asrologyofmylife Archives - Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India https://www.astrologyofmylife.com/tag/asrologyofmylife/ Best Astrologer and Vastu Consultant at Pitampura Delhi - Acharya Dr. MSD Arya, Astrologer, Numerologist, Vastu Consultant, Gems Suggestions, best vastu consultant, moksha mukti, Best Astrologer, Astrology, Lal Kitab, Numerology, Horoscope, Matchmaking Astrologer, Astro SHop, Acharya Arya, Astro Arya, Astro arjuna, BlackMagic, hindu Panchang, Rashifal, Love, vashikaran, Thantrik, Raghava Bhatt, Moksha Mukti Jyotish and vastu Sansthan Delhi INdia Mon, 06 Oct 2025 16:44:29 +0000 en-GB hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0.2 https://www.astrologyofmylife.com/wp-content/uploads/2024/02/cropped-Moksha-Mukti-logo-latest-32x32.png asrologyofmylife Archives - Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India https://www.astrologyofmylife.com/tag/asrologyofmylife/ 32 32 Story of Gaya Pilgrimage https://www.astrologyofmylife.com/story-of-gaya-pilgrimage-shraddh/ https://www.astrologyofmylife.com/story-of-gaya-pilgrimage-shraddh/#respond Sat, 25 Sep 2021 18:18:15 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=18675 गया तीर्थ की कथा (Story of Gaya Pilgrimage) ब्रह्माजी जब सृष्टि की रचना कर रहे थे उस दौरान उनसे असुर कुल में गया नामक असुर की रचना हो गई,  गया असुरों के संतान रूप में पैदा नहीं हुआ था इसलिए उसमें आसुरी प्रवृति नहीं थी. वह देवताओं का सम्मान और आराधना करता था। उसके मन …
Continue reading Story of Gaya Pilgrimage

The post Story of Gaya Pilgrimage appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>
गया तीर्थ की कथा (Story of Gaya Pilgrimage)

ब्रह्माजी जब सृष्टि की रचना कर रहे थे उस दौरान उनसे असुर कुल में गया नामक असुर की रचना हो गई,  गया असुरों के संतान रूप में पैदा नहीं हुआ था इसलिए उसमें आसुरी प्रवृति नहीं थी. वह देवताओं का सम्मान और आराधना करता था।

उसके मन में एक खटका था. वह सोचा करता था कि भले ही वह संत प्रवृति का है लेकिन असुर कुल में पैदा होने के कारण उसे कभी सम्मान नहीं मिलेगा, इसलिए क्यों न अच्छे कर्म से इतना पुण्य अर्जित किया जाए ताकि उसे स्वर्ग मिले।

https://www.astrologyofmylife.com/product/astrology-of-my-life-online-consultant-acharya-arya/

गयासुर ने कठोर तप से भगवान श्री विष्णुजी को प्रसन्न किया, भगवान ने वरदान मांगने को कहा तो गयासुर ने मांगा- आप मेरे शरीर में वास करें, जो मुझे देखे उसके सारे पाप नष्ट हो जाएं. वह जीव पुण्यात्मा हो जाए और उसे स्वर्ग में स्थान मिले।

भगवान से वरदान पाकर गयासुर घूम-घूमकर लोगों के पाप दूर करने लगा. जो भी उसे देख लेता उसके पाप नष्ट हो जाते और स्वर्ग का अधिकारी हो जाता।

Get Appointment

इससे यमराज की व्यवस्था गड़बड़ा गई. कोई घोर पापी भी कभी गयासुर के दर्शन कर लेता तो उसके पाप नष्ट हो जाते. यमराज उसे नर्क भेजने की तैयारी करते तो वह गयासुर के दर्शन के प्रभाव से स्वर्ग मांगने लगता. यमराज को हिसाब रखने में संकट हो गया था।

यमराज ने ब्रह्माजी से कहा कि अगर गयासुर को न रोका गया तो आपका वह विधान समाप्त हो जाएगा जिसमें आपने सभी को उसके कर्म के अनुसार फल भोगने की व्यवस्था दी है. पापी भी गयासुर के प्रभाव से स्वर्ग भोंगेगे।

ब्रह्माजी​ ने उपाय निकाला. उन्होंने गयासुर  (Story of Gaya Pilgrimage)  से कहा कि तुम्हारा शरीर सबसे ज्यादा पवित्र है इसलिए तुम्हारी पीठ पर बैठकर मैं सभी देवताओं के साथ यज्ञ करुंगा।

उसकी पीठ पर यज्ञ होगा यह सुनकर गया​ सहर्ष तैयार हो गया. ब्रह्माजी सभी देवताओं के साथ पत्थर से गया को दबाकर बैठ गए. इतने भार के बावजूद भी वह अचल नहीं हुआ. वह घूमने-फिरने में फिर भी समर्थ था।

Horoscope

देवताओं को चिंता हुई. उन्होंने आपस में सलाह की कि इसे श्री विष्णु ने वरदान दिया है इसलिए अगर स्वयं श्री हरि भी देवताओं के साथ बैठ जाएं तो गयासुर अचल हो जाएगा. श्री हरि भी उसके शरीर पर आ बैठे।

श्री विष्णु जी को भी सभी देवताओं के साथ अपने शरीर पर बैठा देखकर गयासुर ने कहा- आप सब और मेरे आराध्य श्री हरि की मर्यादा के लिए अब मैं अचल हो रहा हूं. घूम-घूमकर लोगों के पाप हरने का कार्य बंद कर दूंगा।

लेकिन मुझे चूंकि श्री हरि का आशीर्वाद है इसलिए वह व्यर्थ नहीं जा सकता इसलिए श्री हरि आप मुझे पत्थर की शिला बना दें और यहीं स्थापित कर दें।

Prashna Kundli by Acharya Arya

श्री हरि उसकी इस भावना से बड़े खुश हुए. उन्होंने कहा- गया अगर तुम्हारी कोई और इच्छा हो तो मुझसे वरदान के रूप में मांग लो।

गया (Story of Gaya Pilgrimage)  ने कहा- ” हे नारायण मेरी इच्छा है कि आप सभी देवताओं के साथ अप्रत्यक्ष रूप से इसी शिला पर विराजमान रहें और यह स्थान मृत्यु के बाद किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के लिए तीर्थस्थल बन जाए.”

श्री विष्णु ने कहा- गया (Story of Gaya Pilgrimage)  तुम धन्य हो. तुमने लोगों के जीवित अवस्था में भी कल्याण का वरदान मांगा और मृत्यु के बाद भी मृत आत्माओं के कल्याण के लिए वरदान मांग रहे हो. तुम्हारी इस कल्याणकारी भावना से हम सब बंध गए हैं।

भगवान ने आशीर्वाद दिया कि जहां गया स्थापित हुआ वहां पितरों के श्राद्ध-तर्पण आदि करने से मृत आत्माओं को पीड़ा से मुक्ति मिलेगी. क्षेत्र का नाम गयासुर के अर्धभाग गया नाम से तीर्थ रूप में विख्यात होगा. मैं स्वयं यहां विराजमान रहूंगा।

Life Prediction

इस तीर्थ से समस्त मानव जाति का कल्याण होगा।साथ ही वहा भगवान “श्री विष्णुजी​* ने अपने पेर का निशान स्थापित किया जो आज भी वहा के मंदिर मे दर्शनीय हे |

गया विधि के अनुसार श्राद्ध फल्गू नदी के तट पर विष्णु पद मंदिर में व अक्षयवट के नीचे किया जाता है।

वह स्थान बिहार के गया में हुआ जहां श्राद्ध आदि करने से पितरों का कल्याण होता हैl

पिंडदान की शुरुआत कब और किसने की, यह बताना उतना ही कठिन है जितना कि भारतीय धर्म-संस्कृति के उद्भव की कोई तिथि निश्चित करना। परंतु स्थानीय पंडों का कहना है कि सर्व प्रथम सतयुग में ब्रह्माजी ने पिंडदान किया था।

महाभारत के ‘वन पर्व’ में भीष्म पितामह और पांडवों की गया-यात्रा का उल्लेख मिलता है। श्रीराम ने महाराजा दशरथ का पिण्ड दान यहीं (गया) में किया था। गया के पंडों के पास साक्ष्यों से स्पष्ट है कि मौर्य और गुप्त राजाओं से लेकर कुमारिल भट्ट, चाणक्य, रामकृष्ण परमहंस व चैतन्य महाप्रभु जैसे महापुरुषों का भी गया में पिंडदान करने का प्रमाण मिलता है। गया में फल्गू नदी प्रायः सूखी रहती है। इस संदर्भ में एक कथा प्रचलित है।

Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya

भगवान श्री राम अपनी पत्नी सीताजी के साथ पिता दशरथ का श्राद्ध करने गयाधाम पहुंचे। श्राद्ध कर्म के लिए आवश्यक सामग्री लाने वे चले गये। तब तक राजा दशरथ की आत्मा ने पिंड की मांग कर दी। फल्गू नदी तट पर अकेली बैठी सीताजी अत्यंत असमंजस में पड़ गई। माता सीताजी​ ने फल्गु नदी, गाय, वटवृक्ष और केतकी के फूल को साक्षी मानकर पिंडदान कर दिया।जब भगवान श्री राम आए तो उन्हें पूरी कहानी सुनाई, परंतु भगवान को विश्वास नहीं हुआ।

तब जिन्हें साक्षी मानकर पिंडदान किया था, उन सबको सामने लाया गया। पंडा, फल्गु नदी, गाय और केतकी फूल ने झूठ बोल दिया परंतु अक्षयवट ने सत्यवादिता का परिचय देते हुए माता की लाज रख ली….।

Married Life Report

इससे क्रोधित होकर सीताजी ने फल्गू नदी को श्राप दे दिया कि तुम सदा सूखी रहोगी जबकि गाय को मैला खाने का श्राप दिया केतकी के फूल को पितृ पूजन मे निषेध का। वटवृक्ष पर प्रसन्न होकर सीताजी ने उसे सदा दूसरों को छाया प्रदान करने व लंबी आयु का वरदान दिया। तब से ही फल्गू नदी हमेशा सूखी रहती हैं, जबकि वटवृक्ष अभी भी तीर्थयात्रियों को छाया प्रदान करता है। आज भी फल्गू तट पर स्थित सीता कुंड में बालू का पिंड दान करने की क्रिया (परंपरा) संपन्न होती है।

Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan – Astrology of My Life – Vedic Jyotish, K P Jyotish, Numerology, Palmistry and Vastu Expert

: इन पितृ पक्ष के16दिनों में सभी दिवंगत आत्माओं को याद करते हुए उनकी स्मृति में नेक कार्य करें यही उनके प्रति सही श्रद्धांजलि होगी।

e-visiting card - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India

The post Story of Gaya Pilgrimage appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>
https://www.astrologyofmylife.com/story-of-gaya-pilgrimage-shraddh/feed/ 0
Tripindi Shraddha Puja – Moksha Mukti Sansthan – astrology of my life https://www.astrologyofmylife.com/tripindi-shraddha-puja/ https://www.astrologyofmylife.com/tripindi-shraddha-puja/#respond Wed, 18 Aug 2021 10:52:31 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17806 त्रिपिंडी श्राद्ध क्या है…? त्रिपिंडी श्राद्ध का अर्थ है पिछली तीन पीढ़ियों के हमारे पूर्वजों के पिंड दान। अगर पिछली तीन पीढ़ियों से परिवार में यदि किसी का भी बहुत कम उम्र या बुढ़ापे में निधन हो गया हो। तो वे लोग हमारे लिए समस्या पैदा करते हैं। उन लोगों को मुक्त अथवा उनकी आत्मा …
Continue reading Tripindi Shraddha Puja – Moksha Mukti Sansthan – astrology of my life

The post Tripindi Shraddha Puja – Moksha Mukti Sansthan – astrology of my life appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>
त्रिपिंडी श्राद्ध क्या है…?

त्रिपिंडी श्राद्ध का अर्थ है पिछली तीन पीढ़ियों के हमारे पूर्वजों के पिंड दान।

अगर पिछली तीन पीढ़ियों से परिवार में यदि किसी का भी बहुत कम उम्र या बुढ़ापे में निधन हो गया हो।

तो वे लोग हमारे लिए समस्या पैदा करते हैं।

उन लोगों को मुक्त अथवा उनकी आत्मा की शांति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध करना पड़ता है।

प्रियजनों लोगों की याद में त्रिपिंडी श्राद्ध एक योगदान मन जाता है ।

ऐसा माना जाता है की यदि लगातार तीन वर्षों तक यह योगदान नहीं किया गया तो वे प्रियजन (मृतक) क्रोधित हो जाते है ।

Online Astrologer – Acharya Dr MSD Arya

इसलिए उन्हें शांत करने के लिए ये योगदान किए जाते हैं।

अधिकांश लोगों का विचार है कि त्रिपिंडी का अर्थ है 3 पीढ़ी के पूर्वजों (पिता-माता, दादाजी-दादी और परदादा- परदादी ) को संतुष्ट करना।

लेकिन यह 3 पीढ़ियों के साथ प्रकट नहीं होता है। अपितु वे तीन  ‘अस्मदकुले’, ‘मातमहा’, भ्राता  पक्ष , ससुराल पक्ष और शिक्षक पक्ष का संकेत देते हैं।

कोई भी आत्मा जो अपने जीवन में शांत नहीं है और शरीर छोड़ चुकी है, भविष्य की पीढ़ियों को परेशान करती है।

Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya

ऐसी आत्मा को ‘त्रिपिंडी श्राद्ध’ की सहायता से मोक्ष की प्राप्ति करवाई जा सकती  है।

श्राद्ध का उद्देस्य पूर्वजों के लिए उनके अपने वंशजों द्वारा ईमानदारी से किया गया अनुष्ठान है।

त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा

त्रिपिंडी श्राद्ध एक ऐसा अनुष्ठान है जो परिचित और भौतिक चीजों की तरह कुछ हासिल करने के लिए किया जाता है।

इसलिए त्रिपिंडी श्राद्ध को “काम्य श्राद्ध” कहा जाता है। श्राद्धकर्मकर्ता शास्त्र के अनुसार, यह कहा जाता है कि पुरखों का श्राद्ध एक वर्ष में 72 बार किया जाना चाहिए।

यदि श्राद्ध कई वर्षों तक नहीं किया जाता है तो (माता -पिता, दादा -दादी ) पूर्वजों की आत्मा दुखी रहती है।

Married Life Report

प्रत्येक व्यक्ति को अपने पूर्वजों का श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। यदि श्राद्ध अनुष्ठान नहीं किया जाता हैतो।

वंशज को पूर्वज दोष के कारण विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है ।

और इस प्रकार के दोष “त्रिपिंडी श्राद्ध” से अनुष्ठान करना पड़ता है।

साथ ही उसी श्राद्ध को पारंपरिक रूप से गन्धर्व, शाकिनी।

जैसे डाकिनी आदि के भूतों के अत्याचारों से मुक्त होने के लिए भी किया जाता है।

पारंपरिक रूप से त्रिपिंडी श्राद्ध का अनुष्ठान करने का उद्देस्य है

कि घर में लड़ाई, शांति की कमी, अक्सर बीमारियों का कारण पुरुषत्व की भावना पैदा करते हैं। असफलता, असामयिक मृत्यु, इच्छा की पूर्ति न होना।

Prashna Kundli by Acharya Arya

व्यावसायिक समृद्धि की कमी, उचित अवधि तक शादी न होना और बांझपन आदि जैसी समस्याओं का हल निकलन हैं।

त्रिपिंडी अनुष्ठान पूजा (Tripindi Shraddha Puja)

त्रिपिंडी श्राद्ध अनुष्ठान में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान रुद्र(शिव) की भक्तिपूर्वक पूजा की जाती है।

भगवान ब्रम्हा, विष्णु और रुद्र क्रमशः सम्माननीय, राजसी और गर्म स्वभाव के प्रतिनिधि हैं।

नैतिक पूवजों की आत्माओं के कष्ट से राहत पाने के लिए भगवान ब्रह्मदेव की पूजा की जाती है और जौ का आटा अर्पित किया जाता  है ।

शाही पूर्वजों की आत्माओं के कष्ट से राहत पाने के लिए भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और चावल का आटा  अर्पित किया जाता है ।

Horoscope

और साथ ही गर्म स्वभाव वाले पूर्वजों की आत्माओं के कष्ट से छुटकारा पाने के लिए भगवान रुद्र की पूजा की जाती है।

तिल की गांठका आटा अर्पित किया जाता।

जिस व्यक्ति का बचपन, युवावस्था और वृद्धावस्था में निधन हो जाता है और उनकी आत्मा संतुष्ट नहीं होती है ।

उसी अवस्था में सम्मानित आत्मा को मोक्ष प्राप्त करने के लिए, वही त्रिपिंडी श्राद्ध अनुष्ठान करना चाहिए।

उसी अनुष्ठान में पूर्वजों के नाम और “गोत्र” का नाम नहीं उच्चरित किया जाता है क्योंकि हमें इस बात का कोई सही ज्ञान नहीं है ।

कि हम किन पूर्वजों के दुख से पीड़ित हैं और किन पूर्वजों की आत्मा दुखी है।

तो हमारे पूर्वजों की हर असंतुष्ट आत्मा को मुक्ति दिलाने के  लिए ।

Career Report : One Year

“त्रिपिंडी श्राद्ध” अनुष्ठान धर्मशास्त्र के अनुसार किया जाता है।

ऐसी विपदाओं के निवारण के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। इसकी पुष्टि “श्राद्ध चिंतामणि” में की गई है।

त्रिपिंडी श्राद्ध विधि (Tripindi Shraddha Puja)

आम तौर पर जब एक अधेड़ उम्र या वृद्ध इंसान का निधन हो जाता है ।

तो लोग उसका पिंड दान, श्राद्ध और अन्य सभी अनुष्ठान करते हैं।

लेकिन अगर कोई छोटा बच्चा या युवा गुजर जाता है तो सभी रस्में नहीं की जाती हैं।

यह उनकी आत्माओं को एक दुष्चक्र में डालता है और यह हमारे लिए कठिनाइयों का कारण बनता है।

और इसलिए त्रिपिंडी श्राद्ध को इन आत्माओं को मुक्त करने और स्वर्ग की ओर भेजने के लिए किया जाना चाहिए।

उनकी पुण्यतिथि पर हर साल उचित श्राद्ध करना बहुत आवश्यक है।

Signature Design

दूसरी बात, भाद्रपद माह के पितृपक्ष में पारिवारिक श्राद्ध करना होता है। ये अनुष्ठान सम्वत्सरिक श्राद्ध और महालया श्राद्ध हैं।

यदि दोनों श्राद्ध तीन क्रम वर्षों तक लगातार नहीं किए जाते हैं ।

तो यह वर्तमान में पितृदोष का कारण बनता है।

इसके अतिरिक्त , यह हमारे पूर्वजों की आत्माओं को दर्द और समस्याओं का कारण बनता है ।

और वे प्रेता योनी या आत्माओं के दायरे में प्रवेश करते हैं।

नतीजतन, वे हमारे वर्तमान जीवन में मुद्दों का कारण बनते हैं ।

क्योंकि हमारे पूर्वज हमारे माध्यम से मोक्ष की उम्मीद करते हैं।

इस स्थिति को पितृदोष कहा जाता है।

त्रिपिंडी पूजा कौन करे ? (Tripindi Shraddha Puja)

इस दोष से मुक्ति  पाने का एक तरीका यह है कि हमारे पवित्र ग्रंथों में बताए अनुसार त्रिपिंडी श्राद्ध करें।

Gemstone Suggestion

जिस व्यक्ति की कुंडली में इस प्रकार का दोष पाया जाता है, उसे त्रिपिंडी श्राद्ध करना चाहिए।

विवाहित और अविवाहित दोनों ही त्रिपिंडी श्राद्ध कर सकते हैं।

केवल अविवाहित महिलाएं त्रिपिंडी श्राद्ध नहीं कर सकती हैं। परिवार का कोई भी व्यक्ति त्रिपिंडी श्राद्ध कर सकता है।

इस धार्मिक अनुष्ठान को एक पवित्र स्थान पर किया जाना चाहिए जिसका उद्देश्य अशांत आत्माओं को मुक्ति दिलाना है।

इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश मुख्य रूप से पूजे जाते हैं।

पृथ्वी से, आकाश से और आत्मा से, दो प्रकार के, पुण्य, कण, अनियंत्रित शिशु, युवा और वृद्ध सभी चरणों में मृत भावुक भावनाओं के साथ हानि पहुँचाते हैं।

और अंत में परंपरा और परंपराओं के अनुसार त्रिपिंडी श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

इस अनुष्ठान से पहले गंगा में अर्पण और शरीर शुद्धि के लिए पवित्र स्नान करना महत्वपूर्ण है।

यहाँ स्केहुर महत्वपूर्ण नहीं है। चूँकि शेखर अभिव्यक्ति का हिस्सा है, त्रिपिंडी संस्कार पत्नी के साथ किया जाना चाहिए है।

यह संस्कार आप यदि अविवाहित हैं या विधुर(तलाकशुदा ) होने पर भी कर सकते हैं।

इसमें भगवान ब्रह्मा (रजत), विष्णु (स्वर्ण), रुद्र (ताम्र) व्याप्त हैं।

त्रिपिंडी श्राद्ध विधि (Tripindi Shraddha Puja)

त्रिपिंडी संस्कार महाकाल  व त्र्यंबकेश्वर  में किया जा सकता है।

प्रियजनों  को भेंट देने के इस धार्मिक कार्य में, ‘येचुकीप्रपीन पिंडयन्ते च महेश्वर’में भी इसका उल्लेख किया है।

यह काम श्राद्ध यानि अर्पण करने से आत्माएं राक्षसों से अलग हो जाता है।

नवरात्रा के उत्सव के समय यह काम श्राद्ध न करें। उसी दिन त्रिपिंडी श्राद्ध और तीर्थ श्राद्ध भी नहीं करना चाहिए।

इसे अलग-अलग दिनों में करें लेकिन अगर आपके पास समय कम है ।

तो सबसे पहले त्रिपिंडी श्राद्ध करें और फिर तीर्थ श्राद्ध करें।

इस धार्मिक अनुष्ठान को एक पवित्र स्थान पर किया जाना चाहिए जिसका उद्देश्य अशांत आत्माओं को मुक्ति दिलाना है।

Get Appointment

इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश मुख्य रूप से पूजे जाते हैं।

पृथ्वी से, आकाश से और आत्मा से, दो प्रकार के, पुण्य, कण, अनियंत्रित शिशु, युवा और वृद्ध सभी चरणों में मृत भावुक भावनाओं के साथ हानि पहुँचाते हैं।

और अंत में परंपरा और परंपराओं के अनुसार त्रिपिंडी श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

इस अनुष्ठान से पहले गंगा में अर्पण और शरीर शुद्धि के लिए पवित्र स्नान करना महत्वपूर्ण है। यहाँ स्केहुर महत्वपूर्ण नहीं है।

चूँकि शेखर अभिव्यक्ति का हिस्सा है, त्रिपिंडी संस्कार पत्नी के साथ किया जाना चाहिए है।

यह संस्कार आप यदि अविवाहित हैं या विधुर(तलाकशुदा ) होने पर भी कर सकते हैं।

इसमें भगवान ब्रह्मा (रजत), विष्णु (स्वर्ण), रुद्र (ताम्र) व्याप्त हैं।

त्रिपिंडी श्राद्ध करने के लाभ (Tripindi Shraddha Puja)

अन्य श्राद्ध पूजा एक विशिष्ट व्यक्ति के लिए की जाती है ।

यह पूजा पूर्वजों की तीन पीढ़ियों तक ही सीमित होती है।

अर्थात् पिता, दादा और परदादा, त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा, तीन पीढ़ियों से पूर्व के साथ-साथ पूर्वजों को भी शांत करती है।

इस प्रकार यह आग्रह किया जाता है ।

कि प्रत्येक परिवार को हर बारह वर्ष में कम से कम एक बार इस समारोह को करना चाहिए।

इसके अलावा, यदि किसी ब्यक्ति या जातक की कुंडली में परिलक्षित होता है।

या किसी के कुंडली में पितृ दोष है ।

तो यह श्राद्ध पूजा, दोषों के प्रभाव से राहत पाने के लिए सबसे महत्वापूर्ण है।

यदि हमारे पुरखे(पूर्वज ) हमसे अच्छी तरह से प्रसन्न हैं, तो वे हमें संतान, सुख और समृद्धि के रूप में आशीर्वाद देते  हैं।

हमारे पूर्वजों के आशीर्वाद को दैवीय आशीर्वाद के समान माना जाता है।

श्राद्ध पूजा के लिए (Tripindi Shraddha Puja)

अभी गुरूजी से संपर्क करे +919999954145 और पूजा के बारे में सभी जानकारी जानिए ।

Contact to Acharya ji +919999954145

त्रिपिंडी श्राद्ध इसलिए किया जाता है ताकि मृतकों की आत्माओं को मोक्ष का मार्ग मिल जाए।

इस पूजा को करने से परिवार को पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है।

इस पूजा का मुख्य लाभ यह है कि इससे परिवार को सुख और शांति मिलती है। परिवार के सदस्य रोग मुक्त और स्वस्थ रहते हैं।

इससे परिवार को धन भी मिलता है।

यह पूजा अच्छे विवाह प्रस्तावों और योग का भाग्य भी लाती है। परिवार में कोई भी युवा अवस्था में नहीं मरता है।

यह पूजा उनके पेशेवर जीवन में प्रगति लाती है।

त्रिपिंडी श्राद्ध करने वाले लोगों को सभी 3 दुनिया में सम्मान मिलता है। और किसी को अपनी मृत्यु के बाद मोक्ष मिलता है।

अगर उसने अपने पूर्वजों के लिए इस पूजा अनुष्ठान किया है।

Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan – Astrology of My Life – Vedic Jyotish, K P Jyotish, Numerology, Palmistry and Vastu Expert

 

The post Tripindi Shraddha Puja – Moksha Mukti Sansthan – astrology of my life appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>
https://www.astrologyofmylife.com/tripindi-shraddha-puja/feed/ 0
अंगारक योग – संघर्षकारी मंगल और राहु-केतु का योग https://www.astrologyofmylife.com/what-is-angarak-dosh/ https://www.astrologyofmylife.com/what-is-angarak-dosh/#respond Fri, 04 Jun 2021 12:14:08 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17789 संघर्षकारी मंगल और राहु-केतु का योग(Angarak Yog ek Dosh) संघर्षकारी मंगल और राहु का योग(Angarak Yog ek Dosh) Varshphal Report राहु के नैसर्गिक गुण/अवगुण राहु जातक, सिर और चेहरे, छायादार, धुएँ, बदसूरत अजीब दिखने वाला, धुएँ के रंग का (नीला या काला) रंग, मनमोहक, तर्कहीन, तर्कशील, कर्कश, हठी, तामसिक स्वभाव का, सिपाही, नकली, कपटी, स्वार्थी, …
Continue reading अंगारक योग – संघर्षकारी मंगल और राहु-केतु का योग

The post अंगारक योग – संघर्षकारी मंगल और राहु-केतु का योग appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>

संघर्षकारी मंगल और राहु-केतु का योग(Angarak Yog ek Dosh)

संघर्षकारी मंगल और राहु का योग(Angarak Yog ek Dosh)

Varshphal Report

राहु के नैसर्गिक गुण/अवगुण राहु जातक, सिर और चेहरे, छायादार, धुएँ, बदसूरत अजीब दिखने वाला, धुएँ के रंग का (नीला या काला) रंग, मनमोहक, तर्कहीन, तर्कशील, कर्कश, हठी, तामसिक स्वभाव का, सिपाही, नकली, कपटी, स्वार्थी, चालाक, चालाकी, भ्रम, भ्रम, धुँआ आदि विषयों का राहु कारक है। भ्रामक, स्वार्थी, जोखिम लेने वाला, वर्जित तोड़ने वाला, चालाक, विद्रोही, धुआं, जोड़ तोड़, चिंतनशील, महत्वाकांक्षी, भूखा, प्रवर्धक आदि।

Get Appointment

मंगल के नैसर्गिक गुण/अवगुण मंगल ग्रह अग्नि है, जो सभी ग्रहों में सबसे अधिक प्रबल है। यह क्षत्रिय (योद्धा), राशि का स्वामी मेष, वृश्चिक 1 और 8 वीं राशि का स्वामी, सेना पुरुष, अस्त्र और शस्त्र शौर्य, वीरता, क्रोध, भूमि के गुण, विवाद, षड्यंत्र, दुर्घटना, घाव, मर्दाना शक्ति, यंत्र, वैधानिकता और मुकदमेबाजी मंगल ग्रह से संबंधित और प्रतिनिधित्व वाले सभी विषय हैं। आक्रामक, गर्म स्वभाव, योद्धा, साहस, भाईचारा, दुर्घटना, तेज बुखार, रक्तचाप, कार्रवाई, सर्जक, जुनून, इच्छा, आवेगी, ज्वालामुखी विस्फोट आदि। (Angarak Yog ek Dosh)
जब राहु और मंगल एक ही भाव में युति बनाते हैं, तो वह मंगल राहु अंगारक योग कहलाता है। मंगल ऊर्जा का स्रोत है, जो अग्नि तत्व से संबद्घ है, जबकि राहु भ्रम व नकारात्मक भावनाओं से जुड़ा हुआ है। जब दोनों ग्रह एक ही भाव में एकत्र होते हैं तो उनकी शक्ति पहले से अधिक हो जाती है।
ज्योतिष में मंगल को क्रोध, वाद विवाद, लड़ाई झगड़ा, हथियार, दुर्घटना, एक्सीडेंट, अग्नि, विद्युत आदि का कारक ग्रह माना गया है तथा राहु को आकस्मिकता, आकस्मिक घटनाएं, शत्रु, षड़यंत्र, नकारात्मक ऊर्जा, तामसिकता, बुरे विचार, छल, और बुरी आदतों का
कारक ग्रह माना गया है, इसलिए फलित ज्योतिष में मंगल और राहु के योग को बाहुत नकारात्मक और उठापटक कराने वाला योग माना गया है मंगल और राहु स्वतंत्र रूप से अलग अलग इतने नकारात्मक नहीं होते पर जब मंगल और राहु का योग होता है तो इससे मंगल और राहु की नकारात्मक प्रचंडता बहुत बढ़ जाती है जिस कारण यह योग विध्वंसकारी प्रभाव दिखाता है, मंगल राहु का योग प्राकृतिक और सामाजिक उठापटक की स्थिति तो बनाता ही है पर व्यक्तिगत रूप से भी मंगल राहु का योग नकारात्मक परिणाम देने वाला ही होता है। (Angarak Yog ek Dosh)
यदि जन्मकुंडली में मंगल और राहु एक साथ हो अर्थात कुंडली में मंगल राहु का योग हो तो सर्वप्रथम तो कुंडली के जिस भाव में यह योग बन रहा हो उस भाव को पीड़ित करता है और उस भाव से नियंत्रित होने वाले घटकों में संघर्ष की स्थिति बनी रहती है उदाहरण के लिए यदि कुंडली के लग्न भाव में मंगल राहु का योग हो तो ऐसे में स्वास्थ पक्ष की और से हमेशा कोई न कोई समस्या लगी रहेगी, धन भाव में मंगल राहु का योग होने पर आर्थिक संघर्ष और क़ुतुब के सुख में कमी होगी इसी प्रकार पंचम भाव में मंगल राहु का योग शिक्षा और संतान पक्ष को बाधित करेगा।

Horoscope

इसके अलावा कुंडली में मंगल राहु का योग होने से व्यक्ति का क्रोध विध्वंसकारी होता है, समान्य रूप से तो प्रत्येक व्यक्ति को क्रोध आता है पर कुंडली में राहु मंगल का योग होने पर व्यक्ति का क्रोध बहुत प्रचंड स्थिति में होता है और व्यक्ति अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं कर पाता और बहुत बार क्रोध में बड़े गलत कदम उठा बैठता है, कुंडली में मंगल राहु का योग होने पर जीवन में दुर्घटनाओं की अधिकता होती है और कई बार दुर्घटना या एक्सीडेंट का सामना करना पड़ता है कुंडली में मंगल राहु का योग होने पर व्यक्ति को वहां चलाने में भी सावधानी बरतनी चाहिए , कुंडली में मंगल राहु का योग होने पर व्यक्ति को शत्रु और विरोधियों की और से भी बहुत समस्याएं रहती है और जीवन में वाद विवाद तथा झगड़ों की अधिकता होती है, कुंडली में मंगल राहु का योग बड़े भाई के सुख में कमी या वैचारिक मतभेद उत्पन्न करता है और मंगल राहु के योग के नकारात्मक परिणाम के कारण ही व्यक्ति को जीवन में कर्ज की समस्या का भी सामना करना पड़ता है, इसके अलावा यदि स्त्री जातक की कुंडली में मंगल राहु का योग हो तो वैवाहिक जीवन को बिगड़ता है स्त्री की कुंडली में मंगल पति और मांगल्य का प्रतिनिधि ग्रह होता है और राहु से पीड़ित होने के कारण ऐसे में पति सुख में कमी या वैवाहिक जीवन में संघर्ष की स्थिति बनी रहती है, जिन लोगो की कुंडली में मंगल राहु का योग होता है उन्हें अक्सर जमीन जायदात से जुडी समस्याएं भी परेशान करती हैं इसके अलावा मंगल राहु का योग हाई बी.पी. मांसपेशियों की समस्या, एसिडिटी, अग्नि और विद्युत दुर्घटना जैसी समस्याएं भी उत्पन्न करता है l

संघर्षकारी मंगल और केतु का योग (Angarak Yog ek Dosh)

Married Life Report

ज्योतिष शास्त्र में जब दो ग्रहों का प्रभाव एक जैसा हो तो उस प्रभाव की मिलने की सम्भावनाये बढ जाती हैं। इसी नियम के अधार पर ज्योतिष के समस्त योगों का निर्माण होता है। योग चाहे शुभ हो या अशुभ कारण यही नियम होगा। इस नियम के अनुसार जब किसी वस्तु, तत्व या गुण का प्रतिनिधित्व करने वाले दो ग्रह(ग्रह-भाव) का सयुंक्त प्रभाव एक साथ पडें तो उन के प्रभाव पर दोहरा बल काम करता है। यह नियम ग्रह बल तथा भाव के बल पर भी निर्भर करता है। जैसे शुक्र गुरु का सम्बंध, परस्पर एक दूसरे के विपरीत होने पर भी यें जातक को अत्यधिक विद्वान बनाते हैं, कारण स्पष्ट है कि इन दोनो ही ग्रहों को गुरु का पद प्राप्त है। इसी तरह अंगारक योग भी काम करता है।(Angarak Yog ek Dosh)मंगल तथा केतु की युक्ति अंगारक योग कहलाती है। यह अंगारक योग केतु व मंगल के सन्युक्त प्रभाव से बनता है। मंगल का दूसरा नाम अंगारक है। मंगल तिक्ष्ण, क्रूर, मारक क्षमता से युक्त ग्रह हैं। मंगल का जन्म कुंडली में अकेला प्रभाव भी हानिकारक हैं। जैसा की आपको ज्ञात है कि मंगल की विशेष भावों में स्थिति मंगल दोष को उत्पन्न करती है। मंगल जन्म कुंडली में सर्वाधिक पीडादायक ग्रह होता है। मंगल के समान ही केतु भी कष्ट दायक ग्रह होता है।(Angarak Yog ek Dosh)इसीलिये ज्योतिष शास्त्र मे मंगल के समान केतु कहा जाता है। इन दोनो का जन्म कुंडली में सन्युक्त प्रभाव मंगल की दोगुणी ताकत के समान होता है। जिस भाव में यह स्थिति बनेगी उस भाव जनित फलों को इनके प्रभाव से होकर गुजरना ही पडेगा।अंगारक योग में सबसे ज्यादा अग्नि व क्रोधात्मक प्रभाव देखने को मिलता

अंगारक दोष व्यक्ति, उसके गुस्से और उसके निर्णय के इर्द-गिर्द घूमता है। इस दोष के बुरे प्रभाव मिलने का एक बडा कारण इस योग के प्रभावों को न समझ पाना है।इस योग की अनदेखी के परिणामस्वरूप यह दोष और भी हानिकारक होता है। अंदर ही अंदर सुलगती यह अग्नि एकदिन प्रचंड रूप धारण कर लेती है। अंगारक योग के कारण, क्रोध, अग्निभय, दुर्घटना, ब्लड से सम्बंधीत रोग, और स्किन की समस्यायें मुख्य रूप से होती है।

सामान्य उपाय

Gemstone Suggestion

राहु मंगल युति का भाव अनुसार अलग अलग फल मिलता है उसी के अनुसार उपाय किये जायें तो परिणाम ज्यादा बेहतर मिलते है इसके लिये कुंडली का अध्ययन करना आवश्यक है फिर भी हम पाठको के लिये कुछ सामान्य उपाय बता रहे है आशा करते है इनको करने से आप लाभान्वित होंगे।

Married Life Report

तो यहाँ हमने देखा की मंगल और राहु का योग किस प्रकार की समस्याएं उत्पन्न करता है यदि कुंडली में मंगल राहु के योग के कारण समस्याएं उत्पन्न हो रही हो तो निम्नलिखित उपाय लाभकारी होंगे –
1. ॐ अंग अंगारकाय नमः का नियमित जाप करें।
2. हनुमान चालीसा का पाठ करें।
3. प्रत्येक शनिवार को साबुत उडद का दान करें।
4. प्रत्येक मंगलवार को गाय को गुड़ खिलाएं।
5. प्रतिदिन मस्तक पर सफ़ेद चन्दन का तिलक लगाएं।
6. शनिवार एवं बुधवार के दिन सूर्योदय से ढाई घंटे के अंदर सतनाजा (7 मुट्ठी सप्तधान्य) और सवा किलो कच्चा कोयला सर से 11 बार उसारकर बहते जल में प्रवाहित करें।

।। श्री हनुमते नमः।।

Prashna Kundli by Acharya Arya

The post अंगारक योग – संघर्षकारी मंगल और राहु-केतु का योग appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>
https://www.astrologyofmylife.com/what-is-angarak-dosh/feed/ 0
Shiv Rudra Abhishek Upay Phal – इन द्रव्यों से करें शिव जी का रूद्राभिषेक, दूर होंगे ग्रहों के दोष और बने रहेंगे स्वास्थ्य.. https://www.astrologyofmylife.com/shiv-rudra-abhishek-upay-phal/ https://www.astrologyofmylife.com/shiv-rudra-abhishek-upay-phal/#respond Wed, 19 May 2021 17:57:27 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17783 जन्म कुंडली में कुछ ग्रह अशुभ स्थिति में भी होते हैं। इनका सीधा असर व्यक्ति के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है  ग्रहों की अशुभ स्थिति को देखते हुए यदि शिवजी का रुद्राभिषेक अलग-अलग बस्तुओं से किया जाए तो इससे ग्रहों के दोष तो दूर होंगे ही साथ ही स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा……. (Shiv Rudra Abhishek …
Continue reading Shiv Rudra Abhishek Upay Phal – इन द्रव्यों से करें शिव जी का रूद्राभिषेक, दूर होंगे ग्रहों के दोष और बने रहेंगे स्वास्थ्य..

The post Shiv Rudra Abhishek Upay Phal – इन द्रव्यों से करें शिव जी का रूद्राभिषेक, दूर होंगे ग्रहों के दोष और बने रहेंगे स्वास्थ्य.. appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>
जन्म कुंडली में कुछ ग्रह अशुभ स्थिति में भी होते हैं। इनका सीधा असर व्यक्ति के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है  ग्रहों की अशुभ स्थिति को देखते हुए यदि शिवजी का रुद्राभिषेक अलग-अलग बस्तुओं से किया जाए तो इससे ग्रहों के दोष तो दूर होंगे ही साथ ही स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा……. (Shiv Rudra Abhishek Upay Phal )

Horoscope

 

१:- सूर्य ग्रह:- जन्म कुंडली में सूर्य अशुभ स्थिति में होने पर हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट प्रॉब्लम, आंखों की समस्या व कमजोरी देता है।
उपाय- प्रातिदिन जल से शिवलिंग का अभिषेक करें।
२:- चंद्र ग्रह:- जन्म कुंडली में चंद्र नीच का होने से सर्दी, अस्थमा व आंखों से संबंधित समस्याएं होती हैं।
उपाय- कच्चे दूध में काले तिल मिलाकर शिवजी का अभिषेक करें।
३:- मंगल ग्रह:- जन्म कुंडली में मंगल अशुभ स्थिति में होने से खून व पेट से संबंधित बीमारियां होती हैं।
उपाय- गिलोय (औषधि) की बूटी के रस से शिवजी का अभिषेक करें.! (Shiv Rudra Abhishek Upay Phal )

Prashna Kundli by Acharya Arya

४:- बुध ग्रह:- जन्म कुंडली में बुध नीच का होने से पेट व फेफड़ों से संबंधित बीमारियां होने की आशंका रहती है।
उपाय–दूध में पीले फूल मिला कर शिवजी का अभिषेक करें।
५:-गुरु ग्रह:- जन्म कुंडली में गुरु अशुभ स्थिति में होने पर स्कीन, दांत व कफ से संबंधित बीमारियां होती हैं।
उपाय-:- विधारा की बूटी के रस से शिवजी का अभिषेक करें।
६:- शुक्र ग्रह:- जन्म कुंडली में शुक्र कमजोर होने पर यौन संक्रमण, कमजोरी व शीत से संबंधित बीमारियां होती हैं।
उपाय- पंचामृत से शिवजी का अभिषेक करें। (Shiv Rudra Abhishek Upay Phal )

Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya

७:- शनि देव:- जन्म कुंडली में शनि नीच का होने से अस्थमा, खांसी व घुटनों से जुड़ी समस्याएं होती हैं।
उपाय- गन्ने के रस से शिवजी का अभिषेक करें।
८:- राहु ग्रह:- जन्म कुंडली में राहु कमजोर होने से डिप्रेशन, बुखार व दुर्घटना होने की संभावनाएं रहती हैं।
उपाय- भांग या नागकेसर से शिवजी का अभिषेक करें। (Shiv Rudra Abhishek Upay Phal )

Shubh Muhurat

९:- केतु ग्रह:- जन्म कुंडली में केतु अशुभ स्थिति में होने से शुगर, कान व गुप्तांग से संबंधित रोग होते हैं।
उपाय- सरसों के तेल से शिवजी का अभिषेक करें। (Shiv Rudra Abhishek Upay Phal )

Name Check & Suggestion by Numerology

The post Shiv Rudra Abhishek Upay Phal – इन द्रव्यों से करें शिव जी का रूद्राभिषेक, दूर होंगे ग्रहों के दोष और बने रहेंगे स्वास्थ्य.. appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>
https://www.astrologyofmylife.com/shiv-rudra-abhishek-upay-phal/feed/ 0
कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी? https://www.astrologyofmylife.com/how-does-the-brahmaputra-river-turn-red-during-kamakhya-devi-menstruation/ https://www.astrologyofmylife.com/how-does-the-brahmaputra-river-turn-red-during-kamakhya-devi-menstruation/#respond Thu, 25 Feb 2021 06:28:13 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17748 कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी? रजस्वला स्त्री मासिक धर्म, एक स्त्री की पहचान है, यह उसे पूर्ण स्त्रीत्व प्रदान करता है। लेकिन फिर भी हमारे समाज में रजस्वला स्त्री को अपवित्र माना जाता है। महीने के जिन दिनों में वह मासिक चक्र के अंतर्गत आती है, …
Continue reading कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?

The post कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी? appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>
कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?

रजस्वला स्त्री मासिक धर्म, एक स्त्री की पहचान है, यह उसे पूर्ण स्त्रीत्व प्रदान करता है। लेकिन फिर भी हमारे समाज में रजस्वला स्त्री को अपवित्र माना जाता है। महीने के जिन दिनों में वह मासिक चक्र के अंतर्गत आती है, उसे किसी भी पवित्र कार्य में शामिल नहीं होने दिया जाता, उसे किसी भी धार्मिक स्थल पर जाने की मनाही होती है। लेकिन विडंबना देखिए कि एक ओर तो हमारा समाज रजस्वला स्त्री को अपवित्र मानता है वहीं दूसरी ओर मासिक धर्म के दौरान कामाख्या देवी को सबसे पवित्र होने का दर्जा देता है।

तांत्रिक सिद्धियां

यह मंदिर तांत्रिक सिद्धियां प्राप्त करने के लिए प्रसिद्ध है। यहां तारा, धूमवती, भैरवी, कमला, बगलामुखी आदि तंत्र देवियों की मूर्तियां स्थापित हैं।

Prashna Kundli by Acharya Arya

 

पुन: निर्माण

इस मंदिर को सोलहवीं शताब्दी में नष्ट कर दिया गया था लेकिन बाद में कूच बिहार के राजा नर नारायण ने सत्रहवीं शताब्दी में इसका पुन: निर्माण करवाया था।

कामाख्या शक्तिपीठ (कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?)

नीलांचल पर्वत के बीचो-बीच स्थित कामाख्या मंदिर गुवाहाटी से करीब 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह मंदिर प्रसिद्ध 108 शक्तिपीठों में से एक है। माना जाता है कि पिता द्वारा किए जा रहे यज्ञ की अग्नि में कूदकर सती के आत्मदाह करने के बाद जब महादेव उनके शव को लेकर तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने उनके क्रोध को शांत करने के लिए अपना सुदर्शन चक्र छोड़कर सती के शव के टुकड़े कर दिए थे। उस समय जहां सती की योनि और गर्भ आकर गिरे थे, आज उस स्थान पर कामाख्या मंदिर स्थित है।

Horoscope

 

कामदेव का पौरुष

इसके अलावा इस मंदिर को लेकर एक और कथा चर्चित है। कहा जाता है कि एक बार जब काम के देवता कामदेव ने अपना पुरुषत्व खो दिया था तब इस स्थान पर रखे सती के गर्भ और योनि की सहायता से ही उन्हें अपना पुरुषत्व हासिल हुआ था। एक और कथा यह कहती है कि इस स्थान पर ही शिव और पार्वती के बीच प्रेम की शुरुआत हुई थी। संस्कृत भाषा में प्रेम को काम कहा जाता है, जिससे कामाख्या नाम पड़ा।

अधूरी सीढ़ियां (कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?)

इस मंदिर के पास मौजूद सीढ़ियां अधूरी हैं, इसके पीछे भी एक कथा मौजूद है। कहा जाता है एक नरका नाम का राक्षस देवी कामाख्या की सुंदरता पर मोहित होकर उनसे विवाह करना चाहता था। परंतु देवी कामाख्या ने उसके सामने एक शर्त रख दी।

kamakhya Devi - acharya arya - puja

कामाख्या देवी से विवाह

कामाख्या देवी ने नरका से कहा कि अगर वह एक ही रात में नीलांचल पर्वत से मंदिर तक सीढ़ियां बना पाएगा तो ही वह उससे विवाह करेंगी। नरका ने देवी की बात मान ली और सीढ़ियां बनाने लगा। देवी को लगा कि नरका इस कार्य को पूरा कर लेगा इसलिए उन्होंने एक तरकीब निकाली। उन्होंने एक कौवे को मुर्गा बनाकर उसे भोर से पहले ही बांग देने को कहा। नरका को लगा कि वह शर्त पूरी नहीं कर पाया है, परंतु जब उसे हकीकत का पता चला तो वह उस मुर्गे को मारने दौड़ा और उसकी बलि दे दी। जिस स्थान पर मुर्गे की बलि दी गई उसे कुकुराकता नाम से जाना जाता है। इस मंदिर की सीढ़ियां आज भी अधूरी हैं।

मासिक चक्र (कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?)

कामाख्या देवी को ‘बहते रक्त की देवी’ भी कहा जाता है, इसके पीछे मान्यता यह है कि यह देवी का एकमात्र ऐसा स्वरूप है जो नियमानुसार प्रतिवर्ष मासिक धर्म के चक्र में आता है। सुनकर आपको अटपटा लग सकता है लेकिन कामाख्या देवी के भक्तों का मानना है कि हर साल जून के महीने में कामाख्या देवी रजस्वला होती हैं और उनके बहते रक्त से पूरी ब्रह्मपुत्र नदी का रंग लाल हो जाता है।
निषेध है मंदिर में प्रवेश
इस दौरान तीन दिनों तक यह मंदिर बंद हो जाता है लेकिन मंदिर के आसपास ‘अम्बूवाची पर्व’ मनाया जाता है। इस दौरान देश-विदेश से सैलानियों के साथ तांत्रिक, अघोरी साधु और पुजारी इस मेले में शामिल होने आते हैं। शक्ति के उपासक, तांत्रिक और साधक नीलांचल पर्वत की विभिन्न गुफाओं में बैठकर साधना कर सिद्धियां प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।

Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya

 

वाममार्गी (कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?)

कामाख्या मंदिर को वाममार्ग साधना के लिए सर्वोच्च पीठ का दर्जा दिया गया है। ऐसा माना जाता है कि मछन्दरनाथ, गोरखनाथ, लोनाचमारी, ईस्माइलजोगी आदि जितने भी महान तंत्र साधक रहे हैं वे सभी इस स्थान पर साधना करते थे, यहीं उन्होंने अपनी साधना पूर्ण की थी।

भक्तों और स्थानीय लोगों का मानना है कि अम्बूवाची पर्व के दौरान कामाख्या देवी के गर्भगृह के दरवाजे अपने आप ही बंद हो जाते हैं और उनका दर्शन करना निषेध माना जाता है। पौराणिक दस्तावेजों में भी कहा गया है कि इन तीन दिनों में कामाख्या देवी रजस्वला होती हैं और उनकी योनि से रक्त प्रवाहित होता है।

तंत्र साधनाओं में रजस्वला स्त्री और उसके रक्त का विशेष महत्व होता है इसलिए यह पर्व या कामाख्या देवी के रजस्वला होने का यह समय तंत्र साधकों और अघोरियों के लिए सुनहरा काल होता है।

Life Prediction

 

योनि के वस्त्र (कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?)

इस पर्व की शुरुआत से पूर्व गर्भगृह स्थित योनि के आकार में स्थित शिलाखंड, जिसे महामुद्रा कहा जाता है, को सफेद वस्त्र पहनाए जाते हैं, जो पूरी तरह रक्त से भीग जाते हैं। पर्व संपन्न होने के बाद पुजारियों द्वारा यह वस्त्र भक्तों में वितरित कर दिए जाते हैं।

बहुत से तांत्रिक, साधु, ज्योतिषी ऐसे भी होते हैं जो यहां से वस्त्र ले जाकर उसे छोटा-छोटा फाड़कर मनमाने दामों पर उन वस्त्रों को कमिया वस्त्र या कमिया सिंदूर का नाम देकर बेचते हैं।

http://www.astrologyofmylife.com/product/astrology-of-my-life-online-consultant-acharya-arya/

 

आस्था का विषय

देवी के रजस्वला होने की बात पूरी तरह आस्था से जुड़ी है। इस मानसिकता से इतर सोचने वाले बहुत से लोगों का कहना है कि पर्व के दौरान ब्रह्मपुत्र नदी में प्रचुर मात्रा में सिंदूर डाला जाता है, जिसकी वजह से नदी लाल हो जाती है। कुछ तो यह भी कहते हैं कि यह नदी बेजुबान जानवरों की बलि के दौरान उनके बहते हुए रक्त से लाल होती है। इस मंदिर में कभी मादा पशु की बलि नहीं दी जाती।
सामान्य स्त्री और देवी
खैर, तथ्य चाहे जो भी हो परंतु माहवारी काल के दौरान कामाख्या देवी की आराधना कर कहीं ना कहीं हम स्त्रीत्व की आराधना करते हैं। हम स्त्री, जिसे ‘जननी’ कहा जाता है, उसका भी सम्मान करते हैं। लेकिन जब बात व्यवहारिकता की, एक सामान्य स्त्री की आती है तो हमारा व्यवहार पूरी तरह क्यों बदल जाता है?

कामाख्या सिन्दूर असली में छोटे छोटे पत्थरोँ के रूप में होता है, जो की माँ कामाख्या मंदिर से प्राप्त होता है, प्रसाद के रूप में वहां से और भी माँ कामाख्या की चीज़ें प्राप्त होती है जिनमे कामाख्या वस्त्र, कामाख्या कड़ा और कामाख्या यन्त्र भी मिलता है पर सभी लोगो को नहीं.
सारे भक्तो को सिर्फ दो ही चीज़ें दी जाती है जब मंदिर का द्वार खुलता है और वो दो चीज़ें कामाख्या सिन्दूर और वस्त्र होती है कामाख्या सिन्दूर को लोग कामिया सिन्दूर भी कहते है और कामाख्या वस्त्र को लोग अम्बुबाची वस्त्र भी कहते है।
और ये दोनों चीज़ें सिर्फ अम्बुबाची मेला के दौरान ही वितरित की जाती है, तीन दिन के लिए मंदिर का द्वार बंद कर दिया जाता है और फिर जब मंदिर का द्वार खुलता है तो प्रसाद के रूप में सिन्दूर और वस्त्र वितरित किया जाता है।
अम्बुबाची मेला हर साल जून के महीने में मनाया जाता है, क्योकि जहा पर मंदिर स्थित है उस ग्राम का नाम अम्बुबाची है इसलिए इस मेले का नाम अम्बुबाची मेला है और ये मंदिर नीलांचल पर्वत पर स्थित है हर साल लाखो करोडो भक्त माँ कामाख्या का आशीर्वाद लेने यहाँ आते है और अपनी मनोकामनाओ को पूर्ण करते है।

Vastu Check by Scientifically

(कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?)

The post कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी? appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>
https://www.astrologyofmylife.com/how-does-the-brahmaputra-river-turn-red-during-kamakhya-devi-menstruation/feed/ 0
Atma (Soul) – A New Beginning https://www.astrologyofmylife.com/atma-soul-a-new-beginning/ https://www.astrologyofmylife.com/atma-soul-a-new-beginning/#respond Fri, 12 Feb 2021 16:06:06 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17741 आत्मा जब शरीर छोड़ती है तो मनुष्य को पहले ही पता चल जाता है । वो स्वयं भी हथियार डाल देता है अन्यथा उसने आत्मा को शरीर में बनाये रखने का भरसक प्रयत्न किया होता है और इस चक्कर में कष्ट को झेला होता है । Online Astrologer – Acharya Dr MSD Arya अब उसके …
Continue reading Atma (Soul) – A New Beginning

The post Atma (Soul) – A New Beginning appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>
आत्मा जब शरीर छोड़ती है तो मनुष्य को पहले ही पता चल जाता है । वो स्वयं भी हथियार डाल देता है अन्यथा उसने आत्मा को शरीर में बनाये रखने का भरसक प्रयत्न किया होता है और इस चक्कर में कष्ट को झेला होता है ।

Online Astrologer – Acharya Dr MSD Arya

अब उसके सामने उसके सारे जीवन की यात्रा चल-चित्र की तरह चल रही होती है । उधर आत्मा शरीर से निकलने की तैयारी कर रही होती है इसलिये शरीर के पाँच प्राण एक ‘धनंजय प्राण’ को छोड़कर शरीर से बाहर निकलना आरम्भ कर देते हैं ।

Horoscope with 25 Years Varsphal

ये प्राण, आत्मा से पहले बाहर निकलकर आत्मा के लिये सूक्ष्म-शरीर का निर्माण करते हैं । जोकि शरीर छोड़ने के बाद आत्मा का वाहन होता है । धनंजय प्राण पर सवार होकर आत्मा शरीर से निकलकर इसी सूक्ष्म-शरीर में प्रवेश कर जाती है ।
बहरहाल अभी आत्मा शरीर में ही होती है और दूसरे प्राण धीरे-धीरे शरीर से बाहर निकल रहे होते है कि व्यक्ति को पता चल जाता है । उसे बे-चैनी होने लगती है, घबराहट होने लगती है । सारा शरीर फटने लगता है, खून की गति धीमी होने लगती है । सांस उखड़ने लगती है । बाहर के द्वार बंद होने लगते हैं । अर्थात अब चेतना लुप्त होने लगती है और मूर्च्छा आने लगती है । फिर मूर्च्छा आ जाती है और आत्मा एक झटके से किसी भी खुली हुई इंद्री से बाहर निकल जाती है । इसी समय चेहरा विकृत हो जाता है । यही आत्मा के शरीर छोड़ देने का मुख्य चिन्ह होता है । (Atma (Soul) – A New Beginning)
इससे पहले घर के आसपास कुत्ते-बिल्ली के रोने की आवाजें आती हैं । इन पशुओं की आँखे अत्याधिक चमकीली होती है । जिससे ये रात के अँधेरे में तो क्या सूक्ष्म-शरीर धारी आत्माओं को भी देख लेते हैं । जब किसी व्यक्ति की आत्मा शरीर छोड़ने को तैयार होती है तो उसके अपने सगे-संबंधी जो मृतात्माओं के तौर पर होते है । उसे लेने आते है और व्यक्ति उन्हें यमदूत समझता है और कुत्ते-बिल्ली उन्हें साधारण जीवित मनुष्य ही समझते है और अन्जान होने की वजह से उन्हें देखकर रोते है और कभी-कभी भौंकते भी हैं ।
शरीर के पाँच प्रकार के प्राण बाहर निकलकर उसी तरह सूक्ष्म-शरीर का निर्माण करते हैं । जैसे गर्भ में स्थूल-शरीर का निर्माण क्रम से होता है । (Atma (Soul) – A New Beginning)

Atma Soul - A New Beginning - Moksha Mukti
सूक्ष्म-शरीर का निर्माण होते ही आत्मा अपने मूल वाहक धनंजय प्राण के द्वारा बड़े वेग से निकलकर सूक्ष्म-शरीर में प्रवेश कर जाती है । आत्मा शरीर के जिस अंग से निकलती है उसे खोलती, तोड़ती हुई निकलती है । जो लोग भयंकर पापी होते है उनकी आत्मा मूत्र याँ मल-मार्ग से निकलती है । जो पापी भी है और पुण्यात्मा भी है उनकी आत्मा मुख से निकलती है । जो पापी कम और पुण्यात्मा अधिक है उनकी आत्मा नेत्रों से निकलती है और जो पूर्ण धर्मनिष्ठ हैं, पुण्यात्मा और योगी पुरुष है उनकी आत्मा ब्रह्मरंध्र से निकलती है ।
अब शरीर से बाहर सूक्ष्म-शरीर का निर्माण हुआ रहता है । लेकिन ये सभी का नहीं हुआ रहता । जो लोग अपने जीवन में ही मोहमाया से मुक्त हो चुके योगी पुरुष है । उन्ही के लिये तुरंत सूक्ष्म-शरीर का निर्माण हो पाता है । अन्यथा जो लोग मोहमाया से ग्रस्त है परंतु बुद्धिमान है ज्ञान-विज्ञान से अथवा पांडित्य से युक्त है । ऐसे लोगों के लिये दस दिनों में सूक्ष्म शरीर का निर्माण हो पाता है ।
हिंदु धर्म-शास्त्र में – दस गात्र का श्राद्ध और अंतिम दिन मृतक का श्राद्ध करने का विधान इसीलिये है कि – दस दिनों में शरीर के दस अंगों का निर्माण इस विधान से पूर्ण हो जाये और आत्मा को सूक्ष्म-शरीर मिल जाये । ऐसे में, जब तक दस गात्र का श्राद्ध पूर्ण नहीं होता और सूक्ष्म-शरीर तैयार नहीं हो जाता आत्मा, प्रेत-शरीर में निवास करती है । अगर किसी कारण वश ऐसा नहीं हो पाता है तो आत्मा प्रेत-योनि में भटकती रहती है । (Atma (Soul) – A New Beginning)

Get Appointment

एक और बात, आत्मा के शरीर छोड़ते समय व्यक्ति को पानी की बहुत प्यास लगती है । शरीर से प्राण निकलते समय कण्ठ सूखने लगता है । ह्रदय सूखता जाता है और इससे नाभि जलने लगती है । लेकिन कण्ठ अवरूद्ध होने से पानी पिया नहीं जाता और ऐसी ही स्तिथि में आत्मा शरीर छोड़ देती है । प्यास अधूरी रह जाती है । इसलिये अंतिम समय में मुख में ‘गंगा-जल’ डालने का विधान है ।
इसके बाद आत्मा का अगला पड़ाव होता है शमशान का ‘पीपल’ । यहाँ आत्मा के लिये ‘यमघंट’ बंधा होता है । जिसमे पानी होता है । यहाँ प्यासी आत्मा यमघंट से पानी पीती है जो उसके लिये अमृत तुल्य होता है । इस पानी से आत्मा तृप्ति का अनुभव करती है ।
ये सब हिन्दू धर्म शास्त्रों में विधान है । कि – मृतक के लिये ये सब करना होता है ताकि उसकी आत्मा को शान्ति मिले ।

Life Prediction

 

The post Atma (Soul) – A New Beginning appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>
https://www.astrologyofmylife.com/atma-soul-a-new-beginning/feed/ 0
Makar Sankranti Special – Acharya Dr MSD Arya https://www.astrologyofmylife.com/makar-sankranti-special/ https://www.astrologyofmylife.com/makar-sankranti-special/#respond Mon, 11 Jan 2021 06:53:09 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17731 मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात् नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात् सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया …
Continue reading Makar Sankranti Special – Acharya Dr MSD Arya

The post Makar Sankranti Special – Acharya Dr MSD Arya appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>
मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व

शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात् नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात् सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है।

Shubh Muhurat

 

मकर संक्रांति से अग्नि तत्त्व की शुरुआत होती है और कर्क संक्रांति से जल तत्त्व की. इस समय सूर्य उत्तरायण होता है अतः इस समय किये गए जप और दान का फल अनंत गुना होता है मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है। सामान्यत: सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त फलदायक है। यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छ:-छ: माह के अन्तराल पर होती है। भारत देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित है। मकर संक्रान्ति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है अर्थात् भारत से अपेक्षाकृत अधिक दूर होता है। इसी कारण यहाँ पर रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है। किन्तु मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतएव इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गरमी का मौसम शुरू हो जाता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अन्धकार कम होगा। अत: मकर संक्रान्ति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्य शक्ति में वृद्धि होगी।

Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya

मकर संक्रांं‍ति पूजा व‍िध‍ि (Makar Sankranti Special – Acharya Dr MSD Arya)

भविष्यपुराण के अनुसार सूर्य के उत्तरायण के दिन संक्रांति व्रत करना चाहिए। पानी में तिल मिलाकार स्नान करना चाहिए। अगर संभव हो तो गंगा स्नान करना चाहिए। इस द‍िन तीर्थ स्थान या पवित्र नदियों में स्नान करने का महत्व अधिक है।इसके बाद भगवान सूर्यदेव की पंचोपचार विधि से पूजा-अर्चना करनी चाहिए इसके बाद यथा सामर्थ्य गंगा घाट अथवा घर मे ही पूर्वाभिमुख होकर यथा सामर्थ्य गायत्री मन्त्र अथवा सूर्य के इन मंत्रों का अधिक से अधिक जाप करना चाहिये।

Get Appointment

 

मन्त्र

१- ऊं सूर्याय नम: ऊं आदित्याय नम: ऊं सप्तार्चिषे नम:

२- ऋड्मण्डलाय नम: , ऊं सवित्रे नम: , ऊं वरुणाय नम: , ऊं सप्तसप्त्ये नम: , ऊं मार्तण्डाय नम: , ऊं विष्णवे नम:

पूजा-अर्चना में भगवान को भी तिल और गुड़ से बने सामग्रियों का भोग लगाएं। तदोपरान्त ज्यादा से ज्यादा भोग प्रसाद बांटे।

इसके घर में बनाए या बाजार में उपलब्ध तिल के बनाए सामग्रियों का सेवन करें। इस पुण्य कार्य के दौरान किसी से भी कड़वे बोलना अच्छा नहीं माना गया है।

Horoscope

 

मकर संक्रांति पर अपने पितरों का ध्यान और उन्हें तर्पण जरूर देना चाहिए।

राशि के अनुसार दान योग्य वस्तु (Makar Sankranti Special – Acharya Dr MSD Arya)

मेष       – गुड़, मूंगफली दाने एवं तिल का दान करें।
वृषभ    – सफेद कपड़ा, दही एवं तिल का दान करें।
मिथुन   – मूंग दाल, चावल एवं कंबल का दान करें।
कर्क     – चावल, चांदी एवं सफेद तिल का दान करें।
सिंह     –  तांबा, गेहूं एवं सोने के मोती का दान करें।
कन्या   –  खिचड़ी, कंबल एवं हरे कपड़े का दान करें।
तुला     –  सफेद डायमंड, शकर एवं कंबल का दान करें।
वृश्चिक  –  मूंगा, लाल कपड़ा एवं तिल का दान करें।
धनु      –  पीला कपड़ा, खड़ी हल्दी एवं सोने का मोती दान करें।
मकर  –  काला कंबल, तेल एवं काली तिल दान करें।
कुंभ    –  काला कपड़ा, काली उड़द, खिचड़ी एवं तिल दान करें।
मीन   –   रेशमी कपड़ा, चने की दाल, चावल एवं तिल दान करें।

2021 Rashi Fal – Acharya Arya – Moksha Mukti

कुछ अन्य उपाय (Makar Sankranti Special – Acharya Dr MSD Arya)

सूर्य और शनि का सम्बन्ध इस पर्व से होने के कारण यह काफी महत्वपूर्ण है
कहते हैं इसी त्यौहार पर सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने के लिए आते हैं
आम तौर पर शुक्र का उदय भी लगभग इसी समय होता है इसलिए यहाँ से शुभ कार्यों की शुरुआत होती है
अगर कुंडली में सूर्य या शनि की स्थिति ख़राब हो तो इस पर्व पर विशेष तरह की पूजा से उसको ठीक कर सकते हैं
जहाँ पर परिवार में रोग कलह तथा अशांति हो वहां पर रसोई घर में ग्रहों के विशेष नवान्न से पूजा करके लाभ लिया जा सकता है
पहली होरा में स्नान करें,सूर्य को अर्घ्य दें
श्रीमदभागवद के एक अध्याय का पाठ करें,या गीता का पाठ करें
मनोकामना संकल्प कर नए अन्न,कम्बल ठ घी का दान करें
लाल फूल और अक्षत डाल कर सूर्य को अर्घ्य दें
सूर्य के बीज मंत्र का जाप करें
मंत्र “ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः”
संध्या काल में अन्न का सेवन न करें
तिल और अक्षत डाल कर सूर्य को अर्घ्य दें
शनि देव के मंत्र का जाप करें
मंत्र “ॐ प्रां प्री प्रौं सः शनैश्चराय नमः”
घी,काला कम्बल और लोहे का दान करें।

2021 – Hindu fasts festivals and dates

 

The post Makar Sankranti Special – Acharya Dr MSD Arya appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>
https://www.astrologyofmylife.com/makar-sankranti-special/feed/ 0
Tulsi Vivah – तुलसी विवाह कराने से सौभाग्य और पुण्य की प्राप्ति होती है https://www.astrologyofmylife.com/tulsi-vivah/ https://www.astrologyofmylife.com/tulsi-vivah/#respond Wed, 25 Nov 2020 06:19:12 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17452 देवउठनी एकादशी को तुलसी एकादश भी कहा जाता है। तुलसी को साक्षात लक्ष्मी का निवास माना जाता है इसलिए कहा जाता है कि जो भी इस मास में तुलसी के समक्ष दीप जलाता है उसे अत्यन्त लाभ होता है। इस दिन तुलसी विवाह का भी आयोजन किया जाता है। तुलसी जी का विवाह शालिग्राम से …
Continue reading Tulsi Vivah – तुलसी विवाह कराने से सौभाग्य और पुण्य की प्राप्ति होती है

The post Tulsi Vivah – तुलसी विवाह कराने से सौभाग्य और पुण्य की प्राप्ति होती है appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>
देवउठनी एकादशी को तुलसी एकादश भी कहा जाता है। तुलसी को साक्षात लक्ष्मी का निवास माना जाता है इसलिए कहा जाता है कि जो भी इस मास में तुलसी के समक्ष दीप जलाता है उसे अत्यन्त लाभ होता है। इस दिन तुलसी विवाह का भी आयोजन किया जाता है। तुलसी जी का विवाह शालिग्राम से कराया जाता है। मान्यता है कि इस प्रकार के आयोजन से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। तुलसी शालिग्राम का विवाह करने से वही पुण्य प्राप्त होता है जो माता−पिता अपनी पुत्री का कन्यादान करके पाते हैं। शास्त्रों और पुराणों में उल्लेख है कि जिन लोगों के यहां कन्या नहीं होती यदि वह तुलसी का विवाह करके कन्यादान करें तो जरूर उनके यहां कन्या होगी। इस आयोजन की विशेषता यह होती है कि विवाह में जो रीति−रिवाज होते हैं उसी तरह तुलसी विवाह के सभी कार्य किए जाते हैं साथ ही विवाह से संबंधित मंगल गीत भी गाए जाते हैं। (Tulsi Vivah)

Get Appointment

तुलसी विवाह की पूजन विधि (Tulsi Vivah)

जिस गमले में तुलसी का पौधा लगा है उसे गेरु आदि से सजाकर उसके चारों ओर मंडप बनाकर उसके ऊपर सुहाग की प्रतीक चुनरी को ओढ़ा दें। इसके अलावा गमले को भी साड़ी में लपेट दें और उसका श्रृंगार करें। इसके बाद सिद्धिविनायक श्रीगणेश सहित सभी देवी−देवताओं और श्री शालिग्रामजी का विधिवत पूजन करें। एक नारियल दक्षिणा के साथ टीका के रूप में रखें और भगवान शालिग्राम की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसीजी की सात परिक्रमा कराएं। इसके बाद आरती करें।

Vastu Check by Scientifically

 

भगवती तुलसी और शालिग्राम का यह है संबंध (Tulsi Vivah)

भगवती तुलसी मूल प्रकृति की ही प्रधान अंश हैं। प्रारम्भ में वे गोलोक में तुलसी नाम की गोपी थीं। भगवान के चरणों में उनका अतिशय प्रेम था। रासलीला में उनकी श्रीकृष्ण के प्रति अनुरक्ति देखकर राधाजी ने कुपित होकर उन्हें मानव योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया। इससे वे भारत वर्ष में राजा धर्मध्वज की पुत्री हुईं। गोलोक में ही सुदामा नाम का एक गोप भी था जो भगवान श्रीकृष्ण का मुख्य पार्षद था, उसे भी किसी कारण से क्रुद्ध होकर राधाजी ने दानव योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया। उनके शाप से अगले जन्म में वह सुदामा शंखचूड़ दानव बना। ब्रह्माजी की प्रेरणा से भगवती तुलसी का शंखचूड़ दानव से गन्धर्व विवाह संपन्न हुआ। ब्रह्माजी का वरदान प्राप्त कर उस दानवराज ने अपने पराक्रम द्वारा देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर उस पर अपना अधिकार कर लिया।

देवतागण त्रस्त होकर भगवान श्रीविष्णु की शरण में गये। भगवान श्रीविष्णु ने देवताओं को शंखचूड़ के जन्म एवं वरदान आदि की सब कथा सुनायी तथा उसकी मृत्यु का उपाय बताते हुए उसे मारने के लिए भगवान शंकर को एक त्रिशूल प्रदान किया तथा यह भी बताया कि तुलसी का सतीत्व नष्ट होने पर ही उसकी मृत्यु संभव हो सकेगी। इसका भी आश्वासन भगवान श्रीविष्णु ने देवताओं को दिया। अपने कथानुसार, भगवान श्रीविष्णु ने छलपूर्वक तुलसी का सतीत्व नष्ट किया, उधर भगवान शंकर ने त्रिशूल द्वारा शंखचूड़ का वध कर डाला। पतिव्रता तुलसी को भगवान के द्वारा छलपूर्वक अपना सतीत्व नष्ट करने की जानकारी हुई तो अत्यन्त शोक संतप्त होकर उसने भगवान को पाषाण होने का शाप दे दिया।

Name Check & Suggestion by Numerology

 

तुलसी की कारुणिक अवस्था देखकर उसे समझाते हुए भगवान ने कहा− हे भद्रे! तुमने भारत में रहकर मेरे लिये बहुत समय तक तपस्या की है और साथ ही इस शंखचूड़ ने भी उस समय तुम्हारे लिये दीर्घ समय तक तपस्या की थी। तुम्हें पत्नी रूप में प्राप्त करने के बाद अंत में वह गोलोक चला गया। अब मैं तुम्हें तुम्हारी तपस्या का फल प्रदान करना उचित समझता हूं। तुम्हारा यह शरीर गण्डकी नदी के रूप में प्रसिद्ध होगा। तुम्हारा केशसमूह पुण्यवृक्ष के रूप में प्रकट होगा, जो तुलसी नाम से प्रसिद्ध होगा। देवपूजन में प्रयुक्त होने वाले समस्त पुष्पों और पत्रों में तुलसी की प्रधानता होगी। सभी लोकों में निरंतर तुम मेरे सान्निध्य में रहोगी।

मैं भी तुम्हारे शाप से पाषाण बनकर भारतवर्ष में गण्डकी नदी के तट के समीप निवास करूंगा। चारों वेदों के पढ़ने तथा तपस्या करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह पुण्य शालग्राम शिला के पूजन से निश्चित रूप से सुलभ हो जाता है। उसी समय तुलसी के शरीर से गण्डकी नदी उत्पन्न हुई और भगवान श्रीहरि उसी के तट पर मनुष्यों के लिए पुण्यप्रद शालग्राम बन गये।

Vehicle Number & Colour Numerology

 

भगवान ब्रह्माजी का कथन (Tulsi Vivah)

पुराणों में उल्लेख मिलता है कि ब्रह्माजी कहते हैं कि यदि तुलसी के आधे पत्ते से भी प्रतिदिन भक्तिपूर्वक भगवान की पूजा की जाये तो भी वे स्वयं आकर दर्शन देते हैं। अपनी लगायी हुई तुलसी जितना ही अपने मूल का विस्तार करती है, उतने ही सहस्त्र युगों तक मनुष्य ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है। यदि कोई तुलसी संयुक्त जल में स्नान करता है तो वह सब पापों से मुक्त हो भगवान श्रीविष्णु के लोक में आनन्द का अनुभव करता है।

Shubh Muhurat

 

तुलसी का महत्व (Tulsi Vivah)

जो व्यक्ति तुलसी का संग्रह करता है और लगाकर तुलसी का वन तैयार कर देता है, वह उतने से ही पापमुक्त हो ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है। जिसके घर में तुलसी का बगीचा विद्यमान है, उसका वह घर तीर्थ के समान है, वहां यमराज के दूत नहीं जाते। तुलसीवन सब पापों को नष्ट करने वाला, पुण्यमय तथा अभीष्ट कामनाओं को देने वाला है। जो श्रेष्ठ मानव तुलसी का बगीचा लगाते हैं, वे यमराज को नहीं देखते। जो मनुष्य तुलसी काष्ठ संयुक्त गंध धारण करता है, क्रियामाण पाप उसके शरीर का स्पर्श नहीं करता। जहां तुलसी वन की छाया होती है, वहीं पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध करना चाहिए। जिसके मुख में, कान में और मस्तक पर तुलसी का पत्ता दिखायी देता है, उसके ऊपर यमराज भी दृष्टि नहीं डाल सकते फिर दूतों की बात ही क्या है। जो प्रतिदिन आदरपूर्वक तुलसी की महिमा सुनता है, वह सब पापों से मुक्त हो ब्रह्मलोक को जाता है।

Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya

 

मान्यता है कि कार्तिक मास में तुलसी के पास दीपक जलाने से अनंत पुण्य प्राप्त होता है। तुलसी को साक्षात लक्ष्मी का निवास माना जाता है इसलिए कहा जाता है कि जो भी इस मास में तुलसी के समक्ष दीप जलाता है उसे अत्यन्त लाभ होता है।

The post Tulsi Vivah – तुलसी विवाह कराने से सौभाग्य और पुण्य की प्राप्ति होती है appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>
https://www.astrologyofmylife.com/tulsi-vivah/feed/ 0
Piplad Muni ki Katha – पिप्पलाद कथा https://www.astrologyofmylife.com/piplad-muni-ki-katha/ https://www.astrologyofmylife.com/piplad-muni-ki-katha/#respond Tue, 24 Nov 2020 05:42:25 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17447 श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी/भार्या अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी …
Continue reading Piplad Muni ki Katha – पिप्पलाद कथा

The post Piplad Muni ki Katha – पिप्पलाद कथा appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>
श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी/भार्या अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा। (Piplad Muni ki Katha)
एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-

Get Appointment

नारद- बालक तुम कौन हो ?
बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।
नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ?
बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।
तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की वय में ही हो गयी थी।
बालक- मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?
नारद- तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी।

Prashna Kundli by Acharya Arya

बालक- मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ? (Piplad Muni ki Katha)
नारद- शनिदेव की महादशा।
इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।
नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति माँगी।ब्रह्मा जी से वर्य मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनि देव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आँखे खोलकर भष्म करना शुरू कर दिया।शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे।अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वर्य मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-

Shubh Muhurat

1- जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा।जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ न हो।

2- मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।

ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया।तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे।अतः तभी से शनि “शनै:चरति य: शनैश्चर:” अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए।

Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya

सम्प्रति शनिदेवजी की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है। आगे चलकर पिप्पलाद ने प्रश्न उपनिषद की रचना की, जो आज भी ज्ञान का वृहद भंडार है…..। (Piplad Muni ki Katha)

Horoscope

The post Piplad Muni ki Katha – पिप्पलाद कथा appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>
https://www.astrologyofmylife.com/piplad-muni-ki-katha/feed/ 0
Chathh Puja Special – छठ पूजा विशेष https://www.astrologyofmylife.com/chathh-puja-special/ https://www.astrologyofmylife.com/chathh-puja-special/#respond Wed, 18 Nov 2020 08:07:00 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17440 छठ पूजा विशेष (Chathh Puja Special) 〰️〰️🌼〰️〰️ कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली मनाने के तुरंत बाद मनाए जाने वाले इस चार दिवसिए व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। इसी कारण इस व्रत का नाम करण छठ व्रत हो गया। छठ पर्व षष्ठी तिथि का अपभ्रंश है। सूर्य …
Continue reading Chathh Puja Special – छठ पूजा विशेष

The post Chathh Puja Special – छठ पूजा विशेष appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>
छठ पूजा विशेष (Chathh Puja Special)
〰〰🌼〰〰
कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली मनाने के तुरंत बाद मनाए जाने वाले इस चार दिवसिए व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। इसी कारण इस व्रत का नाम करण छठ व्रत हो गया। छठ पर्व षष्ठी तिथि का अपभ्रंश है।

सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। इस पर्व को वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है। पारिवारिक सुख-स्मृद्धि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है।

Get Appointment

छठ पर्व में सूर्य और छठी मैया की पूजा (Chathh Puja Special)
〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
छठ पूजा में सूर्य देव की पूजा की जाती है और उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। सूर्य प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देने वाले देवता है, जो पृथ्वी पर सभी प्राणियों के जीवन का आधार हैं। सूर्य देव के साथ-साथ छठ पर छठी मैया की पूजा का भी विधान है।
सूर्य और छठी मैया का संबंध भाई बहन का है। मूलप्रकृति के छठे अंश से प्रकट होने के कारण इनका नाम षष्ठी पड़ा। वह कार्तिकेय की पत्नी भी हैं। षष्ठी देवी देवताओं की देवसेना भी कही जाती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने की थी। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो षष्ठी के दिन विशेष खगोलिय परिवर्तन होता है। तब सूर्य की पराबैगनी किरणें असामान्य रूप से एकत्र होती हैं और इनके कुप्रभावों से बचने के लिए सूर्य की ऊषा और प्रत्यूषा के रहते जल में खड़े रहकर छठ व्रत किया जाता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार छठी मैया या षष्ठी माता संतानों की रक्षा करती हैं और उन्हें दीर्घायु प्रदान करती हैं।
शास्त्रों में षष्ठी देवी को ब्रह्मा जी की मानस पुत्री भी कहा गया है। पुराणों में इन्हें माँ कात्यायनी भी कहा गया है, जिनकी पूजा नवरात्रि में षष्ठी तिथि पर होती है। षष्ठी देवी को ही बिहार-झारखंड में स्थानीय भाषा में छठ मैया कहा गया है।

Prashna Kundli by Acharya Arya

छठ पर्व परंपरा (Chathh Puja Special)
〰〰〰〰〰
यह पर्व चार दिनों तक चलता है। भैया दूज के तीसरे दिन से यह आरंभ होता है। पहले दिन सैंधा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दू की सब्जी प्रसाद के रूप में ली जाती है। अगले दिन से उपवास आरंभ होता है। इस दिन रात में खीर बनती है। व्रतधारी रात में यह प्रसाद लेते हैं। तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते हैं। अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हैं। इस पूजा में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है; लहसून, प्याज वर्ज्य है। जिन घरों में यह पूजा होती है, वहां भक्तिगीत गाए जाते हैं। आजकल कुछ नई रीतियां भी आरंभ हो गई हैं, जैसे पंडाल और सूर्य देवता की मूर्ति की स्थापना करना। उसपर भी रोषनाई पर काफी खर्च होता है और सुबह के अर्घ्य के उपरांत आयोजनकर्ता माईक पर चिल्लाकर प्रसाद मांगते हैं। पटाखे भी जलाए जाते हैं। कहीं-कहीं पर तो ऑर्केस्ट्राका भी आयोजन होता है; परंतु साथ ही साथ दूध, फल, उदबत्ती भी बांटी जाती है। पूजा की तैयारी के लिए लोग मिलकर पूरे रास्ते की सफाई करते हैं।

Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya

छठ व्रत (Chathh Puja Special)
〰〰〰
छठ उत्सव के केंद्र में छठ व्रत है जो एक कठिन तपस्या की तरह है। यह प्रायः महिलाओं द्वारा किया जाता है किंतु कुछ पुरुष भी यह व्रत रखते हैं। व्रत रखने वाली महिला को परवैतिन भी कहा जाता है। चार दिनों के इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है। भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता है। पर्व के लिए बनाए गए कमरे में व्रती फर्श पर एक कंबल या चादर के सहारे ही रात बिताई जाती है। इस उत्सव में शामिल होने वाले लोग नए कपड़े पहनते हैं। पर व्रती ऐसे कपड़े पहनते हैं, जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की होती है। महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ करते हैं। ‘शुरू करने के बाद छठ पर्व को सालोंसाल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला को इसके लिए तैयार न कर लिया जाए। घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है।’

ऐसी मान्यता है कि छठ पर्व पर व्रत करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। पुत्र की चाहत रखने वाली और पुत्र की कुशलता के लिए सामान्य तौर पर महिलाएं यह व्रत रखती हैं। किंतु पुरुष भी यह व्रत पूरी निष्ठा से रखते हैं।

Shubh Muhurat

छठ पूजा विधि (Chathh Puja Special)
〰〰〰〰〰
छठ पूजा से पहले निम्न सामग्री जुटा लें और फिर सूर्य देव को विधि विधान से अर्घ्य दें।

👉 बांस की 3 बड़ी टोकरी, बांस या पीतल के बने 3 सूप, थाली, दूध और ग्लास।

👉 चावल, लाल सिंदूर, दीपक, नारियल, हल्दी, गन्ना, सुथनी, सब्जी और शकरकंदी।

👉 नाशपती, बड़ा नींबू, शहद, पान, साबुत सुपारी, कैराव, कपूर, चंदन और मिठाई।

👉 प्रसाद के रूप में ठेकुआ, मालपुआ, खीर-पुड़ी, सूजी का हलवा, चावल के बने लड्डू लें।

सूर्य को अर्घ्य देने की विधि👉 बांस की टोकरी में उपरोक्त सामग्री रखें। सूर्य को अर्घ्य देते समय सारा प्रसाद सूप में रखें और सूप में ही दीपक जलाएँ। फिर नदी में उतरकर सूर्य देव को अर्घ्य दें।

Career Report : One Year

पहला दिन नहाय खाय
〰〰〰〰〰〰〰
पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले घर की सफाइ कर उसे पवित्र बना लिया जाता है। इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं। भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया जाता है। यह दाल चने की होती है।

Horoscope

दूसरे दिन लोहंडा और खरना
〰〰〰〰〰〰〰〰〰
दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे ‘खरना’ कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है। इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

तीसरे दिन संध्या अर्घ्य
〰〰〰〰〰〰〰
तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया साँचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है।

शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रति के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छठव्रती एक नीयत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है। इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले का दृश्य बन जाता है।

Horoscope

चौथा दिन उषा अर्घ्य
〰〰〰〰〰〰
चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है। व्रती वहीं पुनः इक्ट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने शाम को अर्घ्य दिया था। पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। अंत में व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं।

छठ पूजा का पौराणिक महत्त्व
〰〰〰〰〰〰〰〰〰
छठ पूजा की परंपरा और उसके महत्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक और लोक कथाएँ प्रचलित हैं।

रामायण की मान्यता
〰〰〰〰〰〰
एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशिर्वाद प्राप्त किया था।

Life Prediction

महाभारत की मान्यता
〰〰〰〰〰〰〰
एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है।

कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रोपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं।

पुराणों की मान्यता
〰〰〰〰〰〰
एक कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी।

Name Check & Suggestion by Numerology

छठ गीत (Chathh Puja Special)
〰〰〰
लोकपर्व छठ के विभिन्न अवसरों पर जैसे प्रसाद बनाते समय, खरना के समय, अर्घ्य देने के लिए जाते हुए, अर्घ्य दान के समय और घाट से घर लौटते समय अनेकों सुमधुर और भक्ति भाव से पूर्ण लोकगीत गाए जाते हैं।

गीत
〰〰
‘केलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मे़ड़राय
काँच ही बाँस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए’
सेविले चरन तोहार हे छठी मइया। महिमा तोहर अपार।
उगु न सुरुज देव भइलो अरग के बेर।
निंदिया के मातल सुरुज अँखियो न खोले हे।
चार कोना के पोखरवा
हम करेली छठ बरतिया से उनखे लागी।

Gemstone Suggestion

इस गीत में एक ऐसे ही तोते का जिक्र है जो केले के ऐसे ही एक गुच्छे के पास मंडरा रहा है। तोते को डराया जाता है कि अगर तुम इस पर चोंच मारोगे तो तुम्हारी शिकायत भगवान सूर्य से कर दी जाएगी जो तुम्हें माफ नही करेंगे। पर फिर भी तोता केले को जूठा कर देता है और सूर्य के कोप का भागी बनता है। पर उसकी भार्या सुगनी अब क्या करे बेचारी? कैसे सहे इस वियोग को ? अब तो ना देव या सूर्य कोई उसकी सहायता नहीं कर सकते आखिर पूजा की पवित्रता जो नष्ट की है उसने।

केरवा जे फरेला घवद से ओह पर सुगा मेड़राय

उ जे खबरी जनइबो अदिक (सूरज) से सुगा देले जुठियाए

उ जे मरबो रे सुगवा धनुक से सुगा गिरे मुरझाय

उ जे सुगनी जे रोए ले वियोग से आदित होइ ना सहाय देव होइ ना सहाय

काँच ही बाँस के बहँगिया, बहँगी लचकति जाय… बहँगी लचकति जाय… बात जे पुछेलें बटोहिया बहँगी केकरा के जाय ? बहँगी केकरा के जाय ? तू त आन्हर हउवे रे बटोहिया, बहँगी छठी माई के जाय… बहँगी छठी माई के जाय… काँच ही बाँस के बहँगिया, बहँगी लचकति जाय… बहँगी लचकति जाय… केरवा जे फरेला घवध से ओह पर सुगा मेंड़राय… ओह पर सुगा मेंड़राय… खबरि जनइबो अदित से सुगा देलें जूठियाय सुगा देलें जूठियाय… ऊ जे मरबो रे सुगवा धनुष से सुगा गिरे मुरझाय… सुगा गिरे मुरझाय… केरवा जे फरेला घवध से ओह पर सुगा मेंड़राय… ओह पर सुगा मेंड़राय… पटना के घाट पर नरियर नरियर किनबे जरूर… नरियर किनबो जरूर… हाजीपुर से केरवा मँगाई के अरघ देबे जरूर… अरघ देबे जरुर… आदित मनायेब छठ परबिया बर मँगबे जरूर… बर मँगबे जरूर… पटना के घाट पर नरियर नरियर किनबे जरूर… नरियर किनबो जरूर… पाँच पुतर अन धन लछमी, लछमी मँगबे जरूर… लछमी मँगबे जरूर… पान सुपारी कचवनिया छठ पूजबे जरूर… छठ पूजबे जरूर… हियरा के करबो रे कंचन वर मँगबे जरूर… वर मँगबे जरूर… पाँच पुतर अन धन लछमी, लछमी मँगबे जरूर… लछमी मँगबे जरूर… पुआ पकवान कचवनिया सूपवा भरबे जरूर… सूपवा भरबे जरूर… फर फूल भरबे दउरिया सेनूरा टिकबे जरूर… सेनूरा टिकबे जरुर… उहवें जे बाड़ी छठि मईया आदित रिझबे जरूर… आदित रिझबे जरूर… काँच ही बाँस के बहँगिया, बहँगी लचकति जाय… बहँगी लचकति जाय… बात जे पुछेलें बटोहिया बहँगी केकरा के जाय ? बहँगी केकरा के जाय ? तू त आन्हर हउवे रे बटोहिया, बहँगी छठी माई के जाय… बहँगी छठी माई के जाय..

Vehicle Number & Colour Numerology

छठ पूजा अर्घ्य मन्त्र समय
〰〰〰〰〰〰〰〰
ॐ सूर्य देवं नमस्ते स्तु गृहाणं करूणा करं।
अर्घ्यं च फ़लं संयुक्त गन्ध माल्याक्षतै युतम् ।।

पहला दिन
〰〰〰
18 नवम्बर – नहाय-खाय👉 दिन रविवार को छठ पूजा का प्रथम दिन है। ऋषिकेश में इस दिन सूर्योदय: 06:56 एवं सूर्यास्त: शाम 5:19 पर होगा। इस दिन से छठ पूजा का पर्व प्रारंभ हो जाता है

Vastu Check by Scientifically

दूसरा दिन
〰〰〰
19 नवंबर – खरना👉 सोमवार को छठ पूजा का दूसरा दिन है। इसदिन सूर्योदय से सूर्यास्त लेकर सूर्यास्त तक अन्न और जल दोनों का त्याग करके उपवास किया जाता है। इस दिन सूर्योदय: 06:56 औऱ सूर्यास्त: शाम 5:19 पर ही होगा । दूसरे दिन के अंत में खीर और रोटी का प्रसाद बनाया जाता है। इसे व्रत करने वाले से लेकर परिवार के सभी लोगों में बांटा जाता है। रात में चांद को जल भी दिया जाता है।

तीसरा दिन
〰〰〰〰
तीसरे दिन 20 नवंबर को संध्या समय में सूर्य देवता को पहला अर्घ्य दिया जाता है। इसदिन भी पूरे दिन का उपवास किया जाता है। इस दिन सूर्योदय: 06:57 सूर्यास्त: शाम 05:18 पर होगा। तीसरे दिन शाम को सूर्यास्त से पहले सूर्य देवता को छठ पूजा का पहला अर्घ्य दिया जाता है।

http://www.astrologyofmylife.com/product/astrology-of-my-life-online-consultant-acharya-arya/

चौथा दिन
〰〰〰
यह छठ पूजा का अंतिम दिना होता है। 21 नवंबर, रविवार की सुबह सूर्य देवता को अर्घ्य दिया जाएगा। यह छठ पूजा का दूसरा अर्घ्य होता है जिसके बाद 36 घंटे के लंबे उपवास का समापन हो जाता है। इस दिन सूर्योदय: 06:58 तथा सूर्यास्त: 5:18 पर होगा।

The post Chathh Puja Special – छठ पूजा विशेष appeared first on Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India.

]]>
https://www.astrologyofmylife.com/chathh-puja-special/feed/ 0