)

“घरमें फूटे बर्तन, टूटी खाट, मुर्गा, कुत्ता और अश्वत्थादि वृक्ष का होना अच्छा नहीं माना गया है। फूटे बर्तन में कलियुग का वास कहा गया है। टूटी खाट रहने से धन की हानि होती है। मुर्गे और कुत्ते के रहने पर देवता उस घर में हविष्य ग्रहण नहीं करते तथा मकान के अन्दर कोई बड़ा वृक्ष(पीपल आदि) होने पर उसकी जड़ के भीतर साँप, बिच्छू आदि जन्तुओं का रहना अनिवार्य हो जाता है, इसलिये घरके भीतर पेड़ न लगाये ।”

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कुत्ता महान अशुद्ध, अपवित्र होता है। उसके खान-पान से, स्पर्श से, उसके जगह-जगह बैठने से खान-पान में, रहन-सहन में अशुद्धि, अपवित्रता आती है और अपवित्रता का फल भी अपवित्र (नरक आदि) ही होता है।

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अंग पर बांध लें काला धागा, शनिदेव की कृपा https://www.astrologyofmylife.com/grace-of-shani-dev/ https://www.astrologyofmylife.com/grace-of-shani-dev/#respond Sat, 22 Sep 2018 06:43:14 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=2708 शनिवार की रात अपने शरीर के इस अंग पर बांध लें काला धागा, खुल जाएगी किस्मत, रहेगी शनिदेव की कृपा ज्योतिषशास्त्र के मुताबिक, काला धागा वह धागा है जो इंसान को गरीबी से अमीरी के तरफ ले जा सकता है अगर इसका सही इस्तेमाल किया जाए। यदि आप भी काला धागा पहनते हैं लेकिन इसको …
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शनिवार की रात अपने शरीर के इस अंग पर बांध लें काला धागा, खुल जाएगी किस्मत, रहेगी शनिदेव की कृपा

ज्योतिषशास्त्र के मुताबिक, काला धागा वह धागा है जो इंसान को गरीबी से अमीरी के तरफ ले जा सकता है अगर इसका सही इस्तेमाल किया जाए। यदि आप भी काला धागा पहनते हैं लेकिन इसको किस तरह और कहां पहनना है ये नही जानते हैं तो आज हम आपको बताएंगे कि शरीर के कौन से अंग पर काले धागे को बांधने से आपको फायदा मिलेगा।

सबसे पहले एक काले धागे में 9 गाँठ बांध दें और शनिवार या मंगलवार के दिन आप इसे अपने दाहिने हाथ की कलाई में बांध लें। ऐसा कम से कम आप 3 से 7 हफ्ते तक लगातार बांध कर रखें और नियत ये करें कि इसके बरकत से आपकी सारी गरीबी दूर हो जाये। इसका फायदा आपको एक हफ्ते के अंदर ही दिख जाएगा।

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हालांकि, काला धागा बांधने का ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि आप इसे बांध कर घर में चुपचाप बैठ जाएं और पैसों की बारिश होने का इंतजार करने लगें। काला धागा आपका काम जरूर करेगा लेकिन आपको मेहनत तो करनी ही पड़ेगी। काला धागा सिर्फ उसमें बरकत करेगा जिससे आपका काम और आसान हो जाएगा।

गरीबी से मुक्ति दिलाएंगे शनिदेव- जो लोग गरीबी से मुक्ति चाहते हैं, उन्हें ज्योतिष में बताए गए उपाय करने से लाभ मिल सकता है। मान्यता है कि शनिदेव हमारे कर्मों का फल प्रदान करते हैं।

कुंडली में शनि अशुभ हो तो हर शनिवार शनिदेव को तेल चढ़ाना चाहिए। यह उपाय सभी राशि के लोग कर सकते हैं। जो लोग ये उपाय नियमित रूप से करते रहते हैं, उन्हें साढ़ेसाती और ढय्या में भी शनि की कृपा प्राप्त होती है। यहां जानिए कुछ ऐसी बातें जो शनि को तेल चढ़ाते समय ध्यान रखनी चाहिए…

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अगर इन बातों को ध्यान में रखते हुए शनिदेव को तेल चढ़ाया जाए तो वे जल्दी प्रसन्न होते हैं और भक्त की दुर्भाग्य से रक्षा करते हैं। शनिदेव को हमेशा लोहे के बर्तन से ही तेल चढ़ाना चाहिए। कांच, तांबा या स्टील की कटोरी से तेल चढ़ाने पर उसका पूरा लाभ नहीं मिलता।शनिदेव को जो तेल चढ़ाना है, वह पूरी तरह शुद्ध होना चाहिए। इसलिए मंदिर के बाहर से तेल खरीदने की जगह अपने घर से तेल लेकर जाएंगे तो ज्यादा शुभ रहेगा।

तेल चढ़ाने से पहले तेल में अपना चेहरा जरूर देख लेना चाहिए। ऐसा करने से शनि के सभी दोषों से मुक्ति मिल सकती है। शनि देव को तेल चढ़ाते समय शनिदेव के पैरों के दर्शन करना चाहिए। भगवान के पैरों के दर्शन करते हुए तेल अर्पित करना बहुत शुभ माना जाता है। शनिदेव को तेल अर्पित करने के साथ ही अपनी इच्छा अनुसार धन का दान भी करना चाहिए। ये दान आप शनि मंदिर में या किसी जरूरतमंद व्यक्ति को कर सकते हैं।

Varshphal Report

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पितर दोष क्या है वह उपाय (Pitra Dosh Upay – Pitra Paksha) https://www.astrologyofmylife.com/pitra-dosh-upay-pitra-paksha/ https://www.astrologyofmylife.com/pitra-dosh-upay-pitra-paksha/#respond Thu, 20 Sep 2018 09:25:48 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=2698 पितर दोष क्या है वह उपाय गरुण पुराण के बारे में कई भ्रांतियां हैं। जैसे कहा जाता है कि गरुण पुराण, सिर्फ मृत्यु के समय पढ़ा जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है। गरुण पुराण में कई ऐसे अचूक उपाय हैं, जिसके बारे में कम लोग जानते हैं। संजीवनी विद्या उन्हीं में से एक है। इस …
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पितर दोष क्या है वह उपाय

गरुण पुराण के बारे में कई भ्रांतियां हैं। जैसे कहा जाता है कि गरुण पुराण, सिर्फ मृत्यु के समय पढ़ा जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है। गरुण पुराण में कई ऐसे अचूक उपाय हैं, जिसके बारे में कम लोग जानते हैं। संजीवनी विद्या उन्हीं में से एक है। इस विद्या में, मृत व्यक्ति को, जीवित करने का तरीका बताया गया है।
गरुण पुराण में संजीवनी विद्या
गरुण पुराण में संजीवनी विद्या का वर्णन है। इसमें ऐसे ऐसे मंत्र बताये गये हैं, जिससे मृत व्यक्ति भी जीवित हो सकता है। अगर इस मंत्र को सिद्ध करके, मृत व्यक्ति के कान में फूंका जाये, तो वह तुरंत उठ खड़ा होगा। लेकिन मंत्र सिद्धि के बाद, दशांश हवन, और ब्राह्मण भोजन कराना ज़रूरी है।
संजीवनी मंत्र – यक्षि ओम उं स्वाहा
गरुण पुराण में लक्ष्मी मंत्र
गरुण पुराण में सिर्फ श्राद्ध और तर्पण के बारे में ही नहीं लिखा है। बल्कि इसमें लक्ष्मी प्राप्ति के भी अचूक उपाय बताये गये हैं। अगर किसी के जीवन में दरिद्रा लक्ष्मी, डेरा डाले, काफी लंबे समय से बैठी हों, तो इसमें गरीबी दूर करने का अचूक मंत्र बताया गया है। दावा है कि इस मंत्र के जाप से, एक महीने में ही जन्म जन्म की गरीबी दूर हो जाती है।

Life Prediction

गरुण पुराण में ग़रीबी दूर करने का मंत्र
ओम जूं स :
इसके अलावा 6 महीने तक लगातार, श्रीविष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से भी, मनचाही इच्छा पूरी हो सकती है। अब चाहे यह इच्छा करियर में तरक्की की हो,या फिर ढेर सारी संपत्ति का मालिक बनने की, श्रीविष्णु सहस्त्र नाम के पाठ से, सबकुछ संभव है।
क्या मृत्यु के बाद तुरंत मिलता है शरीर?
गरुड पुराण में, भगवान विष्णु कहते हैं कि मृत्यु के बाद, आत्मा को तुरंत शरीर मिल जाता है। लेकिन कर्मों की गति के आधार पर, कभी कभी देर से भी शरीर मिलता है। मृत्यु के बाद, आत्मा वायु शरीर धारण करती है। उसके बाद पिंडदान से आत्मा, शरीर में बंध जाती है। इसीलिये मृत्यु के बाद, पिंडदान करने से, आत्मा को भटकन से मुक्ति मिल जाती है।
गरुड पुराण में मोक्ष का उपाय
गरुण पुराण में बताया गया है कि मनुष्य को, अंतिम समय में क्या करना चाहिये? इसमें भगवान ने कहा है कि मृत्यु के समय, देह-माया से, आसक्ति कम करनी चाहिये। किसी पवित्र तीर्थ में स्नान करना चाहिये। अगर शरीर साथ दे तो किसी तीर्थ में आसन लगाकर, गायत्री मंत्र जपना चाहिये। अंतिम समय में, ओम के जाप से मोक्ष और मुक्ति मिलती है।

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कैसे करें तर्पण?
गरुण पुराण में श्राद्ध और तर्पण के भी नियम बताये गये हैं। तर्पण के लिये, जल में दूध और तिल मिलायें। फिर पितृ गायत्री मंत्र पढ़ते हुये, दक्षिण की ओर मुख कर, बांया घुटना ज़मीन पर लगाकर, जनेऊ,गमक्षा दांयें कंधे पर रख कर तर्पण करना चाहिये। जल के तर्पण के लिये चांदी, तांबे या फिर पीतल के बर्तन प्रयोग करें। लेकिन चांदी के बर्तन से तर्पण करने से, पितरों की आत्मा को तृप्ति मिलती है। स्टील के बर्तन से तर्पण न करें।
कैसे पहुंचता है श्राद्ध का भोजन?
विश्वदेव ,अग्निश्रवा दोनों दिव्य पितृ हैं। यह दोनों ही नाम गोत्र के सहारे, हव्य कव्य को पितरों तक पहुंचाते हैं। पितृ, देव योनि में हों तो श्राद्ध का भोजन अमृत रूप में, मनुष्य योनि में हो तो अन्न रूप में, पशु योनि में घास के रूप में, नाग योनि में वायु रूप में, यक्ष योनि में हों तो पान रूप में मिलता

पितृ -दोष शांति के सरल उपाय

पितर या पितृ गण कौन हैं ?

पितृ गण हमारे पूर्वज हैंजिनका ऋण हमारे ऊपर है ,क्योंकि उन्होंने कोई ना कोई उपकार हमारे जीवन के लिए किया है |मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है,पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इस से भी ऊपर स्वर्ग लोक है| आत्मा जब अपने शरीर को त्याग कर सबसे पहले ऊपर उठती है तो वह पितृ लोक में जाती है ,वहाँ हमारे पूर्वज मिलते हैं |अगर उस आत्मा के अच्छे पुण्य हैं तो ये हमारे पूर्वज भी उसको प्रणाम कर अपने को धन्य मानते हैं की इस अमुक आत्मा ने हमारे कुल में जन्म लेकर हमें धन्य किया |इसके आगे आत्मा अपने पुण्य के आधार पर सूर्य लोक की तरफ बढती है |वहाँ से आगे ,यदि और अधिक पुण्य हैं, तो आत्मा सूर्य लोक को बेध कर स्वर्ग लोक की तरफ चली जाती है,लेकिन करोड़ों में एक आध आत्मा ही ऐसी होती है ,जो परमात्मा में समाहित होती है |जिसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता | मनुष्य लोक एवं पितृ लोक में बहुत सारी आत्माएं पुनः अपनी इच्छा वश ,मोह वश अपने कुल में जन्म लेती हैं|

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पितृ दोष क्या होता है?

हमारे ये ही पूर्वज सूक्ष्म व्यापक शरीर से अपने परिवार को जब देखते हैं ,और महसूस करते हैं कि हमारे परिवार के लोग ना तो हमारे प्रति श्रद्धा रखते हैं और न ही इन्हें कोई प्यार या स्नेह है और ना ही किसी भी अवसर पर ये हमको याद करते हैं,ना ही अपने ऋण चुकाने का प्रयास ही करते हैं तो ये आत्माएं दुखी होकर अपने वंशजों को श्राप दे देती हैं,जिसे “पितृ- दोष” कहा जाता है |

पितृ दोष एक अदृश्य बाधा है .ये बाधा पितरों द्वारा रुष्ट होने के कारण होती है |पितरों के रुष्ट होने के बहुत से कारण हो सकते हैं ,आपके आचरण से,किसी परिजन द्वारा की गयी गलती से ,श्राद्ध आदि कर्म ना करने से ,अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई किसी त्रुटि के कारण भी हो सकता है |

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इसके अलावा मानसिक

अवसाद,व्यापार में नुक्सान ,परिश्रम के अनुसार फल न मिलना ,वैवाहिक जीवन में समस्याएं.,कैरिअर में समस्याएं या संक्षिप्त में कहें तो जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति और उसके परिवार को बाधाओं का सामना करना पड़ता है ,

पितृ दोष होने पर अनुकूल ग्रहों की स्थिति ,गोचर ,दशाएं होने पर भी शुभ

फल नहीं मिल पाते,

कितना भी पूजा पाठ ,देवी ,देवताओं की अर्चना की जाए ,

उसका शुभ फल नहीं मिल पाता|

पितृ दोष दो प्रकार से प्रभावित करता है:

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१.अधोगति .

वाले पितरों के कारण

२. .उर्ध्वगति वाले पितरों के कारण

अधोगति वाले पितरों के दोषों

का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया गया गलत आचरण,

परिजनों की अतृप्त इच्छाएं ,जायदाद

के प्रति मोह और उसका गलत लोगों द्वारा उपभोग

होने पर,विवाहादिमें परिजनों द्वारा गलत निर्णय .परिवार के किसी

प्रियजन को अकारण

कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध हो जाते हैं ,

परिवार जनों को श्राप दे देते हैं और अपनी शक्ति से

नकारात्मक फल प्रदान करते हैं|

उर्ध्व गति वाले पितर सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते ,

परन्तु उनका किसी भी

रूप में अपमान होने पर अथवा परिवार के पारंपरिक रीति-

रिवाजों का निर्वहन नहीं

करने पर वह पितृदोष उत्पन्न करते हैं |

इनके द्वारा उत्पन्न पितृदोष से व्यक्ति की

भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति बिलकुल बाधित हो जाती है ,

फिर चाहे कितने भी

प्रयास क्यों ना किये जाएँ ,कितने भी पूजा पाठ क्यों ना किये जाएँ,

उनका कोई भी कार्य

ये पितृदोष सफल नहीं होने देता |

पितृ दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी होता है कि किस गृह के कारण और किस प्रकार का पितृ दोष उत्पन्न हो रहा है ?

जन्म पत्रिका और पितृ दोष

जन्म पत्रिका में लग्न ,पंचम ,अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष का विचार किया जाता है |पितृ दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य ,चन्द्रमा ,गुरु ,शनि ,और राहू -केतु की स्थितियों से पितृ दोष का विचार किया जाता है |इनमें से भी गुरु ,

शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक पितृ दोष में महत्वपूर्ण होती है |

इनमें सूर्य से पिता या पितामह , चन्द्रमा से माता या मातामह ,मंगल से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है |अधिकाँश लोगों की जन्म पत्रिका में मुख्य रूप से क्योंकि गुरु ,शनि और राहु से पीड़ित होने पर ही पितृ दोष उत्पन्न होता है ,इसलिए विभिन्न उपायों को करने के साथ साथ व्यक्ति यदि पंचमुखी ,सातमुखी और आठ मुखी रुद्राक्ष भी धारण कर ले , तो पितृ दोष का निवारण शीघ्र हो जाता है |पितृ दोष निवारण के लिए इन रुद्राक्षों को धारण करने के अतिरिक्त इन ग्रहों के अन्य उपाय जैसे मंत्र जप और स्तोत्रों का पाठ करना भी श्रेष्ठ होता है |

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विभिन्न ऋण और पितृ दोष

हमारे ऊपर मुख्य रूप से ५ ऋण होते हैं जिनका कर्म न करने(ऋण न चुकाने पर ) हमें निश्चित रूप से श्राप मिलता है ,ये ऋण हैं : मातृ ऋण ,पितृ ऋण ,मनुष्य ऋण ,देव ऋण और ऋषि ऋण |
मातृ ऋण : माता एवं माता पक्ष के सभी लोग जिनमेंमा,मामी ,नाना ,नानी ,मौसा ,मौसी और इनके तीन पीढ़ी

के पूर्वज होते हैं ,क्योंकि माँ का स्थान परमात्मा से भी ऊंचा माना गया है अतः यदि माता के प्रति कोई गलत शब्द बोलता है ,अथवा माता के पक्ष को कोई कष्ट देता रहता है,तो इसके फलस्वरूप उसको नाना प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं |इतना ही नहीं ,इसके बाद भी कलह और कष्टों का दौर भी परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता ही रहता है |

पितृ ऋण: : पिता पक्ष के लोगों जैसे बाबा ,ताऊ ,चाचा, दादा-दादी और इसके पूर्व की तीन पीढ़ी का श्राप हमारे जीवन को प्रभावित करता है |पिता हमें आकाश की तरह छत्रछाया देता है,हमारा जिंदगी भर पालन -पोषण करता है ,और अंतिम समयतक हमारे सारे दुखों को खुद झेलता रहता है |पर आज के के इस भौतिक युग में पिता का सम्मान क्या नयी पीढ़ी कर रही है ?पितृ -भक्ति करना मनुष्य का धर्म है ,इस धर्म का पालन न करने पर उनका श्राप नयी पीढ़ी को झेलना ही पड़ता है ,इसमें घर में आर्थिक अभाव,दरिद्रता ,संतानहीनता ,संतान को विबिन्न प्रकार के कष्ट आना या संतान अपंग रह जाने से जीवन भर कष्ट की प्राप्ति आदि |

देव ऋण :माता -पिता प्रथम देवता हैं,जिसके कारण भगवान गणेश महान बने |इसके बाद हमारे इष्ट भगवान शंकर जी ,दुर्गा माँ ,भगवान विष्णु आदि आते हैं ,जिनको हमारा कुल मानता आ रहा है ,हमारे पूर्वज भी भी अपने अपने कुल देवताओं को मानते थे , लेकिन नयी पीढ़ी ने बिलकुल छोड़ दिया है |इसी कारण भगवान /कुलदेवी /कुलदेवता उन्हें नाना प्रकार के कष्ट /श्रापदेकर उन्हें अपनी उपस्थिति का आभास कराते हैं|

ऋषि ऋण : जिस ऋषि के गोत्र में पैदा हुए ,वंश वृद्धि की ,उन ऋषियों का नाम अपने नाम के साथ जोड़ने में नयी पीढ़ी कतराती है ,उनके ऋषि तर्पण आदि नहीं करती है | इस कारण उनके घरों में कोई मांगलिक कार्य नहीं होते हैं,इसलिए उनका श्राप पीडी दर पीढ़ी प्राप्त होता रहता है |

मनुष्य ऋण : माता -पिता के अतिरिक्त जिन अन्य मनुष्यों ने हमें प्यार दिया ,दुलार दिया ,हमारा ख्याल रखा ,समय समय पर मदद की |गाय आदि पशुओं का दूध पिया |जिन अनेक मनुष्यों ,पशुओं ,पक्षियों ने हमारी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मदद की ,उनका ऋण भी हमारे ऊपर हो गया |लेकिन लोग आजकल गरीब ,बेबस ,लाचार लोगों की धन संपत्ति हरण करके अपने कोज्यादा गौरवान्वित महसूस करते हैं|इसी कारण देखने में आया है कि ऐसे लोगों का पूरा परिवार जीवन भर नहीं बस पाता है,वंश हीनता ,संतानों का गलत संगति में पड़ जाना,परिवार के सदस्यों का आपस में सामंजस्य न बन पाना ,परिवार कि सदस्यों का किसी असाध्य रोग से ग्रस्त रहना इत्यादि दोष उस परिवार मेंउत्पन्न हो जाते हैं |ऐसे परिवार को पितृ दोष युक्त या शापित परिवार कहा जाता है| रामायण में श्रवण कुमार के माता -पिता के श्राप के कारण दशरथ के परिवार को हमेशा कष्ट झेलना पड़ा,ये जग -ज़ाहिर है |इसलिए परिवार कि सर्वोन्नती के पितृ दोषों का निवारण करना बहुत आवश्यक है|

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पितृ-दोष कि शांति के उपाय : –

सामान्य उपायों में षोडश पिंड दान ,सर्प पूजा ,ब्राह्मण को गौ -दान ,कन्या -दान,कुआं ,बावड़ी ,तालाब आदि बनवाना ,मंदिर प्रांगण में पीपल ,बड़(बरगद) आदि देव वृक्ष लगवाना एवं विष्णु मन्त्रों का जाप आदि करना ,प्रेत श्राप को दूर करने के लिए श्रीमद्द्भागवत का पाठ करना चाहिए |

वेदों और पुराणों में पितरों की संतुष्टि के लिए मंत्र ,स्तोत्र एवं सूक्तों का वर्णन है ,

जिसके नित्य

पठन से किसी भी प्रकार की पितृ बाधा क्यों ना हो ,शांत हो जाती है |

अगर नित्य पठन संभव

ना हो , तो कम से कम प्रत्येक माह की अमावस्या और आश्विन कृष्ण पक्ष

अमावस्या अर्थात

पितृपक्ष में अवश्य करना चाहिए |
वैसे तो कुंडली में किस प्रकार का पितृ दोष है उस पितृ दोष के प्रकार के हिसाब से पितृदोष शांति करवाना अच्छा होता है ,लेकिन कुछ ऐसे सरल सामान्य उपाय भी हैं,

जिनको करने से

पितृदोष शांत हो जाता है ,ये उपाय निम्नलिखित हैं :—-

सामान्य उपाय :

१ .ब्रह्म पुराण (२२०/१४३ )में पितृ गायत्री मंत्र दिया गया है ,इस मंत्र कि प्रतिदिन १ माला या अधिक जाप करने से पितृ दोष में अवश्य लाभ होता है|

मंत्र : देवताभ्यः पित्रभ्यश्च महा योगिभ्य एव च

| नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः || ”

२. मार्कंडेय पुराण (९४/३ -१३ )में वर्णित इस चमत्कारी पितृ स्तोत्र का नियमित पाठ करने से भी पितृ प्रसन्न होकर स्तुतिकर्ता मनोकामना कि पूर्ती करते हैं ———–

पुराणोक्त पितृ -स्तोत्र :

अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम्।

नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।

इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।

तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्सूदधावपि।।

नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।

द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृतांजलिः।।

देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।

अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येऽहं कृतांजलिः।।

प्रजापतं कश्यपाय सोमाय वरूणाय च।

योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृतांजलिः।।

नमो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।

स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे।।

सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा।

नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्।।

अग्निरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम्।

अग्निषोममयं विश्वं यत एतदशेषतः।।

ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः।

जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिणः।।

तेभ्योऽखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः।

नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुजः।।

अर्थ:

रूचि बोले – जो सबके द्वारा पूजित, अमूर्त, अत्यन्त तेजस्वी, ध्यानी तथा दिव्यदृष्टि सम्पन्न हैं, उन पितरों को मैं सदा नमस्कार करता हूँ।

जो इन्द्र आदि देवताओं, दक्ष, मारीच, सप्तर्षियों तथा दूसरों के भी नेता हैं, कामना की पूर्ति करने वाले उन पितरो को मैं प्रणाम करता हूँ।

जो मनु आदि राजर्षियों, मुनिश्वरों तथा सूर्य और चन्द्रमा के भी नायक हैं, उन समस्त पितरों को मैं जल और समुद्र में भी नमस्कार करता हूँ।

नक्षत्रों, ग्रहों, वायु, अग्नि, आकाश और द्युलोक तथा पृथ्वी के भी जो नेता हैं, उन पितरों को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।

जो देवर्षियों के जन्मदाता, समस्त लोकों द्वारा वन्दित तथा सदा अक्षय फल के दाता हैं, उन पितरों को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।

प्रजापति, कश्यप, सोम, वरूण तथा योगेश्वरों के रूप में स्थित पितरों को सदा हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।

सातों लोकों में स्थित सात पितृगणों को नमस्कार है। मैं योगदृष्टिसम्पन्न स्वयम्भू ब्रह्माजी को प्रणाम करता हूँ।

चन्द्रमा के आधार पर प्रतिष्ठित तथा योगमूर्तिधारी पितृगणों को मैं प्रणाम करता हूँ। साथ ही सम्पूर्ण जगत् के पिता सोम को नमस्कार करता हूँ।

अग्निस्वरूप अन्य पितरों को मैं प्रणाम करता हूँ, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् अग्नि और सोममय है।

जो पितर तेज में स्थित हैं, जो ये चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं तथा जो जगत्स्वरूप एवं ब्रह्मस्वरूप हैं, उन सम्पूर्ण योगी पितरो को मैं एकाग्रचित्त होकर प्रणाम करता हूँ। उन्हें बारम्बार नमस्कार है। वे स्वधाभोजी पितर मुझपर प्रसन्न हों।

विशेष – मार्कण्डेयपुराण में महात्मा रूचि द्वारा की गयी पितरों की यह स्तुति ‘पितृस्तोत्र’ कहलाता है। पितरों की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिये इस स्तोत्र का पाठ किया जाता है। इस स्तोत्र की बड़ी महिमा है। श्राद्ध आदि के अवसरों पर ब्राह्मणों के भोजन के समय भी इसका पाठ करने-कराने का विधान है।

३.भगवान भोलेनाथ की तस्वीर या प्रतिमा के समक्ष बैठ कर याघर में ही भगवान भोलेनाथ का ध्यान कर निम्न मंत्र कीएक माला नित्य जाप करने से समस्त प्रकार के पितृ- दोष संकट बाधा आदि शांत होकर शुभत्व की प्राप्ति होती है |मंत्र जाप प्रातः या सायंकाल कभी भी कर सकते हैं :

मंत्र : “ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय च धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात |

४.अमावस्या को पितरों के निमित्त पवित्रता पूर्वक बनाया गया भोजन तथा चावल बूरा ,घी एवं एक रोटी गाय को खिलाने से पितृ दोष शांत होता है |

५ . अपने माता -पिता ,बुजुर्गों का सम्मान,सभी स्त्री कुल का आदर /सम्मान करने और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहने से पितर हमेशा प्रसन्न रहते हैं |

६ . पितृ दोष जनित संतान कष्ट को दूर करने के लिए “हरिवंश पुराण ” का श्रवण करें या स्वयं नियमित रूप से पाठ करें |

७ . प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती या सुन्दर काण्ड का पाठ करने से भी इस दोष में कमी आती है |

८.सूर्य पिता है अतः ताम्बे के लोटे में जल भर कर ,उसमें लाल फूल ,लाल चन्दन का चूरा ,रोली आदि डाल कर सूर्य देव को अर्घ्य देकर ११ बार “ॐ घृणि सूर्याय नमः ” मंत्र का जाप करने से पितरों की प्रसन्नता एवं उनकी ऊर्ध्व गति होती है |

९. अमावस्या वाले दिन अवश्य अपने पूर्वजों के नाम दुग्ध ,चीनी ,सफ़ेद कपडा ,दक्षिणा आदि किसी मंदिर में अथवा किसी योग्य ब्राह्मण को दान करना चाहिए |

१० .पितृ पक्ष में पीपल की परिक्रमा अवश्य करें | अगर १०८ परिक्रमा लगाई जाएँ ,तो पितृ दोष अवश्य दूर होगा |

विशिष्ट उपाय :

१.किसी मंदिर के परिसर में पीपल अथवा बड़ का वृक्ष लगाएं और रोज़ उसमें जल डालें ,उसकी देख -भाल करें ,जैसे-जैसे वृक्ष फलता -फूलता जाएगा,पितृ -दोष दूर होता जाएगा,क्योकि इन वृक्षों पर ही सारे देवी -देवता ,इतर -योनियाँ ,पितर आदि निवास करते हैं |
२. यदि आपने किसी का हक छीना है,या किसी मजबूर व्यक्ति की धन संपत्ति का हरण किया है,तो उसका हक या संपत्ति उसको अवश्य लौटा दें |
३.पितृ दोष से पीड़ित व्यक्ति को किसी भी एक अमावस्या से लेकर दूसरी अमावस्या तक अर्थात एक माह तक किसी पीपल के वृक्ष के नीचे सूर्योदय काल में एक शुद्ध घी का दीपक लगाना चाहिए,ये क्रम टूटना नहीं चाहिए |

एक माह बीतने पर जो अमावस्या आये उस दिन एक प्रयोग और करें :–

इसके लिए किसी देसी गाय या दूध देने वाली गाय का थोडा सा गौ -मूत्र प्राप्त करें|उसे थोड़े एनी जल में मिलकर इस जल को पीपल वृक्ष की जड़ों में डाल दें |इसके बाद पीपल वृक्ष के नीचे ५ अगरबत्ती ,एक नारियल और शुद्ध घी का दीपक लगाकर अपने पूर्वजों से श्रद्धा पूर्वक अपने कल्याण की कामना करें,और घर आकर उसी दिन दोपहर में कुछ गरीबों को भोजन करा दें |ऐसा करने पर पितृ दोष शांत हो जायेगा|
४ .घर में कुआं हो या पीने का पानी रखने की जगह हो ,उस जगह की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें,क्योंके ये पितृ स्थान माना जाता है | इसके अलावा पशुओं के लिए पीने का पानी भरवाने तथा प्याऊ लगवाने अथवा आवारा कुत्तों को जलेबी खिलाने से भी पितृ दोष शांत होता है|
५ . अगर पितृ दोष के कारण अत्यधिक परेशानी हो,संतान हानि हो या संतान को कष्ट हो तो किसी शुभ समय अपने पितरों को प्रणाम कर उनसे प्रण होने की प्रार्थना करें और अपने dwara जाने-अनजाने में किये गए अपराध / उपेक्षा के लिए क्षमा याचना करें ,फिर घर में श्रीमदभागवद का यथा विधि पाठ कराएं,इस संकल्प ले साथ की इसका पूर्ण फल पितरों को प्राप्त हो |ऐसा करने से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं ,क्योंके उनकी मुक्ति का मार्ग आपने प्रशस्त किया होता है|
६. पितृ दोष की शांति हेतु ये उपाय बहुत ही अनुभूत और अचूक फल देने वाला देखा गया है,वोह ये कि- किसी गरीब की कन्या के विवाह में गुप्त रूप से अथवा प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक सहयोग करना |(लेकिन ये सहयोग पूरे दिल से होना चाहिए ,केवल दिखावे या अपनी बढ़ाई कराने के लिए नहीं )|इस से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं ,क्योंकि इसके परिणाम स्वरुप मिलने वाले पुण्य फल से पितरों को बल और तेज़ मिलता है ,जिस से वह ऊर्ध्व लोकों की ओरगति करते हुए पुण्य लोकों को प्राप्त होते हैं.|
७. अगर किसी विशेष कामना को लेकर किसी परिजन की आत्मा पितृ दोष उत्पन्न करती है तो तो ऐसी स्थिति में मोह को त्याग कर उसकी सदगति के लिए “गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र ” का पाठ करना चाहिए.|
८.पितृ दोष दूर करने का अत्यंत सरल उपाय : इसके लिए सम्बंधित व्यक्ति को अपने घर के वायव्य कोण (N -W )में नित्य सरसों
का तेल में बराबर मात्रा में अगर का तेल मिलाकर दीपक पूरे पितृ पक्ष में नित्य
लगाना चाहिए+दिया पीतल का हो तो ज्यादा अच्छा है ,दीपक कम से कम १०
मिनट नित्य जलना आवश्यक है लाभ प्राप्ति के लिए
इन उपायों के अतिरिक्त वर्ष की प्रत्येक अमावस्या को दोपहर के समय गूगल की धूनी पूरे घर में सब जगह घुमाएं ,शाम को आंध्र होने के बाद पितरों के निमित्त शुद्ध भोजन बनाकर एक दोने में साड़ी सामग्री रख कर किसी बबूल के वृक्ष अथवा पीपल या बड़ किजद में रख कर आ जाएँ,पीछे मुड़कर न देखें.|नित्य प्रति घर में देसी कपूर जाया करें|ये कुछ ऐसे उपाय हैं,जो सरल भी हैं और प्रभावी भी,और हर कोई सरलता से इन्हें कर पितृ दोषों से मुक्ति पा सकता है|लेकिन किसी भी प्रयोग की सफलता आपकी पितरों के प्रति श्रद्धा के ऊपर निर्बर करती है|आप सदा खुश रहे,सुख समृद्धि में वृद्धि हो,इस कामना के साथ ……….

 

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दस योग जो कराते हैं आदमी को विदेश यात्रा https://www.astrologyofmylife.com/abroad-trip/ https://www.astrologyofmylife.com/abroad-trip/#respond Wed, 19 Sep 2018 17:47:51 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=2679 दस योग जो कराते हैं आदमी को विदेश यात्रा आजकल विदेश यात्रा और विदेशों में काम करने को एक सुअवसर के रूप में देखा जाता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण में देखें तो हमारी कुंडली में बने कुछ विशेष ग्रहयोग ही हमारे जीवन में विदेश से जुड़कर काम करने या विदेश यात्रा का योग बनाते हैं। हमारी …
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दस योग जो कराते हैं आदमी को विदेश यात्रा

आजकल विदेश यात्रा और विदेशों में काम करने को एक सुअवसर के रूप में देखा जाता है।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण में देखें तो हमारी कुंडली में बने कुछ विशेष ग्रहयोग ही हमारे जीवन में विदेश से जुड़कर काम करने या विदेश यात्रा का योग बनाते हैं। हमारी जन्मकुंडली में बारहवें भाव का सम्बन्ध विदेश और विदेश यात्रा से जोड़ा गया है इसलिए दुःख भाव होने पर भी आज के समय में कुंडली के बारहवे भाव को एक सुअवसर के रूप में देखा जाता है। चन्द्रमा को विदेश यात्रा का नैसर्गिक कारक माना गया है। कुंडली का दशम भाव हमारी आजीविका को दिखाता है तथा शनि आजीविका का नैसर्गिक कारक होता है अत: विदेश यात्रा के लिये कुंडली का बारहवां भाव, चन्द्रमा, दशम भाव और शनि का विशेष महत्व होता है।

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जानिए कुंडली में कौन से योग कराते हैं विदेश यात्रा।

यदि चन्द्रमा कुंडली के बारहवें भाव में स्थित हो तो विदेश यात्रा या विदेश से जुड़कर आजीविका का योग होता है।

चन्द्रमा यदि कुंडली के छठे भाव में हो तो विदेश यात्रा योग बनता है।

चन्द्रमा यदि दशवें भाव में हो या दशवें भाव पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो विदेश यात्रा योग बनता है।

चन्द्रमा यदि सप्तम भाव या लग्न में हो तो भी विदेश से जुड़कर व्यापार का योग बनता है।

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शनि आजीविका का कारक है अतः कुंडली में शनि और चन्द्रमा का योग भी विदेश यात्रा या विदेश में आजीविका का योग बनाता है।

यदि कुंडली में दशमेश बारहवें भाव और बारहवें भाव का स्वामी दशवें भाव में हो तो भी विदेश में या विदेश से जुड़कर काम करने का योग होता है।

यदि भाग्येश बारहवें भाव में और बारहवें भाव का स्वामी भाग्य स्थान (नवेंभाव) में हो तो भी विदेश यात्रा का योग बनता है।

यदि लग्नेश बारहवें भाव में और बारहवें भाव का स्वामी लग्न में हो तो भी व्यक्ति विदेश यात्रा करता है।

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भाग्य स्थान में बैठा राहु भी विदेश यात्रा का योग बनाता है।

यदि सप्तमेश बारहवें भाव में हो और बारहवें भाव का स्वामी सातवें भाव में हो तो भी विदेश यात्रा या विदेश से जुड़कर व्यापार करने का योग बनता है।

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शनिवार को कर लेंगे 5 में से कोई 1 उपाय तो बड़ी-बड़ी परेशानियों से मुक्ति मिल सकती है https://www.astrologyofmylife.com/shani-upay/ https://www.astrologyofmylife.com/shani-upay/#respond Sat, 15 Sep 2018 07:22:23 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=2571 शनि की शुभ-अशुभ स्थिति से व्यक्ति का पूरा जीवन बदल सकता है। शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए काले तिल से जुड़े उपाय बताए गए हैं। यहां जानिए काले तिल के 5 उपाय, जिनसे शनि दोष दूर हो सकते हैं। ये सभी उपाय खासतौर पर शनिवार को करना चाहिए… Shri Shani Yantra शिवजी के साथ …
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शनि की शुभ-अशुभ स्थिति से व्यक्ति का पूरा जीवन बदल सकता है। शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए काले तिल से जुड़े उपाय बताए गए हैं। यहां जानिए काले तिल के 5 उपाय, जिनसे शनि दोष दूर हो सकते हैं। ये सभी उपाय खासतौर पर शनिवार को करना चाहिए…

Shri Shani Yantra

  1. शिवजी के साथ ही शनि को प्रसन्न करने के लिए शिवलिंग की विधि-विधान से पूजा करें। यदि विधिवत पूजा नहीं कर पा रहे हैं तो एक लोटे में शुद्ध जल भरें और उसमें काले तिल डाल दें। अब इस जल को शिवलिंग पर ऊँ नम: शिवाय मंत्र जाप करते हुए चढ़ाएं। जल पतली धार से चढ़ाएं और मंत्र का जाप करते रहें। जल चढ़ाने के बाद फूल और बिल्व पत्र चढ़ाएं। इस उपाय से शुभ फल प्राप्त होने की संभावनाएं बढ़ती हैं।
  2. कुंडली में शनि के दोष हों या शनि की साढ़ेसाती या ढय्या चल रही हो तो किसी पवित्र नदी में हर शनिवार काले तिल प्रवाहित करना चाहिए। इस उपाय से शनि के दोषों की शांति होती है।
  3. दूध में काले तिल मिलाकर पीपल पर चढ़ाएं। इससे बुरा समय दूर हो सकता है। यह उपाय हर शनिवार को करना चाहिए।
  4. काले तिल का दान करें। इससे राहु-केतु और शनि के बुरे प्रभाव समाप्त हो जाते हैं। कालसर्प योग, साढ़ेसाती, ढय्या, पितृ दोष आदि में भी यह उपाय किया जा सकता है।
  5. हर शनिवार काले तिल, काली उड़द को काले कपड़े में बांधकर किसी गरीब व्यक्ति को दान करें। इस उपाय से पैसों से जुड़ी समस्याएं दूर हो सकती हैं।

Online Astrologer – Acharya Dr MSD Arya

 

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