love Archives - Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India https://www.astrologyofmylife.com/tag/love/ Best Astrologer and Vastu Consultant at Pitampura Delhi - Acharya Dr. MSD Arya, Astrologer, Numerologist, Vastu Consultant, Gems Suggestions, best vastu consultant, moksha mukti, Best Astrologer, Astrology, Lal Kitab, Numerology, Horoscope, Matchmaking Astrologer, Astro SHop, Acharya Arya, Astro Arya, Astro arjuna, BlackMagic, hindu Panchang, Rashifal, Love, vashikaran, Thantrik, Raghava Bhatt, Moksha Mukti Jyotish and vastu Sansthan Delhi INdia Thu, 22 Feb 2024 07:26:05 +0000 en-GB hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0.2 https://www.astrologyofmylife.com/wp-content/uploads/2024/02/cropped-Moksha-Mukti-logo-latest-32x32.png love Archives - Best Astrologer at Delhi INDIA - Numerology and Palmistry Expert - Vastu Consultant - Horoscope, Kundli Milan, Varsha phal Report and Gems Suggestion by Acharya Dr MSD Arya - Astrology of My life - Moksha Mukti Jyotish and Vastu Sansthan Delhi India https://www.astrologyofmylife.com/tag/love/ 32 32 अंगारक योग – संघर्षकारी मंगल और राहु-केतु का योग https://www.astrologyofmylife.com/what-is-angarak-dosh/ https://www.astrologyofmylife.com/what-is-angarak-dosh/#respond Fri, 04 Jun 2021 12:14:08 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17789 संघर्षकारी मंगल और राहु-केतु का योग(Angarak Yog ek Dosh) संघर्षकारी मंगल और राहु का योग(Angarak Yog ek Dosh) Varshphal Report राहु के नैसर्गिक गुण/अवगुण राहु जातक, सिर और चेहरे, छायादार, धुएँ, बदसूरत अजीब दिखने वाला, धुएँ के रंग का (नीला या काला) रंग, मनमोहक, तर्कहीन, तर्कशील, कर्कश, हठी, तामसिक स्वभाव का, सिपाही, नकली, कपटी, स्वार्थी, …
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संघर्षकारी मंगल और राहु-केतु का योग(Angarak Yog ek Dosh)

संघर्षकारी मंगल और राहु का योग(Angarak Yog ek Dosh)

Varshphal Report

राहु के नैसर्गिक गुण/अवगुण राहु जातक, सिर और चेहरे, छायादार, धुएँ, बदसूरत अजीब दिखने वाला, धुएँ के रंग का (नीला या काला) रंग, मनमोहक, तर्कहीन, तर्कशील, कर्कश, हठी, तामसिक स्वभाव का, सिपाही, नकली, कपटी, स्वार्थी, चालाक, चालाकी, भ्रम, भ्रम, धुँआ आदि विषयों का राहु कारक है। भ्रामक, स्वार्थी, जोखिम लेने वाला, वर्जित तोड़ने वाला, चालाक, विद्रोही, धुआं, जोड़ तोड़, चिंतनशील, महत्वाकांक्षी, भूखा, प्रवर्धक आदि।

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मंगल के नैसर्गिक गुण/अवगुण मंगल ग्रह अग्नि है, जो सभी ग्रहों में सबसे अधिक प्रबल है। यह क्षत्रिय (योद्धा), राशि का स्वामी मेष, वृश्चिक 1 और 8 वीं राशि का स्वामी, सेना पुरुष, अस्त्र और शस्त्र शौर्य, वीरता, क्रोध, भूमि के गुण, विवाद, षड्यंत्र, दुर्घटना, घाव, मर्दाना शक्ति, यंत्र, वैधानिकता और मुकदमेबाजी मंगल ग्रह से संबंधित और प्रतिनिधित्व वाले सभी विषय हैं। आक्रामक, गर्म स्वभाव, योद्धा, साहस, भाईचारा, दुर्घटना, तेज बुखार, रक्तचाप, कार्रवाई, सर्जक, जुनून, इच्छा, आवेगी, ज्वालामुखी विस्फोट आदि। (Angarak Yog ek Dosh)
जब राहु और मंगल एक ही भाव में युति बनाते हैं, तो वह मंगल राहु अंगारक योग कहलाता है। मंगल ऊर्जा का स्रोत है, जो अग्नि तत्व से संबद्घ है, जबकि राहु भ्रम व नकारात्मक भावनाओं से जुड़ा हुआ है। जब दोनों ग्रह एक ही भाव में एकत्र होते हैं तो उनकी शक्ति पहले से अधिक हो जाती है।
ज्योतिष में मंगल को क्रोध, वाद विवाद, लड़ाई झगड़ा, हथियार, दुर्घटना, एक्सीडेंट, अग्नि, विद्युत आदि का कारक ग्रह माना गया है तथा राहु को आकस्मिकता, आकस्मिक घटनाएं, शत्रु, षड़यंत्र, नकारात्मक ऊर्जा, तामसिकता, बुरे विचार, छल, और बुरी आदतों का
कारक ग्रह माना गया है, इसलिए फलित ज्योतिष में मंगल और राहु के योग को बाहुत नकारात्मक और उठापटक कराने वाला योग माना गया है मंगल और राहु स्वतंत्र रूप से अलग अलग इतने नकारात्मक नहीं होते पर जब मंगल और राहु का योग होता है तो इससे मंगल और राहु की नकारात्मक प्रचंडता बहुत बढ़ जाती है जिस कारण यह योग विध्वंसकारी प्रभाव दिखाता है, मंगल राहु का योग प्राकृतिक और सामाजिक उठापटक की स्थिति तो बनाता ही है पर व्यक्तिगत रूप से भी मंगल राहु का योग नकारात्मक परिणाम देने वाला ही होता है। (Angarak Yog ek Dosh)
यदि जन्मकुंडली में मंगल और राहु एक साथ हो अर्थात कुंडली में मंगल राहु का योग हो तो सर्वप्रथम तो कुंडली के जिस भाव में यह योग बन रहा हो उस भाव को पीड़ित करता है और उस भाव से नियंत्रित होने वाले घटकों में संघर्ष की स्थिति बनी रहती है उदाहरण के लिए यदि कुंडली के लग्न भाव में मंगल राहु का योग हो तो ऐसे में स्वास्थ पक्ष की और से हमेशा कोई न कोई समस्या लगी रहेगी, धन भाव में मंगल राहु का योग होने पर आर्थिक संघर्ष और क़ुतुब के सुख में कमी होगी इसी प्रकार पंचम भाव में मंगल राहु का योग शिक्षा और संतान पक्ष को बाधित करेगा।

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इसके अलावा कुंडली में मंगल राहु का योग होने से व्यक्ति का क्रोध विध्वंसकारी होता है, समान्य रूप से तो प्रत्येक व्यक्ति को क्रोध आता है पर कुंडली में राहु मंगल का योग होने पर व्यक्ति का क्रोध बहुत प्रचंड स्थिति में होता है और व्यक्ति अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं कर पाता और बहुत बार क्रोध में बड़े गलत कदम उठा बैठता है, कुंडली में मंगल राहु का योग होने पर जीवन में दुर्घटनाओं की अधिकता होती है और कई बार दुर्घटना या एक्सीडेंट का सामना करना पड़ता है कुंडली में मंगल राहु का योग होने पर व्यक्ति को वहां चलाने में भी सावधानी बरतनी चाहिए , कुंडली में मंगल राहु का योग होने पर व्यक्ति को शत्रु और विरोधियों की और से भी बहुत समस्याएं रहती है और जीवन में वाद विवाद तथा झगड़ों की अधिकता होती है, कुंडली में मंगल राहु का योग बड़े भाई के सुख में कमी या वैचारिक मतभेद उत्पन्न करता है और मंगल राहु के योग के नकारात्मक परिणाम के कारण ही व्यक्ति को जीवन में कर्ज की समस्या का भी सामना करना पड़ता है, इसके अलावा यदि स्त्री जातक की कुंडली में मंगल राहु का योग हो तो वैवाहिक जीवन को बिगड़ता है स्त्री की कुंडली में मंगल पति और मांगल्य का प्रतिनिधि ग्रह होता है और राहु से पीड़ित होने के कारण ऐसे में पति सुख में कमी या वैवाहिक जीवन में संघर्ष की स्थिति बनी रहती है, जिन लोगो की कुंडली में मंगल राहु का योग होता है उन्हें अक्सर जमीन जायदात से जुडी समस्याएं भी परेशान करती हैं इसके अलावा मंगल राहु का योग हाई बी.पी. मांसपेशियों की समस्या, एसिडिटी, अग्नि और विद्युत दुर्घटना जैसी समस्याएं भी उत्पन्न करता है l

संघर्षकारी मंगल और केतु का योग (Angarak Yog ek Dosh)

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ज्योतिष शास्त्र में जब दो ग्रहों का प्रभाव एक जैसा हो तो उस प्रभाव की मिलने की सम्भावनाये बढ जाती हैं। इसी नियम के अधार पर ज्योतिष के समस्त योगों का निर्माण होता है। योग चाहे शुभ हो या अशुभ कारण यही नियम होगा। इस नियम के अनुसार जब किसी वस्तु, तत्व या गुण का प्रतिनिधित्व करने वाले दो ग्रह(ग्रह-भाव) का सयुंक्त प्रभाव एक साथ पडें तो उन के प्रभाव पर दोहरा बल काम करता है। यह नियम ग्रह बल तथा भाव के बल पर भी निर्भर करता है। जैसे शुक्र गुरु का सम्बंध, परस्पर एक दूसरे के विपरीत होने पर भी यें जातक को अत्यधिक विद्वान बनाते हैं, कारण स्पष्ट है कि इन दोनो ही ग्रहों को गुरु का पद प्राप्त है। इसी तरह अंगारक योग भी काम करता है।(Angarak Yog ek Dosh)मंगल तथा केतु की युक्ति अंगारक योग कहलाती है। यह अंगारक योग केतु व मंगल के सन्युक्त प्रभाव से बनता है। मंगल का दूसरा नाम अंगारक है। मंगल तिक्ष्ण, क्रूर, मारक क्षमता से युक्त ग्रह हैं। मंगल का जन्म कुंडली में अकेला प्रभाव भी हानिकारक हैं। जैसा की आपको ज्ञात है कि मंगल की विशेष भावों में स्थिति मंगल दोष को उत्पन्न करती है। मंगल जन्म कुंडली में सर्वाधिक पीडादायक ग्रह होता है। मंगल के समान ही केतु भी कष्ट दायक ग्रह होता है।(Angarak Yog ek Dosh)इसीलिये ज्योतिष शास्त्र मे मंगल के समान केतु कहा जाता है। इन दोनो का जन्म कुंडली में सन्युक्त प्रभाव मंगल की दोगुणी ताकत के समान होता है। जिस भाव में यह स्थिति बनेगी उस भाव जनित फलों को इनके प्रभाव से होकर गुजरना ही पडेगा।अंगारक योग में सबसे ज्यादा अग्नि व क्रोधात्मक प्रभाव देखने को मिलता

अंगारक दोष व्यक्ति, उसके गुस्से और उसके निर्णय के इर्द-गिर्द घूमता है। इस दोष के बुरे प्रभाव मिलने का एक बडा कारण इस योग के प्रभावों को न समझ पाना है।इस योग की अनदेखी के परिणामस्वरूप यह दोष और भी हानिकारक होता है। अंदर ही अंदर सुलगती यह अग्नि एकदिन प्रचंड रूप धारण कर लेती है। अंगारक योग के कारण, क्रोध, अग्निभय, दुर्घटना, ब्लड से सम्बंधीत रोग, और स्किन की समस्यायें मुख्य रूप से होती है।

सामान्य उपाय

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राहु मंगल युति का भाव अनुसार अलग अलग फल मिलता है उसी के अनुसार उपाय किये जायें तो परिणाम ज्यादा बेहतर मिलते है इसके लिये कुंडली का अध्ययन करना आवश्यक है फिर भी हम पाठको के लिये कुछ सामान्य उपाय बता रहे है आशा करते है इनको करने से आप लाभान्वित होंगे।

Married Life Report

तो यहाँ हमने देखा की मंगल और राहु का योग किस प्रकार की समस्याएं उत्पन्न करता है यदि कुंडली में मंगल राहु के योग के कारण समस्याएं उत्पन्न हो रही हो तो निम्नलिखित उपाय लाभकारी होंगे –
1. ॐ अंग अंगारकाय नमः का नियमित जाप करें।
2. हनुमान चालीसा का पाठ करें।
3. प्रत्येक शनिवार को साबुत उडद का दान करें।
4. प्रत्येक मंगलवार को गाय को गुड़ खिलाएं।
5. प्रतिदिन मस्तक पर सफ़ेद चन्दन का तिलक लगाएं।
6. शनिवार एवं बुधवार के दिन सूर्योदय से ढाई घंटे के अंदर सतनाजा (7 मुट्ठी सप्तधान्य) और सवा किलो कच्चा कोयला सर से 11 बार उसारकर बहते जल में प्रवाहित करें।

।। श्री हनुमते नमः।।

Prashna Kundli by Acharya Arya

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कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी? https://www.astrologyofmylife.com/how-does-the-brahmaputra-river-turn-red-during-kamakhya-devi-menstruation/ https://www.astrologyofmylife.com/how-does-the-brahmaputra-river-turn-red-during-kamakhya-devi-menstruation/#respond Thu, 25 Feb 2021 06:28:13 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17748 कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी? रजस्वला स्त्री मासिक धर्म, एक स्त्री की पहचान है, यह उसे पूर्ण स्त्रीत्व प्रदान करता है। लेकिन फिर भी हमारे समाज में रजस्वला स्त्री को अपवित्र माना जाता है। महीने के जिन दिनों में वह मासिक चक्र के अंतर्गत आती है, …
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कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?

रजस्वला स्त्री मासिक धर्म, एक स्त्री की पहचान है, यह उसे पूर्ण स्त्रीत्व प्रदान करता है। लेकिन फिर भी हमारे समाज में रजस्वला स्त्री को अपवित्र माना जाता है। महीने के जिन दिनों में वह मासिक चक्र के अंतर्गत आती है, उसे किसी भी पवित्र कार्य में शामिल नहीं होने दिया जाता, उसे किसी भी धार्मिक स्थल पर जाने की मनाही होती है। लेकिन विडंबना देखिए कि एक ओर तो हमारा समाज रजस्वला स्त्री को अपवित्र मानता है वहीं दूसरी ओर मासिक धर्म के दौरान कामाख्या देवी को सबसे पवित्र होने का दर्जा देता है।

तांत्रिक सिद्धियां

यह मंदिर तांत्रिक सिद्धियां प्राप्त करने के लिए प्रसिद्ध है। यहां तारा, धूमवती, भैरवी, कमला, बगलामुखी आदि तंत्र देवियों की मूर्तियां स्थापित हैं।

Prashna Kundli by Acharya Arya

 

पुन: निर्माण

इस मंदिर को सोलहवीं शताब्दी में नष्ट कर दिया गया था लेकिन बाद में कूच बिहार के राजा नर नारायण ने सत्रहवीं शताब्दी में इसका पुन: निर्माण करवाया था।

कामाख्या शक्तिपीठ (कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?)

नीलांचल पर्वत के बीचो-बीच स्थित कामाख्या मंदिर गुवाहाटी से करीब 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह मंदिर प्रसिद्ध 108 शक्तिपीठों में से एक है। माना जाता है कि पिता द्वारा किए जा रहे यज्ञ की अग्नि में कूदकर सती के आत्मदाह करने के बाद जब महादेव उनके शव को लेकर तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने उनके क्रोध को शांत करने के लिए अपना सुदर्शन चक्र छोड़कर सती के शव के टुकड़े कर दिए थे। उस समय जहां सती की योनि और गर्भ आकर गिरे थे, आज उस स्थान पर कामाख्या मंदिर स्थित है।

Horoscope

 

कामदेव का पौरुष

इसके अलावा इस मंदिर को लेकर एक और कथा चर्चित है। कहा जाता है कि एक बार जब काम के देवता कामदेव ने अपना पुरुषत्व खो दिया था तब इस स्थान पर रखे सती के गर्भ और योनि की सहायता से ही उन्हें अपना पुरुषत्व हासिल हुआ था। एक और कथा यह कहती है कि इस स्थान पर ही शिव और पार्वती के बीच प्रेम की शुरुआत हुई थी। संस्कृत भाषा में प्रेम को काम कहा जाता है, जिससे कामाख्या नाम पड़ा।

अधूरी सीढ़ियां (कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?)

इस मंदिर के पास मौजूद सीढ़ियां अधूरी हैं, इसके पीछे भी एक कथा मौजूद है। कहा जाता है एक नरका नाम का राक्षस देवी कामाख्या की सुंदरता पर मोहित होकर उनसे विवाह करना चाहता था। परंतु देवी कामाख्या ने उसके सामने एक शर्त रख दी।

kamakhya Devi - acharya arya - puja

कामाख्या देवी से विवाह

कामाख्या देवी ने नरका से कहा कि अगर वह एक ही रात में नीलांचल पर्वत से मंदिर तक सीढ़ियां बना पाएगा तो ही वह उससे विवाह करेंगी। नरका ने देवी की बात मान ली और सीढ़ियां बनाने लगा। देवी को लगा कि नरका इस कार्य को पूरा कर लेगा इसलिए उन्होंने एक तरकीब निकाली। उन्होंने एक कौवे को मुर्गा बनाकर उसे भोर से पहले ही बांग देने को कहा। नरका को लगा कि वह शर्त पूरी नहीं कर पाया है, परंतु जब उसे हकीकत का पता चला तो वह उस मुर्गे को मारने दौड़ा और उसकी बलि दे दी। जिस स्थान पर मुर्गे की बलि दी गई उसे कुकुराकता नाम से जाना जाता है। इस मंदिर की सीढ़ियां आज भी अधूरी हैं।

मासिक चक्र (कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?)

कामाख्या देवी को ‘बहते रक्त की देवी’ भी कहा जाता है, इसके पीछे मान्यता यह है कि यह देवी का एकमात्र ऐसा स्वरूप है जो नियमानुसार प्रतिवर्ष मासिक धर्म के चक्र में आता है। सुनकर आपको अटपटा लग सकता है लेकिन कामाख्या देवी के भक्तों का मानना है कि हर साल जून के महीने में कामाख्या देवी रजस्वला होती हैं और उनके बहते रक्त से पूरी ब्रह्मपुत्र नदी का रंग लाल हो जाता है।
निषेध है मंदिर में प्रवेश
इस दौरान तीन दिनों तक यह मंदिर बंद हो जाता है लेकिन मंदिर के आसपास ‘अम्बूवाची पर्व’ मनाया जाता है। इस दौरान देश-विदेश से सैलानियों के साथ तांत्रिक, अघोरी साधु और पुजारी इस मेले में शामिल होने आते हैं। शक्ति के उपासक, तांत्रिक और साधक नीलांचल पर्वत की विभिन्न गुफाओं में बैठकर साधना कर सिद्धियां प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।

Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya

 

वाममार्गी (कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?)

कामाख्या मंदिर को वाममार्ग साधना के लिए सर्वोच्च पीठ का दर्जा दिया गया है। ऐसा माना जाता है कि मछन्दरनाथ, गोरखनाथ, लोनाचमारी, ईस्माइलजोगी आदि जितने भी महान तंत्र साधक रहे हैं वे सभी इस स्थान पर साधना करते थे, यहीं उन्होंने अपनी साधना पूर्ण की थी।

भक्तों और स्थानीय लोगों का मानना है कि अम्बूवाची पर्व के दौरान कामाख्या देवी के गर्भगृह के दरवाजे अपने आप ही बंद हो जाते हैं और उनका दर्शन करना निषेध माना जाता है। पौराणिक दस्तावेजों में भी कहा गया है कि इन तीन दिनों में कामाख्या देवी रजस्वला होती हैं और उनकी योनि से रक्त प्रवाहित होता है।

तंत्र साधनाओं में रजस्वला स्त्री और उसके रक्त का विशेष महत्व होता है इसलिए यह पर्व या कामाख्या देवी के रजस्वला होने का यह समय तंत्र साधकों और अघोरियों के लिए सुनहरा काल होता है।

Life Prediction

 

योनि के वस्त्र (कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?)

इस पर्व की शुरुआत से पूर्व गर्भगृह स्थित योनि के आकार में स्थित शिलाखंड, जिसे महामुद्रा कहा जाता है, को सफेद वस्त्र पहनाए जाते हैं, जो पूरी तरह रक्त से भीग जाते हैं। पर्व संपन्न होने के बाद पुजारियों द्वारा यह वस्त्र भक्तों में वितरित कर दिए जाते हैं।

बहुत से तांत्रिक, साधु, ज्योतिषी ऐसे भी होते हैं जो यहां से वस्त्र ले जाकर उसे छोटा-छोटा फाड़कर मनमाने दामों पर उन वस्त्रों को कमिया वस्त्र या कमिया सिंदूर का नाम देकर बेचते हैं।

http://www.astrologyofmylife.com/product/astrology-of-my-life-online-consultant-acharya-arya/

 

आस्था का विषय

देवी के रजस्वला होने की बात पूरी तरह आस्था से जुड़ी है। इस मानसिकता से इतर सोचने वाले बहुत से लोगों का कहना है कि पर्व के दौरान ब्रह्मपुत्र नदी में प्रचुर मात्रा में सिंदूर डाला जाता है, जिसकी वजह से नदी लाल हो जाती है। कुछ तो यह भी कहते हैं कि यह नदी बेजुबान जानवरों की बलि के दौरान उनके बहते हुए रक्त से लाल होती है। इस मंदिर में कभी मादा पशु की बलि नहीं दी जाती।
सामान्य स्त्री और देवी
खैर, तथ्य चाहे जो भी हो परंतु माहवारी काल के दौरान कामाख्या देवी की आराधना कर कहीं ना कहीं हम स्त्रीत्व की आराधना करते हैं। हम स्त्री, जिसे ‘जननी’ कहा जाता है, उसका भी सम्मान करते हैं। लेकिन जब बात व्यवहारिकता की, एक सामान्य स्त्री की आती है तो हमारा व्यवहार पूरी तरह क्यों बदल जाता है?

कामाख्या सिन्दूर असली में छोटे छोटे पत्थरोँ के रूप में होता है, जो की माँ कामाख्या मंदिर से प्राप्त होता है, प्रसाद के रूप में वहां से और भी माँ कामाख्या की चीज़ें प्राप्त होती है जिनमे कामाख्या वस्त्र, कामाख्या कड़ा और कामाख्या यन्त्र भी मिलता है पर सभी लोगो को नहीं.
सारे भक्तो को सिर्फ दो ही चीज़ें दी जाती है जब मंदिर का द्वार खुलता है और वो दो चीज़ें कामाख्या सिन्दूर और वस्त्र होती है कामाख्या सिन्दूर को लोग कामिया सिन्दूर भी कहते है और कामाख्या वस्त्र को लोग अम्बुबाची वस्त्र भी कहते है।
और ये दोनों चीज़ें सिर्फ अम्बुबाची मेला के दौरान ही वितरित की जाती है, तीन दिन के लिए मंदिर का द्वार बंद कर दिया जाता है और फिर जब मंदिर का द्वार खुलता है तो प्रसाद के रूप में सिन्दूर और वस्त्र वितरित किया जाता है।
अम्बुबाची मेला हर साल जून के महीने में मनाया जाता है, क्योकि जहा पर मंदिर स्थित है उस ग्राम का नाम अम्बुबाची है इसलिए इस मेले का नाम अम्बुबाची मेला है और ये मंदिर नीलांचल पर्वत पर स्थित है हर साल लाखो करोडो भक्त माँ कामाख्या का आशीर्वाद लेने यहाँ आते है और अपनी मनोकामनाओ को पूर्ण करते है।

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(कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?)

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Tulsi Vivah – तुलसी विवाह कराने से सौभाग्य और पुण्य की प्राप्ति होती है https://www.astrologyofmylife.com/tulsi-vivah/ https://www.astrologyofmylife.com/tulsi-vivah/#respond Wed, 25 Nov 2020 06:19:12 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17452 देवउठनी एकादशी को तुलसी एकादश भी कहा जाता है। तुलसी को साक्षात लक्ष्मी का निवास माना जाता है इसलिए कहा जाता है कि जो भी इस मास में तुलसी के समक्ष दीप जलाता है उसे अत्यन्त लाभ होता है। इस दिन तुलसी विवाह का भी आयोजन किया जाता है। तुलसी जी का विवाह शालिग्राम से …
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देवउठनी एकादशी को तुलसी एकादश भी कहा जाता है। तुलसी को साक्षात लक्ष्मी का निवास माना जाता है इसलिए कहा जाता है कि जो भी इस मास में तुलसी के समक्ष दीप जलाता है उसे अत्यन्त लाभ होता है। इस दिन तुलसी विवाह का भी आयोजन किया जाता है। तुलसी जी का विवाह शालिग्राम से कराया जाता है। मान्यता है कि इस प्रकार के आयोजन से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। तुलसी शालिग्राम का विवाह करने से वही पुण्य प्राप्त होता है जो माता−पिता अपनी पुत्री का कन्यादान करके पाते हैं। शास्त्रों और पुराणों में उल्लेख है कि जिन लोगों के यहां कन्या नहीं होती यदि वह तुलसी का विवाह करके कन्यादान करें तो जरूर उनके यहां कन्या होगी। इस आयोजन की विशेषता यह होती है कि विवाह में जो रीति−रिवाज होते हैं उसी तरह तुलसी विवाह के सभी कार्य किए जाते हैं साथ ही विवाह से संबंधित मंगल गीत भी गाए जाते हैं। (Tulsi Vivah)

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तुलसी विवाह की पूजन विधि (Tulsi Vivah)

जिस गमले में तुलसी का पौधा लगा है उसे गेरु आदि से सजाकर उसके चारों ओर मंडप बनाकर उसके ऊपर सुहाग की प्रतीक चुनरी को ओढ़ा दें। इसके अलावा गमले को भी साड़ी में लपेट दें और उसका श्रृंगार करें। इसके बाद सिद्धिविनायक श्रीगणेश सहित सभी देवी−देवताओं और श्री शालिग्रामजी का विधिवत पूजन करें। एक नारियल दक्षिणा के साथ टीका के रूप में रखें और भगवान शालिग्राम की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसीजी की सात परिक्रमा कराएं। इसके बाद आरती करें।

Vastu Check by Scientifically

 

भगवती तुलसी और शालिग्राम का यह है संबंध (Tulsi Vivah)

भगवती तुलसी मूल प्रकृति की ही प्रधान अंश हैं। प्रारम्भ में वे गोलोक में तुलसी नाम की गोपी थीं। भगवान के चरणों में उनका अतिशय प्रेम था। रासलीला में उनकी श्रीकृष्ण के प्रति अनुरक्ति देखकर राधाजी ने कुपित होकर उन्हें मानव योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया। इससे वे भारत वर्ष में राजा धर्मध्वज की पुत्री हुईं। गोलोक में ही सुदामा नाम का एक गोप भी था जो भगवान श्रीकृष्ण का मुख्य पार्षद था, उसे भी किसी कारण से क्रुद्ध होकर राधाजी ने दानव योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया। उनके शाप से अगले जन्म में वह सुदामा शंखचूड़ दानव बना। ब्रह्माजी की प्रेरणा से भगवती तुलसी का शंखचूड़ दानव से गन्धर्व विवाह संपन्न हुआ। ब्रह्माजी का वरदान प्राप्त कर उस दानवराज ने अपने पराक्रम द्वारा देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर उस पर अपना अधिकार कर लिया।

देवतागण त्रस्त होकर भगवान श्रीविष्णु की शरण में गये। भगवान श्रीविष्णु ने देवताओं को शंखचूड़ के जन्म एवं वरदान आदि की सब कथा सुनायी तथा उसकी मृत्यु का उपाय बताते हुए उसे मारने के लिए भगवान शंकर को एक त्रिशूल प्रदान किया तथा यह भी बताया कि तुलसी का सतीत्व नष्ट होने पर ही उसकी मृत्यु संभव हो सकेगी। इसका भी आश्वासन भगवान श्रीविष्णु ने देवताओं को दिया। अपने कथानुसार, भगवान श्रीविष्णु ने छलपूर्वक तुलसी का सतीत्व नष्ट किया, उधर भगवान शंकर ने त्रिशूल द्वारा शंखचूड़ का वध कर डाला। पतिव्रता तुलसी को भगवान के द्वारा छलपूर्वक अपना सतीत्व नष्ट करने की जानकारी हुई तो अत्यन्त शोक संतप्त होकर उसने भगवान को पाषाण होने का शाप दे दिया।

Name Check & Suggestion by Numerology

 

तुलसी की कारुणिक अवस्था देखकर उसे समझाते हुए भगवान ने कहा− हे भद्रे! तुमने भारत में रहकर मेरे लिये बहुत समय तक तपस्या की है और साथ ही इस शंखचूड़ ने भी उस समय तुम्हारे लिये दीर्घ समय तक तपस्या की थी। तुम्हें पत्नी रूप में प्राप्त करने के बाद अंत में वह गोलोक चला गया। अब मैं तुम्हें तुम्हारी तपस्या का फल प्रदान करना उचित समझता हूं। तुम्हारा यह शरीर गण्डकी नदी के रूप में प्रसिद्ध होगा। तुम्हारा केशसमूह पुण्यवृक्ष के रूप में प्रकट होगा, जो तुलसी नाम से प्रसिद्ध होगा। देवपूजन में प्रयुक्त होने वाले समस्त पुष्पों और पत्रों में तुलसी की प्रधानता होगी। सभी लोकों में निरंतर तुम मेरे सान्निध्य में रहोगी।

मैं भी तुम्हारे शाप से पाषाण बनकर भारतवर्ष में गण्डकी नदी के तट के समीप निवास करूंगा। चारों वेदों के पढ़ने तथा तपस्या करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह पुण्य शालग्राम शिला के पूजन से निश्चित रूप से सुलभ हो जाता है। उसी समय तुलसी के शरीर से गण्डकी नदी उत्पन्न हुई और भगवान श्रीहरि उसी के तट पर मनुष्यों के लिए पुण्यप्रद शालग्राम बन गये।

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भगवान ब्रह्माजी का कथन (Tulsi Vivah)

पुराणों में उल्लेख मिलता है कि ब्रह्माजी कहते हैं कि यदि तुलसी के आधे पत्ते से भी प्रतिदिन भक्तिपूर्वक भगवान की पूजा की जाये तो भी वे स्वयं आकर दर्शन देते हैं। अपनी लगायी हुई तुलसी जितना ही अपने मूल का विस्तार करती है, उतने ही सहस्त्र युगों तक मनुष्य ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है। यदि कोई तुलसी संयुक्त जल में स्नान करता है तो वह सब पापों से मुक्त हो भगवान श्रीविष्णु के लोक में आनन्द का अनुभव करता है।

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तुलसी का महत्व (Tulsi Vivah)

जो व्यक्ति तुलसी का संग्रह करता है और लगाकर तुलसी का वन तैयार कर देता है, वह उतने से ही पापमुक्त हो ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है। जिसके घर में तुलसी का बगीचा विद्यमान है, उसका वह घर तीर्थ के समान है, वहां यमराज के दूत नहीं जाते। तुलसीवन सब पापों को नष्ट करने वाला, पुण्यमय तथा अभीष्ट कामनाओं को देने वाला है। जो श्रेष्ठ मानव तुलसी का बगीचा लगाते हैं, वे यमराज को नहीं देखते। जो मनुष्य तुलसी काष्ठ संयुक्त गंध धारण करता है, क्रियामाण पाप उसके शरीर का स्पर्श नहीं करता। जहां तुलसी वन की छाया होती है, वहीं पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध करना चाहिए। जिसके मुख में, कान में और मस्तक पर तुलसी का पत्ता दिखायी देता है, उसके ऊपर यमराज भी दृष्टि नहीं डाल सकते फिर दूतों की बात ही क्या है। जो प्रतिदिन आदरपूर्वक तुलसी की महिमा सुनता है, वह सब पापों से मुक्त हो ब्रह्मलोक को जाता है।

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मान्यता है कि कार्तिक मास में तुलसी के पास दीपक जलाने से अनंत पुण्य प्राप्त होता है। तुलसी को साक्षात लक्ष्मी का निवास माना जाता है इसलिए कहा जाता है कि जो भी इस मास में तुलसी के समक्ष दीप जलाता है उसे अत्यन्त लाभ होता है।

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Bhai Dooj: भाईदूज कब है? प्रभु कृष्ण और सुभद्रा से जुड़ी त्योहार की रोचक कथा https://www.astrologyofmylife.com/when-is-diwali-bhai-dooj-date-in-india-subh-tithi-tilak-ka-subh-muhurat-and-story-of-bhai-dooj-acharya-arya/ https://www.astrologyofmylife.com/when-is-diwali-bhai-dooj-date-in-india-subh-tithi-tilak-ka-subh-muhurat-and-story-of-bhai-dooj-acharya-arya/#respond Fri, 06 Nov 2020 10:26:18 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17421 हिंदू धर्म में रक्षाबंधन की तरह की भाईदूज का त्योहार भी विशेष महत्व होता है। भाईदूज का पर्व कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इसे यम द्वितीया भी कहते हैं। भाईदूज का त्योहार दिवाली के दो दिन बाद आता है। भाईदूज के दिन बहनें भाइयों का तिलक करके लंबी …
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हिंदू धर्म में रक्षाबंधन की तरह की भाईदूज का त्योहार भी विशेष महत्व होता है। भाईदूज का पर्व कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इसे यम द्वितीया भी कहते हैं। भाईदूज का त्योहार दिवाली के दो दिन बाद आता है। भाईदूज के दिन बहनें भाइयों का तिलक करके लंबी आयु और सुख समृद्धि की कामना करती हैं।

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भाईदूज से जुड़ी पौराणिक कथा-

कई ऐसी पौराणिक कहानियां प्रचलित हैं, जिन्हें भाईदूज की शुरुआत का कारण मानते हैं। जिनमें से एक भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब वह राक्षस नरकासुर को मारने के बाद घर लौटे तो उनका स्वागत उनकी बहन (सुभद्रा) ने फूल, फल और मिठाई से किया।

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सुभद्रा ने दीया जलाकर और भगवान श्रीकृष्ण के माथे पर तिलक लगाकर एक हजार से ज्यादा सालों तक भाई के जीवित रहने की कामना की। कहते हैं कि इसके बाद ही भाईदूज मनाने की परपंरा बन गई।

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Detailed story of Lord Sri Jagannath Ji https://www.astrologyofmylife.com/detailed-story-of-lord-sri-jagannath-ji/ https://www.astrologyofmylife.com/detailed-story-of-lord-sri-jagannath-ji/#respond Fri, 03 Jul 2020 19:07:49 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17188 एक बार भगवान श्री कृष्ण सो रहे थे और निद्रावस्था में उनके मुख से राधा जी का नाम निकला. पटरानियों को लगा कि वह प्रभु की इतनी सेवा करती है परंतु प्रभु सबसे ज्यादा राधा जी का ही स्मरण रहता है। रुक्मिणी जी एवं अन्य रानियों ने रोहिणी जी से राधा रानी व श्री कृष्ण …
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एक बार भगवान श्री कृष्ण सो रहे थे और निद्रावस्था में उनके मुख से राधा जी का नाम निकला. पटरानियों को लगा कि वह प्रभु की इतनी सेवा करती है परंतु प्रभु सबसे ज्यादा राधा जी का ही स्मरण रहता है।

रुक्मिणी जी एवं अन्य रानियों ने रोहिणी जी से राधा रानी व श्री कृष्ण के प्रेम व ब्रज-लीलाओं का वर्णन करने की प्रार्थना की. माता ने कथा सुनाने की हामी तो भर दी लेकिन यह भी कहा कि श्री कृष्ण व बलराम को इसकी भनक न मिले।

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तय हुआ कि सभी रानियों को रोहिणी जी एक गुप्त स्थान पर कथा सुनाएंगी. वहां कोई और न आए इसके लिए सुभद्रा जी को पहरा देने के लिए मना लिया गया।

सुभद्रा जी को आदेश हुआ कि स्वयं श्री कृष्ण या बलराम भी आएं तो उन्हें भी अंदर न आने देना. माता ने कथा सुनानी आरम्भ की. सुभद्रा द्वार पर तैनात थी. थोड़ी देर में श्री कृष्ण एवं बलराम वहां आ पहुंचे. सुभद्रा ने अन्दर जाने से रोक लिया।

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इससे भगवान श्री कृष्ण को कुछ संदेह हुआ. वह बाहर से ही अपनी सूक्ष्म शक्ति द्वारा अन्दर की माता द्वारा वर्णित ब्रज लीलाओं को आनंद लेकर सुनने लगे. बलराम जी भी कथा का आनंद लेने लगे।

कथा सुनते-सुनते श्री कृष्ण, बलराम व सुभद्रा के हृदय में ब्रज के प्रति अद्भुत प्रेम भाव उत्पन्न हुआ. उस भाव में उनके पैर-हाथ सिकुड़ने लगे जैसे बाल्य काल में थे. तीनों राधा जी की कथा में ऐसे विभोर हुए कि मूर्ति के समान जड़ प्रतीत होने लगे।

बड़े ध्यान पूर्वक देखने पर भी उनके हाथ-पैर दिखाई नहीं देते थे. सुदर्शन ने भी द्रवित होकर लंबा रूप धारण कर लिया. उसी समय देवमुनि नारद वहां आ पहुंचे. भगवान के इस रूप को देखकर आश्चर्यचकित हो गए और निहारते रहे।

कुछ समय बाद जब तंद्रा भंग हुई तो नारद जी ने प्रणाम करके भगवान श्री कृष्ण से कहा- हे प्रभु ! मेरी इच्छा है कि मैंने आज जो रूप देखा है, वह रूप आपके भक्त जनों को पृथ्वी लोक पर चिर काल तक देखने को मिले. आप इस रूप में पृथ्वी पर वास करें।

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भगवान श्री कृष्ण नारद जी की बात से प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि ऐसा ही होगा. कलिकाल में मैं इसी रूप में नीलांचल क्षेत्र में अपना स्वरूप प्रकट करुंगा।

कलियुग आगमन के उपरांत प्रभु की प्रेरणा से मालव राज इन्द्रद्युम्न ने भगवान श्री कृष्ण, बलभद्र जी और बहन सुभद्रा जी की ऐसी ही प्रतिमा जगन्नाथ मंदिर में स्थापित कराई. यह रोचक कथा आगे पड़े।

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राजा इन्द्रद्युम्न श्रेष्ठ प्रजा पालक राजा थे. प्रजा उन्हें बहुत प्रेम करती थी. प्रजा सुखी और संतुष्ट थी. राजा के मन में इच्छा थी कि वह कुछ ऐसा करे जिससे सभी उन्हें स्मरण रखें।

दैवयोग से इंद्रद्युम्न के मन में एक अज्ञात कामना प्रगट हुई कि वह ऐसा मंदिर का निर्माण कराएं जैसा दुनिया में कहीं और न हो. इंद्रद्युम्न विचारने लगे कि आखिर उनके मंदिर में किस देवता की मूर्ति स्थापित करें।

राजा के मन में यही इच्छा और चिंतन चलने लगा. एक रात इसी पर गंभीर चिंतन करते सो गए. नीद में राजा ने एक सपना देखा. सपने में उन्हें एक देव वाणी सुनाई पड़ी।

इंद्रद्युम्न ने सुना- राजा तुम पहले नए मंदिर का निर्माण आरंभ करो. मूर्ति विग्रह की चिंता छोड़ दो. उचित समय आने पर तुम्हें स्वयं राह दिखाई पड़ेगी. राजा नीद से जाग उठे. सुबह होते ही उन्होंने अपने मंत्रियों को सपने की बात बताई।

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राज पुरोहित के सुझाव पर शुभ मुहूर्त में पूर्वी समुद्र तट पर एक विशाल मंदिर के निर्माण का निश्चय हुआ. वैदिक-मंत्रोचार के साथ मंदिर निर्माण का श्रीगणेश हुआ।

राजा इंद्रद्युम्न के मंदिर बनवाने की सूचना शिल्पियों और कारीगरों को हुई. सभी इसमें योगदान देने पहुंचे. दिन रात मंदिर के निर्माण में जुट गए. कुछ ही वर्षों में मंदिर बनकर तैयार हुआ।

सागर तट पर एक विशाल मंदिर का निर्माण तो हो गया परंतु मंदिर के भीतर भगवान की मूर्ति की समस्या जस की तस थी. राजा फिर से चिंतित होने लगे. एक दिन मंदिर के गर्भगृह में बैठकर इसी चिंतन में बैठे राजा की आंखों से आंसू निकल आए।

राजा ने भगवान से विनती की- प्रभु आपके किस स्वरूप को इस मंदिर में स्थापित करूं इसकी चिंता से व्यग्र हूं. मार्ग दिखाइए. आपने स्वप्न में जो संकेत दिया था उसे पूरा होने का समय कब आएगा ? देव विग्रह विहीन मंदिर देख सभी मुझ पर हंसेंगे।

राजा की आंखों से आंसू झर रहे थे और वह प्रभु से प्रार्थना करते जा रहे थे- प्रभु आपके आशीर्वाद से मेरा बड़ा सम्मान है. प्रजा समझेगी कि मैंने झूठ-मूठ में स्वप्न में आपके आदेश की बात कहकर इतना बड़ा श्रम कराया. हे प्रभु मार्ग दिखाइए।

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राजा दुखी मन से अपने महल में चले गए. उस रात को राजा ने फिर एक सपना देखा. सपने में उसे देव वाणी सुनाई दी- राजन ! यहां निकट में ही भगवान श्री कृष्ण का विग्रह रूप है. तुम उन्हें खोजने का प्रयास करो, तुम्हें दर्शन मिलेंगे।

इन्द्रद्युम्न ने स्वप्न की बात पुनः पुरोहित और मंत्रियों को बताई. सभी यह निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्रभु की कृपा सहज प्राप्त नहीं होगी. उसके लिए हमें निर्मल मन से परिश्रम आरंभ करना होगा।

भगवान के विग्रह का पता लगाने की जिम्मेदारी राजा इंद्रद्युम्न ने चार विद्वान पंडितों को सौंप दिया. प्रभु इच्छा से प्रेरित होकर चारों विद्वान चार दिशाओं में निकले।

उन चारों में एक विद्वान थे विद्यापति. वह चारों में सबसे कम उम्र के थे. प्रभु के विग्रह की खोज के दौरान उनके साथ बहुत से अलौकिक घटनाएं हुई।

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प्रभु का विग्रह किसे मिला ? यह प्रसंग आगे पढ़ें।

पंडित विद्यापति पूर्व दिशा की ओर चले. कुछ आगे चलने के बाद विद्यापति उत्तर की ओर मुडे तो उन्हें एक जंगल दिखाई दिया. वन भयावह था. विद्यापति श्री कृष्ण के उपासक थे. उन्होंने श्री कृष्ण का स्मरण किया और राह दिखाने की प्रार्थना की।

भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से उन्हें राह दिखने लगी. प्रभु का नाम लेते वह वन में चले जा रहे थे. जंगल के मध्य उन्हें एक पर्वत दिखाई दिया. पर्वत के वृक्षों से संगीत की ध्वनि सा सुरम्य गीत सुनाई पड़ रहा था।

विद्यापति संगीत के जान कार थे. उन्हें वहां मृदंग, बंसी और करताल की मिश्रित ध्वनि सुनाई दे रही थी. यह संगीत उन्हें दिव्य लगा. संगीत की लहरियों को खोजते विद्यापति आगे बढ़ चले।

वह जल्दी ही पहाड़ी की चोटी पर पहुंच गए. पहाड़ के दूसरी ओर उन्हें एक सुंदर घाटी दिखी जहां भील नृत्य कर रहे थे. विद्यापति उस दृश्य को देखकर मंत्र मुग्ध थे. सफर के कारण थके थे पर संगीत से थकान मिट गयी और उन्हें नींद आने लगी।

अचानक एक बाघ की गर्जना सुनकर विद्यापति घबरा उठे. बाघ उनकी और दौड़ता आ रहा था. बाघ को देखकर विद्यापति घबरा गए और बेहोश होकर वहीं गिर पडे।

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बाघ विद्यापति पर आक्रमण करने ही वाला था कि तभी एक स्त्री ने बाघ को पुकारा- बाघा..!! उस आवाज को सुनकर बाघ मौन खडा हो गया. स्त्री ने उसे लौटने का आदेश दिया तो बाघ लौट पड़ा।

बाघ उस स्त्री के पैरों के पास ऐसे लोटने लगा जैसे कोई बिल्ली पुचकार सुनकर खेलने लगती है. युवती बाघ की पीठ को प्यार से थपथपाने लगी और बाघ स्नेह से लोटता रहा।

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वह स्त्री वहां मौजूद स्त्रियों में सर्वाधिक सुंदर थी. वह भीलों के राजा विश्वावसु की इकलौती पुत्री ललिता थी. ललिता ने अपनी सेविकाओं को अचेत विद्यापति की देखभाल के लिए भेजा।

सेविकाओं ने झरने से जल लेकर विद्यापति पर छिड़का. कुछ देर बाद विद्यापति की चेतना लौटी. उन्हें जल पिलाया गया. विद्यापति यह सब देख कर कुछ आश्चर्य में थे।

ललिता विद्यापति के पास आई और पूछा- आप कौन हैं और भयानक जानवरों से भरे इस वन में आप कैसे पहुंचे. आपके आने का प्रयोजन बताइए ताकि मैं आपकी सहायता कर सकूं।

विद्यापति के मन से बाघ का भय पूरी तरह गया नहीं था. ललिता ने यह बात भांप ली और उन्हें सांत्वना देते हुए कहा- विप्रवर आप मेरे साथ चलें. जब आप स्वस्थ हों तब अपने लक्ष्य की ओर प्रस्थान करें।

विद्यापति ललिता के पीछे-पीछे उनकी बस्ती की तरफ चल दिए. विद्यापति भीलों के पाजा विश्वावसु से मिले और उन्हें अपना परिचय दिया. विश्वावसु विद्यापति जैसे विद्वान से मिलकर बड़े प्रसन्नता हुए।

विश्वावसु के अनुरोध पर विद्यापति कुछ दिन वहां अतिथि बनकर रूके. वह भीलों को धर्म और ज्ञान का उपदेश देने लगे. उनके उपदेशों को विश्वावसु तथा ललिता बड़ी रूचि के साथ सुनते थे. ललिता के मन में विद्यापति के लिए अनुराग पैदा हो गया।

विद्यापति ने भी भांप लिया कि ललिता जैसी सुंदरी को उनसे प्रेम हो गया है किंतु विद्यापति एक बड़े कार्य के लिए निकले थे. अचानक एक दिन विद्यापति बीमार हो गए. ललिता ने उसकी सेवा सुश्रुषा की।

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इससे विद्यापति के मन में भी ललिता के प्रति प्रेम भाव पैदा हो गया. विश्वावसु ने प्रस्ताव रखा की विद्यापति ललिता से विवाह कर ले. विद्यापति ने इसे स्वीकार कर लिया।

कुछ दिन दोनों के सुखमय बीते. ललिता से विवाह करके विद्यापति प्रसन्न तो था पर जिस महत्व पूर्ण कार्य के लिए वह आए थे, वह अधूरा था। यही चिंता उन्हें बार बार सताती थी।

इस बीच विद्यापति को एक विशेष बात पता चली. विश्वावसु हर रोज सवेरे उठ कर कहीं चला जाता था और सूर्योदय के बाद ही लौटता था. कितनी भी विकट स्थिति हो उसका यह नियम कभी नहीं टूटता था।

विश्वावसु के इस व्रत पर विद्यापति को आश्चर्य हुआ. उनके मन में इस रहस्य को जानने की इच्छा हुई. आखिर विश्वावसु जाता कहां है. एक दिन विद्यापति ने ललिता से इस सम्बन्ध में पूछा. ललिता यह सुनकर सहम गई।

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आखिर वह क्या रहस्य था ? क्या वह रहस्य विद्यापति के कार्य में सहयोगी था या विद्यापति पत्नी के प्रेम में मार्ग भटक गए. यह प्रसंग आगे पढ़ें

विद्यापति ने ललिता से उसके पिता द्वारा प्रतिदिन सुबह किसी अज्ञात स्थान पर जाने और सूर्योदय के पूर्व लौट आने का रहस्य पूछा. विश्ववासु का नियम किसी हाल में नहीं टूटता था चाहे कितनी भी विकट परिस्थिति हो।

ललिता के सामने धर्म संकट आ गया. वह पति की बात को ठुकरा नहीं सकती थी लेकिन पति जो पूछ रहा था वह उसके वंश की गोपनीय परंपरा से जुड़ी बात थी जिसे खोलना संभव नहीं था।

ललिता ने कहा- स्वामी ! यह हमारे कुल का रहस्य है जिसे किसी के सामने खोला नहीं जा सकता परंतु आप मेरे पति हैं और मैं आपको कुल का पुरुष मानते हुए जितना संभव है उतना बताती हूं।

यहां से कुछ दूरी पर एक गुफा है जिसके अन्दर हमारे कुल देवता हैं. उनकी पूजा हमारे सभी पूर्वज करते आए हैं. यह पूजा निर्बाध चलनी चाहिए. उसी पूजा के लिए पिता जी रोज सुबह नियमित रूप से जाते हैं।

विद्यापति ने ललिता से कहा कि वह भी उनके कुल देवता के दर्शन करना चाहते हैं. ललिता बोली- यह संभव नहीं. हमारे कुल देवता के बारे में किसी को जानने की इच्छा है, यह सुनकर मेरे पिता क्रोधित हो जाएंगे।

विद्यापति की उत्सुक्ता बढ़ रही थी. वह तरह-तरह से ललिता के अपने प्रेम की शपथ देकर उसे मनाने लगे. आखिर कार ललिता ने कहा कि वह अपने पिता जी से विनती करेगी कि वह आपको देवता के दर्शन करा दें।

ललिता ने पिता से सारी बात कही. वह क्रोधित हो गए. ललिता ने जब यह कहा कि मैं आपकी अकेली संतान हूं. आपके बाद देवता के पूजा का दायित्व मेरा होगा. इसलिए मेरे पति का यह अधिकार बनता है क्योंकि आगे उसे ही पूजना होगा।

विश्वावसु इस तर्क के आगे झुक गए. वह बोले- गुफा के दर्शन किसी को तभी कराए जा सकते हैं जब वह भगवान की पूजा का दायित्व अपने हाथ में ले ले. विद्यापति ने दायित्व स्वीकार किया तो विश्वावसु देवता के दर्शन कराने को राजी हुए।

दूसरे दिन सूर्योदय से पूर्व विद्यापति की आंखों पर पट्टी बांधकर विश्वावसु उनका दाहिना हाथ पकड़ कर गुफा की तरफ निकले. विद्यापति ने मुट्ठी में सरसों रख लिया था जिसे रास्ते में छोड़ते हुए गए।

गुफा के पास पहुंचकर विश्वावसु रुके और गुफा के पास पहुंच गए. विश्वावसु ने विद्यापति के आँखों की काली पट्टी खोल दी. उस गुफा में नीले रंग का प्रकाश चमक उठा. हाथों में मुरली लिए भगवान श्री कृष्ण का रूप विद्यापति को दिखाई दिया।

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विद्यापति आनंद मग्न हो गए. उन्होंने भगवान के दर्शन किए. दर्शन के बाद तो जैसे विद्यापति जाना ही नहीं चाहते थे. पर विश्वावसु ने लौटने का आदेश दिया. फिर उनकी आंखों पर पट्टी बांधी और दोनों लौट पड़े।

लौटने पर ललिता ने विद्यापति से पूछा. विद्यापति ने गुफा में दिखे अलौकिक दृश्य के बारे में पत्नी को बताना भी उसने उचित नहीं समझा. वह टाल गए. यह तो जानकारी हो चुकी थी कि विश्वावसु श्री कृष्ण की मूर्ति की पूजा करते हैं।

विद्यापति को आभास हो गया कि महाराज ने स्वप्न में जिस प्रभु विग्रह के बारे में देव वाणी सुनी थी, वह इसी मूर्ति के बारे में थी. विद्यापति विचार करने लगे कि किसी तरह इसी मूर्ति को लेकर राजधानी पहुंचना होगा।

वह एक तरफ तो गुफा से मूर्ति को लेकर जाने की सोच रहे थे दूसरी तरफ भील राज और पत्नी के साथ विश्वासघात के विचार से उनका मन व्यथित हो रहा था. विद्यापति धर्म-अधर्म के बारे में सोचता रहे।

फिर विचार आया कि यदि विश्वावसु ने सचमुच उसपर विश्वास किया होता तो आंखों पर पट्टी बांधकर गुफा तक नहीं ले जाता. इसलिए उसके साथ विश्वास घात का प्रश्न नहीं उठता. उसने गुफा से मूर्ति चुराने का मन बना लिया।

विद्यापति ने ललिता से कहा कि वह अपने माता-पिता के दर्शन करने के लिए जाना चाहता है. वे उसे लेकर परेशान होंगे. ललिता भी साथ चलने को तैयार हुई तो विद्यापति ने यह कह कर समझा लिया कि वह शीघ्र ही लौटेगा तो उसे लेकर जाएगा।

ललिता मान गई. विश्वावसु ने उसके लिए घोड़े का प्रबंध किया. अब तक सरसों के दाने से पौधे निकल आए थे. उनको देखता विद्यापति गुफा तक पहुंच गया. उसने भगवान की स्तुति की और क्षमा प्रार्थना के बाद उनकी मूर्ति उठाकर झोले में रख ली।

शाम तक वह राजधानी पहुंच गया और सीधा राजा के पास गया. उसने दिव्य प्रतिमा राजा को सौंप दी और पूरी कहानी सुनायी. राजा ने बताया कि उसने कल एक सपना देखा कि सुबह सागर में एक कुन्दा बहकर आएगा।

उस कुंदे की नक्काशी करवाकर भगवान की मूर्ति बनवा लेना जिसका अंश तुम्हें प्राप्त होने वाला है. वह भगवान श्री विष्णु का स्वरूप होगा. तुम जिस मूर्ति को लाए हो वह भी भगवान विष्णु का अंश है. दोनों आश्वस्त थे कि उनकी तलाश पूरी हो गई है।

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राजा ने कहा कि जब भगवान द्वारा भेजी लकड़ी से हम इस प्रतिमा का वड़ा स्वरूप बनवा लेंगे तब तुम अपने ससुर से मिलकर उन्हें मूर्ति वापस कर देना. उनके कुल देवता का इतना बड़ा विग्रह एक भव्य मंदिर में स्थापित देखकर उन्हें खुशी ही होगी।

दूसरे दिन सूर्योदय से पूर्व राजा विद्यापति तथा मंत्रियों को लेकर सागर तट पर पहुंचा. स्वप्न के अनुसार एक बड़ा कुंदा पानी में बहकर आ रहा था. सभी उसे देखकर प्रसन्न हुए. दस नावों पर बैठकर राजा के सेवक उस कुंदे को खींचने पहुंचे।

मोटी-मोटी रस्सियों से कुंदे को बांधकर खींचा जाने लगा लेकिन कुंदा टस से मस नहीं हुआ. और लोग भेजे गए लेकिन सैकड़ों लोग और नावों का प्रयोग करके भी कुंदे को हिलाया तक नहीं जा सका।

राजा का मन उदास हो गया. सेनापति ने एक लंबी सेना कुंदे को खींचने के लिए भेज दी. सारे सागर में सैनिक ही सैनिक नजर आने लगे लेकिन सभी मिल कर कुंदे को अपने स्थान से हिला तक न सके. सुबह से रात हो गई।

अचानक राजा ने काम रोकने का आदेश दिया. उसने विद्यापति को अकेले में ले जाकर कहा कि वह समस्या का कारण जान गया है. राजा के चेहरे पर संतोष के भाव थे. राजा ने विद्यापति को गोपनीय रूप से कहीं चलने की बात कही।

राजा इंद्रद्युम्न ने कहा कि अब भगवान का विग्रह बन जाएगा. बस एक काम करना होगा. भगवान श्री कृष्ण ने राजा को ऐसा क्या संकेत दे दिया था कि उसकी सारी परेशानी समाप्त हो गई. यह प्रसंग आगे पढ़ें।

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राजा इंद्रध्युम्न को भगवान की प्रेरणा से समझ में आने लगा कि आखिर प्रभु के विग्रह के लिए जो लकड़ी का कुंदा पानी में बह कर आया है वह हिल-डुल भी क्यों नहीं रहा।

राजा ने विद्यापति को बुलाया और कहा- तुम जिस दिव्य मूर्ति को अपने साथ लाए हो उसकी अब तक जो पूजा करता आया था उससे तुरंत भेंट करके क्षमा मांगनी होगी. बिना उसके स्पर्श किए यह कुंदा आगे नहीं बढ सकेगा।

राजा इंद्रद्युम्न और विद्यापति विश्वावसु से मिलने पहुंचे. राजा ने पर्वत की चोटी से जंगल को देखा तो उसकी सुंदरता को देखता ही रह गया. दोनों भीलों की बस्ती की ओर चुपचाप चलते रहे।

इधर विश्वावसु अपने नियमित दिनचर्या के हिसाब से गुफा में अपने कुल देवता की पूजा के लिए चले. वहां प्रभु की मूर्ति गायब देखी तो वह समझ गए कि उनके दामाद ने ही यह छल किया है।

विश्वावसु लौटे और ललिता को सारी बात सुना दी. विश्वावसु पीड़ा से भरा घर के आंगन में पछाड़ खाकर गिर गए. ललिता अपने पति द्वारा किए विश्वास घात से दुखी थी और स्वयं को इसका कारण मान रही थी. पिता-पुत्री दिन भर विलाप करते रहे।

उन दोनों ने अन्न का एक दाना भी न छुआ. अगली सुबह विश्वावसु उठे और सदा की तरह अपनी दिनचर्या का पालन करते हुए गुफा की तरफ बढ़ निकले. वह जानते थे कि प्रभु का विग्रह वहां नहीं है फिर भी उनके पैर गुफा की ओर खींचे चले जाते थे।

विश्वावसु के पीछे ललिता और रिश्तेदार भी चले. विश्वावसु गुफा के भीतर पहुंचे. जहां भगवान की मूर्ति होती थी उस चट्टान के पास खड़े होकर हाथ जोड़ कर खडे रहे. फिर उस ऊंची चट्टान पर गिर गए और बिलख–बिलख कर रोने लगे. उनके पीछे प्रजा भी रो रही थी।

एक भील युवक भागता हुआ गुफा के पास आया और बताया कि उसने महाराज और उनके साथ विद्यापति को बस्ती की ओर से आते देखा है. यह सुन कर सब चौंक उठे. विश्वावसु राजा के स्वागत में गुफा से बाहर आए लेकिन उनकी आंखों में आंसू थे।

राजा इंद्रद्युमन विश्वावसु के पास आए और उन्हें अपने हृदय से लगा लिया. राजा बोले- भीलराज, तुम्हारे कुल देवता की प्रतिमा का चोर तुम्हारा दामाद नहीं मैं हूं. उसने तो अपने महाराज के आदेश का पालन किया. यह सुन कर सब चौंक उठे।

Shri Bhairav Yantra

विश्वावसु ने राजा को आसन दिया. राजा ने उस विश्वावसु को शुरू से अंत तक पूरी बात बता कर कहा कि आखिर क्यों यह सब करना पड़ा. फिर राजा ने उनसे अपने स्वप्न और फिर जगन्नाथ पुरी में सागर तट पर मंदिर निर्माण की बात कह सुनाई।

राजा ने विश्वावसु से प्रार्थना की- भील सरदार विश्वावसु, कई पीढ़ियों से आपके वंश के लोग भगवान की मूर्ति को पूजते आए हैं. भगवान के उस विग्रह के दर्शन सभी को मिले इसके लिए आपकी सहायता चाहिए।

ईश्वर द्वारा भेजे गए लकड़ी के कुंदे से बनी मूर्ति के भीतर हम इस दिव्य मूर्ति को सुरछित रखना चाहते हैं. अपने कुल की प्रतिमा को पुरी के मंदिर में स्थापित करने की अनुमति दो. उस कुंदे को तुम स्पर्श करोगे तभी वह हिलेगा

विश्वावसु राजी हो गए. राजा सपरिवार विश्वावसु को लेकर सागर तट पर पहुंचे. विश्वावसु ने कुंदे को छुआ. छूते ही कुंदा अपने आप तैरता हुआ किनारे पर आ लगा. राजा के सेवकों ने उस कुंदे को राज महल में पहुंचा दिया।

अगले दिन मूर्तिकारों और शिल्पियों को राजा ने बुलाकर मंत्रणा की कि आखिर इस कुंदे से कौन सी देवमूर्ति बनाना शुभ दायक होगा. मूर्तिकारों ने कह दिया कि वे पत्थर की मूर्तियां बनाना तो जानते हैं लेकिन लकड़ी की मूर्ति बनाने का उन्हें ज्ञान नहीं।

एक नए विघ्न के पैदा होने से राजा फिर चिंतित हो गए. उसी समय वहां एक बूढा आया. उसने राजा से कहा- इस मंदिर में आप भगवान श्री कृष्ण को उनके भाई बलभद्र तथा बहन सुभद्रा के साथ विराज मान करें. इस दैवयोग का यही संकेत है।

राजा को उस बूढ़े व्यक्ति की बात से सांत्वना तो मिली लेकिन समस्या यह थी कि आखिर मूर्ति बने कैसे ? उस बूढ़े ने कहा कि मैं इस कला में कुशल हूं. मैं इस पवित्र कार्य को पूरा करूंगा और मूर्तियां बनाउंगा. पर मेरी एक शर्त है।

राजा प्रसन्न हो गए और उनकी शर्त पूछी. बूढ़े शिल्पी ने कहा- मैं भगवान की मूर्ति निर्माण का काम एकांत में करूंगा. मैं यह काम बंद कमरे में करुंगा. कार्य पूरा करने के बाद मैं स्वयं दरवाजा खोल कर बाहर आऊंगा. इस बीच कोई मुझे नहीं बुलाए।

राजा सहमत तो थे लेकिन उन्हें एक चिंता हुई और बोले- यदि कोई आपके पास नहीं आएगा तो ऐसी हालत में आपके खाने पीने की व्यवस्था कैसे होगी ? शिल्पी ने कहा- जब तक मेरा काम पूर्ण नहीं होता मैं कुछ खाता-पीता नहीं हूं।

राज मंदिर के एक विशाल कक्ष में उस बूढ़े शिल्पी ने स्वयं को 21 दिनों के लिए बंद कर लिया और काम शुरू कर दिया. भीतर से आवाजें आती थीं. महारानी गुंडीचा देवी दरवाजे से कान लगाकर अक्सर छेनी-हथौड़े के चलने की आवाजें सुना करती थीं।

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महारानी रोज की तरह कमरे के दरवाजे से कान लगाए खड़ी थीं. 15 दिन बीते थे कि उन्हें कमरे से आवाज सुनायी पडनी बंद हो गई. जब मूर्ति कार के काम करने की कोई आवाज न मिली तो रानी चिंतित हो गईं।

उन्हें लगा कि वृद्ध आदमी है, खाता-पीता भी नहीं कहीं उसके साथ कुछ अनिष्ट न हो गया हो. व्याकुल होकर रानी ने दरवाजे को धक्का देकर खोला और भीतर झांककर देखा।

महारानी गुंडीचा देवी ने इस तरह मूर्ति कार को दिया हुआ वचन भंग कर दिया था. मूर्ति कार अभी मूर्तियां बना रहा था. परंतु रानी को देखते ही वह अदृश्य हो गए. मूर्ति निर्माण का कार्य अभी तक पूरा नहीं हुआ था. हाथ-पैर का निर्माण पूर्ण नहीं हुआ था।

वृद्ध शिल्प कार के रूप में स्वयं देवताओं के शिल्पी भगवान विश्वकर्मा आए थे. उनके अदृश्य होते ही मूर्तियां अधूरी ही रह गईं. इसी कारण आज भी यह मूर्तियां वैसी ही हैं. उन प्रतिमाओं को ही मंदिर में स्थापित कराया गया।

कहते हैं विश्वावसु संभवतः उस जरा बहेलिए का वंशज था जिसने अंजाने में भगवान कृष्ण की ह्त्या कर दी थी. विश्वावसु शायद कृष्ण के पवित्र अवशेषों की पूजा करता था. ये अवशेष मूर्तियों में छिपाकर रखे गए थे।

विद्यापति और ललिता के वंशज जिन्हें दैत्यपति कहते हैं उनका परिवार ही यहां अब तक पूजा करता है।

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गांधारी के शाप को हंसते-हंसते स्वीकार करलिया श्री कृष्ण ने https://www.astrologyofmylife.com/shri-krishna-accepted-gandhari-curse-with-laughter/ https://www.astrologyofmylife.com/shri-krishna-accepted-gandhari-curse-with-laughter/#respond Sat, 30 May 2020 07:58:26 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=16704 गांधारी के शाप को हंसते-हंसते स्वीकार करलिया श्री कृष्ण ने महाभारत युद्ध के पश्चात् जब श्रीकृष्ण सहित सभी पांडव गांधारी से मिलने गए, तब पुत्रशोक में विह्वल गांधारी ने आंखों की पट्टी के भीतर से ही राजा युधिष्ठिर के पैरों की अंगुलियों के अग्रभाग को एक क्षण के लिए देखा। इतने देखने मात्र से ही …
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गांधारी के शाप को हंसते-हंसते स्वीकार करलिया श्री कृष्ण ने

महाभारत युद्ध के पश्चात् जब श्रीकृष्ण सहित सभी पांडव गांधारी से मिलने गए, तब पुत्रशोक में विह्वल गांधारी ने आंखों की पट्टी के भीतर से ही राजा युधिष्ठिर के पैरों की अंगुलियों के अग्रभाग को एक क्षण के लिए देखा। इतने देखने मात्र से ही युधिष्ठिर के पैरों के नाखून काले पड़ गए। गांधारीजी यह बात अच्छी तरह से जानती थीं कि महाभारत का पूरा युद्ध जिस योद्धा के बलबूते पर लड़ा गया है और जिसके कारण पाण्डवों को विजय मिली है, वह श्रीकृष्ण ही हैं। अत: गांधारीजी का सारा क्रोध्र श्रीकृष्ण पर ही केन्द्रित हो गया। वे श्रीकृष्ण को सम्बोधित करती हुई कहती हैं–

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‘मधुसूदन! माधव! जनार्दन! कमलनयन! तुम शक्तिशाली थे, तुममें महान बल है, तुम्हारे पास बहुत-से सैनिक थे, दोनों पक्षों से अपनी बात मनवा लेने की सामर्थ्य तुममें थी, तुमने वेदशास्त्र और महात्माओं की बात सुनी और जानी हैं, यह सब होते हुए भी तुमने स्वेच्छा से कुरुवंश के नाश की उपेक्षा की; जानबूझकर इस वंश का नाश होने दिया। यह तुम्हारा महान दोष है, अत: तुम इसका फल प्राप्त करो।’ .

इतना सब सुनकर भी श्रीकृष्ण शान्त, गम्भीर और मौन रहे। गांधारी के क्रोध ने प्रचण्डरूप धारण कर लिया और वे नागिन की भांति फुफकार कर बोली–

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‘चक्रगदाधर! मैंने पति की सेवा से जो कुछ भी तप प्राप्त किया है, उस तपोबल से तुम्हें शाप दे रही हूँ–आज से छत्तीसवां वर्ष आने पर तुम्हारा समस्त परिवार आपस में लड़कर मर जाएगा। तुम सबकी आंखों से ओझल होकर अनाथ के समान वन में घूमोगे और किसी निन्दित उपाय से मृत्यु को प्राप्त होगे। इन भरतवंश की स्त्रियों के जैसे तुम्हारे कुल की स्त्रियां भी इसी तरह सगे-सम्बन्धियों की लाशों पर गिरेंगी।’

ऐसा घोर शाप सुनकर भला कौन न भय से कांप उठता, परन्तु श्रीकृष्ण ने उसी गम्भीर मुस्कान के साथ कहा–‘मैं जानता हूँ, ऐसा ही होने वाला है। वृष्णिकुल का संहारक मेरे अतिरिक्त और हो भी कौन सकता है? यादवों को देव, दानव और मनुष्य तो मार नहीं सकते, अत: वे आपस में ही लड़कर नष्ट होंगे।’

Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya

शाप सुनकर भी भगवान श्रीकृष्ण गांधारी से कहते हैं–’उठो! शोक मत करो। प्रतिदिन युद्ध के लिए जाने से पूर्व जब तुम्हारा पुत्र दुर्योधन तुमसे आशीर्वाद लेने आता था और कहता था कि मां मैं युद्ध के लिए जा रहा हूँ, तुम मेरे कल्याण के लिए आशीर्वाद दो, तब तुम सदा यही उत्तर देती थीं ‘यतो धर्मस्ततो जय:’ अर्थात् धर्म की जय हो।’

यह कहकर समत्वयोगी श्रीकृष्ण निर्विकार भाव से खड़े रहे और गांधारी मौन हो गयीं।

Prashna Kundli by Acharya Arya

प्रसंग का सार

〰〰🌼〰〰

इस प्रसंग का सार यही है कि सुख-दु:ख को मेहमान समझकर स्वागत करें। दु:ख में विचलित न होकर धैर्य के साथ उसका सामना करें। क्योंकि वाल्मीकिरामायण में कहा गया है–‘दुर्लभं हि सदा सुखम्।’ अर्थात् सदा सुख मिले यह दुर्लभ है।

Gemstone Suggestion

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गोचर ग्रहों का फल – अष्टक वर्ग एवं गोचर https://www.astrologyofmylife.com/gochar-grah/ https://www.astrologyofmylife.com/gochar-grah/#respond Fri, 03 Apr 2020 11:17:00 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=16550 गोचर ग्रहों का फल : अष्टक वर्ग एवं गोचर: गोचर शब्द “गम” धातु से बना है, जिसका अर्थ है “चलने वाला”। “चर” शब्द का अर्थ है “गतिमय होना”। इस प्रकार “गोचर” का अर्थ हुआ-“निरन्तर चलने वाला”। ब्रह्माण में स्थित ग्रह अपनी-अपनी धुरी पर अपनी गति से निरन्तर भ्रमण करते रहते हैं। इस भ्रमण के दौरान …
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गोचर ग्रहों का फल : अष्टक वर्ग एवं गोचर:

गोचर शब्द “गम” धातु से बना है, जिसका अर्थ है “चलने वाला”। “चर” शब्द का अर्थ है “गतिमय होना”। इस प्रकार “गोचर” का अर्थ हुआ-“निरन्तर चलने वाला”।

ब्रह्माण में स्थित ग्रह अपनी-अपनी धुरी पर अपनी गति से निरन्तर भ्रमण करते रहते हैं। इस भ्रमण के दौरान वे एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं। ग्रहों के इस प्रकार राशि परिवर्तन करने के उपरांत दूसरी राशि में उनकी स्थिति को ही “गोचर” कहा जाता है। प्रत्येक ग्रह का जातक की जन्मराशि से विभिन्न भावों “गोचर” भावानुसार शुभ-अशुभ फल देता है।
भ्रमण काल-
सूर्य,शुक्र,बुध का भ्रमण काल १ माह, चंद्र का सवा दो दिन, मंगल का ५७ दिन, गुरू का १ वर्ष,राहु-केतु का डेढ़ वर्ष व शनि का भ्रमण का ढ़ाई वर्ष होता है अर्थात ये ग्रह इतने समय में एक राशि में रहते हैं तत्पश्चात ये अपनी राशि-परिवर्तन करते हैं।
विभिन्न ग्रहों का “गोचर” अनुसार फल-

Online Astrologer – Acharya Dr MSD Arya

१. सूर्य-
सूर्य जन्मकालीन राशि से ३,६,१० और ११ वें भाव में शुभ फल देता है। शेष भावों में सूर्य का फल अशुभ देता है।
२. चंद्र-
चंद्र जन्मकालीन राशि से १,३,६,७,१०,व ११ भाव में शुभ तथा ४, ८, १२ वें भाव में अशुभ फल देता है।
३. मंगल-
मंगल जन्मकालीन राशि से ३,६,११ भाव में शुभ फल देता है। शेष भावों में अशुभ फल देता है।
४. बुध-
बुध जन्मकालीन राशि से २,४,६,८,१० और ११ वें भाव में शुभ फल देता है। शेष भावों में अशुभ फल देता है।
५. गुरू-
गुरू जन्मकालीन राशि से २,५,७,९ और ११ वें भाव में शुभ फल देता है। शेष भावों में अशुभ फल देता है।

Varshphal Report

६. शुक्र-
शुक्र जन्मकालीन राशि से १,२,३,४,५,८,९,११ और १२ वें भाव में शुभ फल देता है। शेष भावों में अशुभ फल देता है।
७. शनि-
शनि जन्मकालीन राशि से ३,६,११ भाव में शुभ फल देता है। शेष भावों में अशुभ फल देता है।
८. राहु-
राहु जन्मकालीन राशि से ३,६,११ वें भाव में शुभ फल देता है। शेष भावों में अशुभ फल देता है।
९. केतु-
केतु जन्मकालीन राशि से १,२,३,४,५,७,९ और ११ वें भाव में शुभ फल देता है। शेष भावों में अशुभ फल देता है।

Varshphal Report

प्रस्तुतकर्ता ज्योतिष आचार्य आर्य

गोचर ग्रहों का फल –

गोचर ग्रहों का जातक पर फल
गोचर ग्रहों से यह मतलब होता है की वर्तमान में आसमान में ग्रह किन राशियों में भ्रमण कर रहे है. गोचर ग्रहों का अध्ययन जातक की चन्द्र राशि से किया जाता है . गोचर ग्रहों का जातक के वर्तमान जीवन में सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है .यदि गोचर मे सूर्य जनम राशी से इन भावो में हो तो इसका फल इस प्रकार होता है .

Life Prediction

प्रथम भाव में – इस भाव में होने पर रक्त में कमी की सम्भावना होती है . इसके अलावा गुस्सा आता है पेट में रोग और कब्ज़ की परेशानी आने लगती है . नेत्र रोग , हृदय रोग ,मानसिक अशांति ,थकान और सर्दी गर्मी से पित का प्रकोप होने लगता है .इसके आलवा फालतू का घूमना , बेकार का परिश्रम , कार्य में बाधा ,विलम्ब ,भोजन का समय में न मिलना , धन की हानि , सम्मान में कमी होने लगती है परिवार से दूरियां बनने लगती है .
द्वितीय भाव में – इस भाव में सूर्य के आने से धन की हानि ,उदासी ,सुख में कमी , असफ़लत अ, धोका .नेत्र विकार , मित्रो से विरोध , सिरदर्द , व्यापार में नुकसान होने लगता है .
तृतीय भाव में – इस भाव में सूर्य के फल अच्छे होते है .यहाँ जब सूर्य होता है तो सभी प्रकार के लाभ मिलते है . धन , पुत्र ,दोस्त और उच्चाधिकारियों से अधिक लाभ मिलता है . जमीन का भी फायदा होता है . आरोग्य और प्रसस्नता मिलती है . शत्रु हारते हैं . समाज में सम्मान प्राप्त होता है .
चतुर्थ भाव – इस भाव में सूर्य के होने से ज़मीन सम्बन्धी , माता से , यात्रा से और पत्नी से समस्या आती है . रोग , मानसिक अशांति और मानहानि के कष्ट आने लगते हैं .
पंचम भाव – इस भाव में भी सूर्य परेशान करता है .पुत्र को परेशानी , उच्चाधिकारियों से हानि और रोग व् शत्रु उभरने लगते है .
६ ठे भाव में – इस भाव में सूर्य शुभ होता है . इस भाव में सूर्य के आने पर रोग ,शत्रु ,परेशानियां शोक आदि दूर भाग जाते हैं .
सप्तम भाव में – इस भाव में सूर्य यात्रा ,पेट रोग , दीनता , वैवाहिक जीवन के कष्ट देता है स्त्री – पुत्र बीमारी से परेशान हो जाते हैं .पेट व् सिरदर्द की समस्या आ जाती है . धन व् मान में कमी आ जाती है .
अष्टम भाव में – इस में सूर्य बवासीर , पत्नी से परेशानी , रोग भय , ज्वर , राज भय , अपच की समस्या पैदा करता है .
नवम भाव में – इसमें दीनता ,रोग ,धन हानि , आपति , बाधा , झूंठा आरोप , मित्रो व् बन्धुओं से विरोध का सामना करन पड़ता है .
दशम भाव में – इस भाव में सफलता , विजय , सिद्धि , पदोन्नति , मान , गौरव , धन , आरोग्य , अच्छे मित्र की प्राप्ति होती है .
एकादश भाव में – इस भाव में विजय , स्थान लाभ , सत्कार , पूजा , वैभव ,रोगनाश ,पदोन्नति , वैभव पितृ लाभ . घर में मांगलिक कार्य संपन्न होते हैं .
द्वादश भाव में – इस भाव में सूर्य शुभ होता है .सदाचारी बनता है , सफलता दिलाता है अच्छे कार्यो के लिए , लेकिन पेट , नेत्र रोग , और मित्र भी शत्रु बन जाते हैं .

Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya

चन्द्र की गोचर भाव के फल

प्रथम भाव में – जब चन्द्र प्रथम भाव में होता है तो जातक को सुख , समागम , आनंद व् निरोगता का लाभ होता है . उत्तम भोजन ,शयन सुख , शुभ वस्त्र की प्राप्ति होती है .
द्वितीय भाव – इस भाव में जातक के सम्मान और धन में बाधा आती है .मानसिक तनाव ,परिवार से अनबन , नेत्र विकार , भोजन में गड़बड़ी हो जाती है . विद्या की हानि , पाप कर्मी और हर काम में असफलता मिलने लगती है .
तृतीय भाव में – इस भाव में चन्द्र शुभ होता है .धन , परिवार ,वस्त्र , निरोग , विजय की प्राप्ति शत्रुजीत मन खुश रहता है , बंधु लाभ , भाग्य वृद्धि ,और हर तरह की सफलता मिलती है .
चतुर्थ भाव में – इस भाव में शंका , अविश्वास , चंचल मन , भोजन और नींद में बाधा आती है .स्त्री सुख में कमी , जनता से अपयश मिलता है , छाती में विकार , जल से भय होता है .
पंचम भाव में – इस भाव में दीनता , रोग ,यात्रा में हानि , अशांत , जलोदर , कामुकता की अधिकता और मंत्रणा शक्ति में न्यूनता आ जाती है .
सिक्स्थ भाव में – इस भाव में धन व् सुख लाभ मिलता है . शत्रु पर जीत मिलती है .निरोय्गता ,यश आनंद , महिला से लाभ मिलता है .
सप्तम भाव में – इस भाव में वाहन की प्राप्ति होती है. सम्मान , सत्कार ,धन , अच्छा भोजन , आराम काम सुख , छोटी लाभ प्रद यात्रायें , व्यापर में लाभ और यश मिलता है .
अष्टम भाव में – इस भाव में जातक को भय , खांसी , अपच . छाती में रोग , स्वांस रोग , विवाद ,मानसिक कलह , धन नाश और आकस्मिक परेशानी आती है.
नवम भाव में – बंधन , मन की चंचलता , पेट रोग ,पुत्र से मतभेद , व्यापार हानि , भाग्य में अवरोध , राज्य से हानि होती है .
दशम भाव में – इस में सफलता मिलती है . हर काम आसानी से होता है . धन , सम्मान , उच्चाधिकारियों से लाभ मिलता है . घर का सुख मिलता है .पद लाभ मिलता है . आज्ञा देने का सामर्थ्य आ जाता है .
एकादश भाव में – इस भाव में धन लाभ , धन संग्रह , मित्र समागम , प्रसन्नता , व्यापार लाभ , पुत्र से लाभ , स्त्री सुख , तरल पदार्थ और स्त्री से लाभ मिलता है .
द्वादस भाव में – इस भाव में धन हानि ,अपघात , शारीरिक हानियां होती है .

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मंगल ग्रह का प्रभाव गोचर में इस प्रकार से होता है.

प्रथम भाव में – जब मंगल आता है .तो रोग्दायक हो कर बवासीर ,रक्त विकार ,ज्वर , घाव , अग्नि से डर , ज़हर और अस्त्र से हानि देता है.
द्वतीय भाव में –यहाँ पर मंगल से पित ,अग्नि ,चोर से खतरा ,राज्य से हानि , कठोर वाणी के कारण हानि , कलह और शत्रु से परेशानियाँ आती है .
तृतीय भाव – इस भाव में मंगल के आ जाने से चोरो और किशोरों के माध्यम से धन की प्राप्ति होती है शत्रु डर जाते हैं . तर्क शक्ति प्रबल होती है. धन , वस्त्र , धातु की प्राप्ति होती है . प्रमुख पद मिलता है .
चतुर्थ भाव में – यहं पर पेट के रोग ,ज्वर , रक्त विकार , शत्रु पनपते हैं .धन व् वस्तु की कमी होने लगती है .गलत संगती से हानि होने लगती है . भूमि विवाद , माँ को कष्ट , मन में भय , हिंसा के कारण हानि होने लगती है .
पंचम भाव – यहाँ पर मंगल के कारण शत्रु भय , रोग , क्रोध , पुत्र शोक , शत्रु शोक , पाप कर्म होने लगते हैं . पल पल स्वास्थ्य गिरता रहता है .
छठा भाव – यहाँ पर मंगल शुभ होता है . शत्रु हार जाते हैं . डर भाग जाता हैं . शांति मिलती है. धन – धातु के लाभ से लोग जलते रह जाते हैं .
सप्तम भाव – इस भाव में स्त्री से कलह , रोग ,पेट के रोग , नेत्र विकार होने लगते हैं .
अष्टम भाव में – यहाँ पर धन व् सम्मान में कमी और रक्तश्राव की संभावना होती है .
नवम भाव – यहाँ पर धन व् धातु हानि , पीड़ा , दुर्बलता , धातु क्षय , धीमी क्रियाशीलता हो जाती हैं.
दशम भाव – यहाँ पर मिलाजुला फल मिलता हैं,
एकादश भाव – यहाँ मंगल शुभ होकर धन प्राप्ति ,प्रमुख पद दिलाता हैं.
द्वादश भाव – इस भाव में धन हानि , स्त्री से कलह नेत्र वेदना होती है .

Prashna Kundli by Acharya Arya

बुध का गोचर में प्रभाव –

प्रथम भाव में – इस भाव में चुगलखोरी अपशब्द , कठोर वाणी की आदत के कारण हानि होती है .कलह बेकार की यात्रायें . और अहितकारी वचन से हानियाँ होती हैं .
द्वीतीय भाव में – यहाँ पर बुध अपमान दिलाने के बावजूद धन भी दिलाता है .
तृतीय भाव – यहाँ पर शत्रु और राज्य भय दिलाता है . ये दुह्कर्म की ओर ले जाता है .यहाँ मित्र की प्राप्ति भी करवाता है .
चतुर्थ भाव् – यहाँ पर बुध शुभ होकर धन दिलवाता है .अपने स्वजनों की वृद्धि होती है .
पंचम भाव – इस भाव में मन बैचैन रहता है . पुत्र व् स्त्री से कलह होती है .
छठा भाव – यहाँ पर बुध अच्छा फल देता हैं. सौभाग्य का उदय होता है . शत्रु पराजित होते हैं . जातक उन्नतशील होने लगता है . हर काम में जीत होने लगते हैं
सप्तम भाव – यहं पर स्त्री से कलह होने लगती हैं .
अष्टम भाव – यहाँ पर बुध पुत्र व् धन लाभ देता है .प्रसन्नता भी देता है .
नवम – यहाँ पर बुध हर काम में बाधा डालता हैं .
दशम भाव – यहाँ पर बुध लाभ प्रद हैं. शत्रुनाशक ,धन दायक ,स्त्री व् शयन सुख देता है .
एकादश भाव में – यहाँ भी बुध लाभ देता हैं . धन , पुत्र , सुख , मित्र ,वाहन , मृदु वाणी प्रदान करता है .
द्वादश भाव- यहाँ पर रोग ,पराजय और अपमान देता है

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गुरु का गोचर प्रभाव-

प्रथम भाव में –इस भाव में धन नाश ,पदावनति , वृद्धि का नाश , विवाद ,स्थान परिवर्तन दिलाता हैं .                                                     द्वितीय भाव में – यहाँ पर धन व् विलासता भरा जीवन दिलाता है .
तृतीय भाव में – यहाँ पर काम में बाधा और स्थान परिवर्तन करता है .
चतुर्थ भाव में – यहाँ पर कलह , चिंता पीड़ा दिलाता है .
पंचम भाव – यहाँ पर गुरु शुभ होता है .पुत्र , वहां ,पशु सुख , घर ,स्त्री , सुंदर वस्त्र आभूषण , की प्राप्ति करवाता हैं .
छथा भाव में – यहाँ पर दुःख और पत्नी से अनबन होती है.
सप्तम भाव – सैय्या , रति सुख , धन , सुरुचि भोजन , उपहार , वहां .,वाणी , उत्तम वृद्धि करता हैं .
अष्टम भाव – यहाँ बंधन ,व्याधि , पीड़ा , ताप ,शोक , यात्रा कष्ट , मृत्युतुल्य परशानियाँ देता है .
नवम भाव में – कुशलता ,प्रमुख पद , पुत्र की सफलता , धन व् भूमि लाभ , स्त्री की प्राप्ति होती हंत .
दशम भाव में- स्थान परिवर्तन में हानि , रोग ,धन हानि
एकादश भाव – यहाँ सुभ होता हैं . धन ,आरोग्य और अच्छा स्थान दिलवाता है .
द्वादश भाव में – यहाँ पर मार्ग भ्रम पैदा करता है .

Gemstone Suggestion

गोचर शुक्र

प्रथम भाव में प्रभाव –जब शुक्र यहाँ पर अथोता है तब सुख ,आनंद ,वस्त्र , फूलो से प्यार , विलासी जीवन ,सुंदर स्थानों का भ्रमण ,सुगन्धित पदार्थ पसंद आते है .विवाहिक जीवन के लाभ प्राप्त होते हैं .
द्वीतीय भाव में – यहाँ पर शुक्र संतान , धन , धान्य , राज्य से लाभ , स्त्री के प्रति आकर्षण और परिवार के प्रति हितकारी काम करवाता हैं.
तृतीय भाव – इस जगह प्रभुता ,धन ,समागम ,सम्मान ,समृधि ,शास्त्र , वस्त्र का लाभ दिलवाता हैं .यहाँ पर नए स्थान की प्राप्ति और शत्रु का नास करवाता हैं .
चतुर्थ भाव –इस भाव में मित्र लाभ और शक्ति की प्राप्ति करवाता हैं .
पंचम भाव – इस भाव में गुरु से लाभ ,संतुष्ट जीवन , मित्र –पुत्र –धन की प्राप्ति करवाता है . इस भाव में शुक्र होने से भाई का लाभ भी मिलता है.
छठा भाव –इस भाव में शुक्र रोग , ज्वर ,और असम्मान दिलवाता है .
सप्तम भाव – इसमें सम्बन्धियों को नास्ता करवाता हैं .
अष्टम भाव – इस भाव में शुक्र भवन , परिवार सुख , स्त्री की प्राप्ति करवाता है .
नवम भाव- इसमें धर्म ,स्त्री ,धन की प्राप्ति होती हैं .आभूषण व् वस्त्र की प्राप्ति भी होती है .
दशम भाव – इसमें अपमान और कलह मिलती है.
एकादश भाव – इसमें मित्र ,धन ,अन्न ,प्रशाधन सामग्री मिलती है .
द्वादश भाव – इसमें धन के मार्ग बनते हिया परन्तु वस्त्र लाभ स्थायी नहीं होता हैं .

Signature Design

शनि की गोचर दशा

प्रथम भाव – इस भाव में अग्नि और विष का डर होता है. बंधुओ से विवाद , वियोग , परदेश गमन , उदासी ,शरीर को हानि , धन हानि ,पुत्र को हानि , फालतू घोमना आदि परेशानी आती है .
द्वितीय भाव – इस भाव में धन का नाश और रूप का सुख नाश की ओर जाता हैं .
तृतीय भाव – इस भाव में शनि शुभ होता है .धन ,परवर ,नौकर ,वहां ,पशु ,भवन ,सुख ,ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है .सभी शत्रु हार मान जाते हैं .
चतुर्थ भाव –इस भाव में मित्र ,धन ,पुत्र ,स्त्री से वियोग करवाता हैं .मन में गलत विचार बनने लगते हैं .जो हानि देते हैं .
पंचम भाव – इस भाव में शनि कलह करवाता है जिसके कारण स्त्री और पुत्र से हानि होती हैं .
छठा भाव – ये शनि का लाभकारी स्थान हैं. शत्रु व् रोग पराजित होते हैं .सांसारिक सुख मिलता है .
सप्तम भाव – कई यात्रायें करनी होती हैं . स्त्री – पुत्र से विमुक्त होना पड़ता हैं .
अष्टम भाव – इसमें कलह व् दूरियां पनपती हैं.
नवम भाव – यहाँ पर शनि बैर , बंधन ,हानि और हृदय रोग देता हैं .
दशम भाव – इस भाव में कार्य की प्राप्ति , रोज़गार , अर्थ हानि , विद्या व् यश में कमी आती हैं
एकादश भाव – इसमें परस्त्री व् परधन की प्राप्ति होई हैं .
द्वादश भाव – इसमें शोक व् शारीरिक परेशानी आती हैं .
शनि की २,१,१२ भावो के गोचर को साढ़ेसाती और ४ ,८ भावो के गोचर को ढ़ैया कहते हैं .

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शुभ दशा में गोचर का फल अधिक शुब होता हैं .अशुभ गोचर का फल परेशान करता हैं .इस उपाय द्वारा शांत करवाना चाहिए .अशुभ दस काल मेशुब फल कम मिलता हैं .अशुभ फल ज्यादा होता हैं .

पूजा कैसे करें – जब सूर्य और मंगल असुभ हो तो लाल फूल , लाल चन्दन ,केसर , रोली , सुगन्धित पदार्थ से पूजा करनी चाहिए . सूर्य को जलदान करना चाहिए .शुक्र की पूजा सफ़ेद फूल, व् इत्र के द्वारा दुर्गा जी की पूजा करनी चाहिए . शनि की पूजा काले फूल ,नीले फूल व् काली वस्तु का दान करके शनि देव की पूजा करनी चाहिए . गुरु हेतु पीले फूल से विष्णु देव की पूजा करनी चाहिए .बुध हेतु दूर्वा घास को गाय को खिलाएं .

गोचर फल

सभी ग्रह चलायमान हैं.सभी ग्रहों की अपनी रफ्तार है कोई ग्रह तेज चलने वाला है तो कोई मंद गति से चलता है.ग्रहों की इसी गति को गोचर कहते हैं .ग्रहों का गोचर ज्योतिषशास्त्र में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है.ग्रहों के गोचर के आधार पर ही ज्योतिष विधि से फल का विश्लेषण किया जाता है.प्रत्येक ग्रह जब जन्म राशि में पहुंचता है अथवा जन्म राशि से दूसरे, तीसरे, चौथे, पांचवें, छठे, सातवें, आठवें, नवें,दशवें, ग्यारहवें या बारहवें स्थान पर होता है तब अपने गुण और दोषों के अनुसार व्यक्ति पर प्रभाव डालता है .गोचर में ग्रहों का यह प्रभाव गोचर का फल कहलता है.शनि, राहु, केतु और गुरू धीमी गति वाले ग्रह हैं अत: यह व्यक्ति के जीवन पर बहुत अधिक प्रभाव डालते हैं इसलिए गोचर में इनके फल का विशेष महत्व होता है.अन्य ग्रह की गति तेज होती है अत: वे अधिक समय तक प्रभाव नहीं डालते हैं .

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सूर्य का गोचर फल: गोचर में सूर्य जब तृतीय, षष्टम, दशम और एकादश भाव में आता है तब यह शुभ फलदायी होता है.इन भावों में सूर्य का गोचरफल सुखदायी होता है.इन भावों में सूर्य के आने पर स्वास्थ्य अनुकूल होता है.मित्रों से सहयोग, शत्रु का पराभव एवं धन का लाभ होता है.इस स्थिति में संतान और जीवन साथी से सुख मिलता है साथ ही राजकीय क्षेत्र से भी शुभ परिणाम मिलते हैं.सूर्य जब प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, अष्टम, नवम एवं द्वादश में पहुंचता है तो मानसिक अशांति, अस्वस्थता, गृह कलह, मित्रों से अनबन रहती है.इन भावों में सूर्य का गोचर राजकीय पक्ष की भी हानि करता है.

चन्द्र का गोचर फल:
गोचर में चन्द्रमा जब प्रथम, तृतीय, षष्टम, सप्तम, दशम एवं एकादश में आता है तब यह शुभ फलदेने वाला होता है .इन भावों में चन्द्रमा के आने पर व्यक्ति को स्त्री सुख, नवीन वस्त्र, उत्तम भोजन प्राप्त होता है.चन्द्र का इन भावों में गोचर होने पर स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है.इन भावों को छोड़कर अन्य भावों में चन्द्रमा का गोचर अशुभ फलदायी होता है.मानसिक क्लेश, अस्वस्थता, स्त्री पीड़ा व कार्य बाधित होते हैं.

मंगल का गोचर फल:
मंगल को अशुभ ग्रह कहा गया है लेकिन जब यह तृतीय या षष्टम भाव से गोचर करता है तब शुभ फल देता है .इन भावों में मंगल का गोचर पराक्रम को बढ़ाता है, व शत्रुओं का पराभव करता है.यह धन लाभ, यश कीर्ति व आन्नद देता है.इन दो भावों को छोड़कर अन्य भावो में मंगल पीड़ा दायक होता है.तृतीय और षष्टम के अलावा अन्य भावों में जब यह गोचर करता है तब बल की हानि होती है, शत्रु प्रबल होंते हैं.अस्वस्थता, नौकरी एवं कारोबार में बाधा एवं अशांति का वातावरण बनता है.

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बुध का गोचर फल:
गोचर वश जब बुध द्वितीय, चतुर्थ, षष्टम अथवा एकादश में आता है तब बुध का गोचर फल व्यक्ति के लिए सुखदायी होता है इस गोचर में बुध पठन पाठन में रूचि जगाता है, अन्न-धन वस्त्र का लाभ देता है.कुटुम्ब जनों से मधुर सम्बन्ध एवं नये नये लोगों से मित्रता करवाता है.अन्य भावों में बुध का गोचर शुभफलदायी नहीं होता है.गोचर में अशुभ बुध स्त्री से वियोग, कुटुम्बियों से अनबन, स्वास्थ्य की हानि, आर्थिक नुकसान, कार्यों में बाधक होता है.

बृहस्पति का गोचर फल:
बृहस्पति को शुभ ग्रह कहा गया है.यह देवताओं का गुरू है और सात्विक एवं उत्तम फल देने वाला लेकिन गोचर में जब यह द्वितीय, पंचम, सप्तम, नवम, एकादश भाव में आता है तभी यह ग्रह व्यक्ति को शुभ फल देता है अन्य भावों में बृहस्पति का गोचर अशुभ प्रभाव देता है .उपरोक्त भावों में जब बृहस्पति गोचर करता है तब मान प्रतिष्ठा, धन, उन्नति, राजकीय पक्ष से लाभ एवं सुख देता है.इन भावों में बृहस्पति का गोचर शत्रुओं का पराभव करता है.कुटुम्बियों एवं मित्रों का सहयोग एवं पदोन्नति भी शुभ बृहस्पति देता है.उपरोक्त पांच भावों को छोड़कर अन्य भावों में जब बृहस्पति का गोचर होता है तब व्यक्ति को मानसिक पीड़ा, शत्रुओं से कष्ट, अस्वस्थता व धन की हानि होती है.गोचर में अशुभ होने पर बृहस्पति सम्बन्धों में कटुता, रोजी रोजगार मे उलझन और गृहस्थी में बाधक बनता है.

शुक्र का गोचर में फल:
आकाश मंडल में शुक्र सबसे चमकीला ग्रह है जो भोग विलास एवं सुख का कारक ग्रह माना जाता है.शुक्र जब प्रथम, द्वितीय, पंचम, अष्टम, नवम एवं एकादश भाव से गोचर करता है तब यह शुभ फलदायी होता है .इन भावों में शुक्र का गोचर होने पर व्यक्ति को भौतिक एवं शारीरिक सुख मिलता है.पत्नी एवं स्त्री पक्ष से लाभ मिलता है.आरोग्य सुख एवं अन्न-धन वस्त्र व आभूषण का लाभ देता है.हलांकि प्रथम भाव में जब यह गोचर करता है तब अपने गुण के अनुसार यह सभी प्रकार का लाभ देता है परंतु अत्यधिक भोग विलास की ओर व्यक्ति को प्रेरित करता है.अन्य भावों में शुक्र का गोचर अशुभ फलदायी होता है.गोचर में अशुभकारी शुक्र होने पर यह स्वास्थ्य एवं धन की हानि करता है.स्त्री से पीड़ा, जननेन्द्रिय सम्बन्धी रोग, शत्रु बाधा रोजी रोजगार में कठिनाईयां गोचर में अशुभ शुक्र का फल होता है.द्वादश भाव में जब शुक्र गोचर करता है तब अशुभ होते हुए भी कुछ शुभ फल दे जाता है

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शनि का गोचर फल:
शनि को अशुभ ग्रह कहा गया है.यह व्यक्ति को कष्ट और परेशानी देता है लेकिन जब यह गोचर में षष्टम या एकादश भाव में होता है तब शुभ फल देता है .नवम भाव में शनि का गोचर मिला जुला फल देता है.अन्य भावों में शनि का गोचर पीड़ादायक होता है.गोचर में शुभ शनि अन्न, धन और सुख देता, गृह सुख की प्राप्ति एवं शत्रुओं का पराभव भी शनि के गोचर में होता है.संतान से सुख एवं उच्चाधिकारियों से सहयोग भी शनि का शुभ गोचर प्रदान करता है.शनि का अशुभ गोचर मानसिक कष्ट, आर्थिक कष्ट, रोजी-रोजगार एवं कारोबार में बाधा सहित स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है.

राहु और केतु छाया ग्रह हैं जिन्हें शनि के समान ही अशुभकारी ग्रह माना गया है.ज्योतिषशास्त्र के अनुसार गोचर में राहु केतु उसी ग्रह का गोचर फल देते हैं जिस ग्रह के घर में जन्म के समय इनकी स्थिति होती है.तृतीय, षष्टम एवं एकादश भाव में इनका गोचर शुभ फलदायी होता है जो धन, सुख एवं
अष्टक वर्ग एवं गोचर
साधारणतया जन्मकालीन चंद्रमा से ग्रहों की गोचर स्थिति देखकर फलित की विधि है जैसे गोचरगत शनि जब चंद्रमा से तीसरे, छठे एवं ग्यारहवें स्थान पर होंगे तो शनि जातक को शुभफल देंगे परंतु प्रश्न यह उठता है कि शनि एक राशि में अढ़ाई वर्ष रहते हैं तो क्या पूरे अढ़ाई वर्ष शुभफल देंगेक् साथ ही यदि वह भाव जिसमें वह राशि स्थित है बलहीन है तो भी भाव संबंधी फलों की गुणवत्ता वही होगी जैसी तब कि जिस भाव से शनि गोचर कर रहे हैं, बली हैक् अथवा इस प्रकार कहें कि यदि संबंधित भाव में शुभ बिन्दुओं की संख्या कुछ भी हो बीस या चालीसक् तो क्या फल की शुभता वही होगीक् इन्हीं कारणों के कारण जो सामान्य रूप से गोचरफल पंचांग आदि में दिया रहता है, महान् विद्वानों के मत के अनुसार उसको गौण ही समझा जायेे। सूक्ष्म विचार के लिए अन्य विधियों में अष्टक वर्ग विधि सबसे श्रेष्ठ है। इस लेख में यह बताने का प्रयत्न किया जायेगा कि गोचरफल की न्यूनाधिक गणना किस प्रकार से की जायेक् पहले चर्चा कि जा चुकी है कि सात ग्रह व आठवाँ लग्न, इन सभी द्वारा शुभ-अशुभ बिन्दु देने की प्रणाली है। यदि सातों ग्रह व लग्न सभी एक-एक शुभ बिन्दु किसी भाव को प्रदान करते हैं तो कुल मिलाकर अधिकतम आठ शुभ बिन्दु किसी भाव को प्राप्त हो सकते हैं अर्थात् कोई अशुभ बिन्दु (अशुभ बिन्दु को कभी-कभी रेखा से भी दर्शाते हैं) नहीं अत: विचारणीय भाव संबंधी अधिकतम शुभफल प्राप्त होगा। यदि सात शुभ बिन्दु हैं तो शुभफल अधिकतम आठ का सातवां भाग होगा। इसी प्रकार क्रम से अनुपात के अनुसार शुभता को एक फल प्राçप्त के स्केल पर नाप सकते हैं व कितना प्राप्त होगा इसकी गणना कर सकते हैं। एक अन्य विधि फलित की है कि जन्मकालीन चंद्रमा या लग्न से गोचर का ग्रह उपचय स्थान में (3, 6, 10, 11वे) हो अथवा मित्र ग्रह हो अथवा स्वराशि में हो, उच्च का हो एवं उसमें चार से अधिक शुभ रेखायें हों तो शुभफल में और भी अधिकता आती है। इसके विपरीत यदि गोचर का विचाराधीन ग्रह चंद्रमा से या जन्मकालीन लग्न से उपचय स्थान (3, 6, 10, 11वें को छो़डकर सभी अन्य आठ स्थान) में हो तो उस राशि में शुभ बिन्दुओं की अधिकता भी हो तो भी अशुभ फल ही मिलता है। यदि उपचय स्थान में होकर ग्रह शत्रु क्षेत्री, नीच का अथवा अस्तंगत होवे व शुभ बिन्दु भी कम हों तो अशुभ फल की प्रबलता रहेगी। यह ग्रहों का गोचर हुआ जिसका विचार जन्मकालीन चंद्रमा अथवा जन्मकालीन लग्न से करना होता है। अब चंद्रमा के स्वयं के गोचर का विचार करें। चंद्रमा यदि उपचय स्थान में हों (अपनी जन्मकालीन स्थिति से) शुभ रेखा अधिक भी परंतु चंद्रमा स्वयं कमजोर हो (यहां गोचर में) तो फल अशुभ ही हो। लेकिन इस विधि में गोचर ग्रह का विचार ग्रह के राशि में विचरण के आधार पर करते हैं। प्रथम गोचर विधि में जो प्रश्न उठा था कि यदि शनि जैसे ग्रह का गोचर अध्ययन करना हो जो एक राशि में अढ़ाई वर्ष रहते हैं तो क्या इस ग्रह के फल शुभ या अशुभ अढ़ाई वर्ष रहेंगेक् यह प्रश्न इस विधि में उभरकर सामने आता है। अब अष्टक वर्ग आधार पर तीसरी विधि की चर्चा करते हैं। प्रत्येक राशि 300 की होती है। प्रत्येक राशि को आठ भागों में बांटते हैं। प्रत्येक भाग को “कक्ष्या” कहते हैं। जातक-पारिजात में दिए गए इस सिद्धात के अनुसार प्रत्येक कक्ष्या का स्वामी ग्रह होता है। जैसे सबसे बाहरी कक्ष्या का स्वामी ग्रह शनि, फिर क्रम में बृहस्पति, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध, चंद्रमा व लग्न – इस प्रकार आठ कक्ष्याओं के आठ स्वामी ग्रह हुए। यदि देखें तो इनका क्रम ग्रहों के सामान्य भू-मण्डल में परिक्रमा पथ पर आधारित है। पृथ्वी से सबसे दूर शनि फिर बृहस्पति आदि-आदि हैं। पृथ्वी को कक्ष्या पद्धति में जातक से दर्शाया है क्योंकि पृथ्वी पर प़डने वाले प्रभाव का अध्ययन किया जा रहा है। इस गोचर फलित की विधि का नाम प्रस्ताराष्टक विधि है। आगे बढ़ने से पहले प्रस्ताराष्टक वर्ग बनाने की विधि की चर्चा करते हैं। राशि व ग्रहों का एक संयुक्त चार्ट बनाते हैं। बांयें से दांयें बारह कोष्टक बनाते हैं, व आठ कोष्ठक ऊपर से नीचे। प्रत्येक कोष्ठक बांयें से दांयें एक राशि का द्योतक है व ऊपर से नीचे वाला एक ग्रह का। आठवाँ कोष्ठक लग्न का है। सही मायने में यह बृहस्पति का अष्टक वर्ग है बस ग्रह रखने का क्रम बदल गया है। यहां पर ग्रहों का क्रम (कक्ष्या) ग्रहों के वास्तविक परिभ्रमण के आधार पर रखा गया है। पृथ्वी से सबसे दूर व उसके बाद पृथ्वी से दूरी के क्रम में। जैसा कि ऊपर चर्चा कर चुके हैं कि एक राशि को आठ भाग मेे बांट लेते हैं तो प्रत्येक ग्रह का भाग 30/8 अर्थात् 3045″ हुआ अर्थात् मेष में शनि की कक्ष्या, राशि में 0-3045″ तक हुई। दूसरी कक्ष्या बृहस्पति की है जो 3045″ से 7030″ तक होगी आदि-आदि। अब यह देखना है कि बृहस्पति का गोचरफल जातक को कैसा होगाक् जून 2009 में बृहस्पति कुंभ राशि की पहली कक्ष्या में गोचर कर रहे हैं। यहाँ पर राशि स्वामी शनि प्रदत्त एक शुभ बिन्दु है अत: बृहस्पति का गोचर उपर्युक्त जातक को शुभफल देगा। इसी प्रकार बृहस्पति की कक्ष्या में कुंभ राशि को शुभ बिन्दु प्राप्त है अत: बृहस्पति के गोचर की शुभता का क्रम बृहस्पति को 3045″ से 7030″ कुंभ में गोचर करते समय जारी रहेगा। 7030″ से 11015″ तक मंगल की कक्ष्या है वहां भी मंगल द्वारा प्रदत्त एक शुभ बिन्दु है अत: कुंभ में 10030″ अंश तक गोचरगत बृहस्पति शुभफल देंगे। फिर चतुर्थ कक्ष्या में सूर्य द्वारा कोई शुभ बिन्दु कुंभ राशि को प्रदान नहीं किया गया है अत: शुभता का क्रम अचानक रूक जाएगा व गति विपरीत होती सी नजर आएगी पर इसके साथ पांचवीं कक्ष्या में फिर शुक्र द्वारा प्रदत्त शुभ बिन्दु है उसके उपरान्त बुध द्वारा शुभ बिन्दु है अत: बृहस्पति के 11015″ से 140 तक गोचर करते समय शुभ बिन्दु हैं अत: बृहस्पति के 11015″ से 140 तक गोचर करते समय शुभफल की गति धीमी होगी जो 140 पार करते-करते पुन: गति पक़ड लेगी। इसको यूं समझें कि कोई वाहन सामान्य गति से स़डक पर जा रहा है, सामने अवरोध आने पर स्पीड कम करनी प़डती है या रूकना भी प़डता है व उस अवरोध को पार कर पुन: स्पीड पक़ड लेते हैं। यहां यह बात भी ध्यान देने की है कि कुछ प्रतीक्षा करने से या तो गतिरोध हट जाता है, हम धैर्य से प्रतीक्षा करते हैं अथवा हम गतिरोध के दांयें-बांयें से ध्यान व समझदारी से निकल जाते हैं। वास्तव में यही स्थिति ग्रह के साथ है या तो हम सहनशीलता से धैर्य रखें, बुरा वक्त निकल जायेगा या फिर दायें-बांये से निकल जायें अर्थात् ग्रह का उपचार दान, जप आदि कर बाधाओं को पार कर जायें। अन्य ग्रहों का भी गोचर का विचार इसी विधि से करते हैं कौन ग्रह किस विषय का कारक है या किस भाव का स्वामी है उस भाव संबंधी विषयों के बारे में फलित करने हेतु ग्रह का चयन करते हैं। विचारणीय ग्रह के पथ में जो ग्रह शुभ बिन्दु प्रदान करते हैं व शुभ बिन्दु प्रदान करने वाले ग्रह से संबंधित विषय का (अर्थात् शुभ बिन्दु देने वाले ग्रह किस संबंध अथवा वस्तु को दर्शाते हैं) जातक को लाभ देने में सहायक होंगे। जैसे उपरोक्त उदाहरण में बृहस्पति कुंभ में गोचर करते समय शनि की कक्ष्या से गुजर रहे हैं, शनि ने यहां शुभ बिन्दु प्रदान किया है अत: इस समय बृहस्पति के गोचर को शुभफल प्रदान करने में नौकर-चाकर, निम्न जाति/श्रेणी के लोग, लोहे की वस्तुएं आदि जातक को लाभ देंगी। कुछ विद्वान राशि के स्थान पर भाव के आठ भाग कर कक्ष्या स्थापित करने की बात कहते हैं। यदि भाव का आधार ले तो भाव आरंभ संधि से भाव मध्य तक चार भाग व भाव-मध्य से भाव अंत तक चार भाग कर विचार करना होता है परंतु वर्तमान में व्यावहारिक रूप से राशि को आधार मानकर गणना करना ज्यादा उपयुक्त माना जाता है। ऎसी भी स्थिति हो सकती हैं कि जब गोचर में कई ग्रह एक ही कक्ष्या में आ जाएं व उस कक्ष्या को शुभ बिन्दु प्राप्त हो। इस स्थिति में शुभ फल उतना ही उत्तम होगा जितने ग्रह ज्यादा होंगे। अष्टक वर्ग में जब ग्रह गोचरवश ऎसी कक्ष्या से गुजर रहा है जहां शुभ बिन्दु हैं तो शुभफल, गोचर में चलने वाले ग्रह के कारकत्व के अनुसार होगा। दूसरे यह फल ग्रह के जीव मूल-धातु के अनुसार होगा। यह फल लग्न से (मूल कुण्डली से) गिनकर उस भाव के विषयों से संबंधित होगा जहां से ग्रह गुजर रहा है। आगे गोचर वाले ग्रह के शुभफल की गुणवत्ता इस पर भी आधारित होगी कि विचारणीय गोचरगत ग्रह कुण्डली की मूल स्थिति से कक्ष्या वाले ग्रह से किस भाव में गुजर रहा है जैसे यदि कक्ष्या ग्रह की मूल स्थिति से अशुभ स्थान (6, 8वें आदि) से गुजरें तो शुभफल की कमी होगी परंतु यदि शुभ स्थान जैसे पंचम-नवम से गुजरे तो फल की वृद्धि होगी। इसके साथ-साथ उस भाव से भी शुभ फल संबंधित होगा जो कि शुभ बिन्दु देने वाले ग्रह से (मूल जन्मपत्रिका में) गोचर वाले ग्रह का बनता है। जैसे उदाहरण कुण्डली में बृहस्पति, कुंभ राशि से गोचर कर रहे हैं व यह शनि की कक्ष्या है अत: फल बृहस्पति, शनि, कुंभ से संबंधित होगा। कुंभ पूर्णता का प्रतीक है व शनि, बृहस्पति धर्म, आध्यात्म, तप, संसार से अलग विषयों के प्रतीक भी हैं। अत: आध्यात्मिक विषयों में, सत्संग में समय लगेगा जो पूर्णता देने वाला होगा। बृहस्पति जीव के कारक हंै व शनि स्थायित्व के अत: अचल संपत्ति के सौन्दर्यकरण का लाभप्रद अवसर होगा। इस प्रकार तारतम्य से फलित करें लाभ मिलता है.इन भावों के अतिरिक्त जब अन्य भावों से राहु केतु गोचर करता है तब यह हानिप्रद होता है.

Prashna Kundli by Acharya Arya

क्या केवल गोचर से ही फलित कहा जा सकता है?
गोचर फलित का एक प्रभावशाली अंग होते हुए भी यह सब कुछ नहीं। हमारे महर्षियों ने यह स्पष्ट कहा है कि जो कुछ कुण्डली में नहीं वह गोचर नहीं दे सकता। गोचर में ग्रह चाहे कितना ही अच्छा योग बनाते हो यदि वह योग कुण्डली में नहीं तो वह गोचर नहीं दे सकता। उदाहरण गोचर तो दशा व अन्तर दशा के अधीन भी कार्य करता है। यदि दशा व अन्तर दशा ऐसे ग्रहों की चल रही हो तो जातक जो जातक के लिये अशुभ हो परन्तु गोचर शुभ हो तो गोचर का शुभ फल जातक को नहीं मिलता। क्योंकि गोचर में यह देखा जाता है कि जन्म कुण्डली की ग्रह स्थिति से वर्तमान गोचर कुण्डली में ग्रह स्थिति अच्छी या बुरी कैसी स्थिति में है। जो ग्रह जन्म कुण्डली में उत्तम स्थान में पड़ा हो वह गोचर में शुभ स्थान पर आते ही शुभ फल देगा। जो ग्रह जन्म कुण्डली में अशुभ हो वह यदि गोचर में शुभ भी होगा तो भी शुभ फल नहीं देगा। गोचर ग्रह जन्म के ग्रहों से जिस समय अंशात्मक या आसन्न योग करते हैं उस समय ही उनका ठीक फल प्रकट होता है। मान लो शुक्र वृष में 18 अंश पर है। गोचर में शुक्र जब वृष 18अंश से योग बनायेगा। तब ही शुक्र का अच्छा या बुरा फल प्रकट होगा। इस प्रकार गोचर ग्रह जन्म के ग्रह के अधीन हुआ। यदि गोचर का ग्रह अशुभ भाव में हो जन्म कुण्डली में वह ग्रह उच्च, स्वक्षेत्री हो तो गोचर में वह ग्रह अशुभ फल नहीं देता। अर्थात्‌ गोचर के नियमों के आधार पर हम कह सकते हैं कि गोचर का फल जन्म कुण्डली के ग्रह स्थिति पर निर्भर करता है। यदि गोचर के अन्य नियमों का अध्ययन करे तो हम पायेंगे कि गोचर दशा व अन्तर दशा के भी अधीन है। मूलतः गोचर विचार जन्मकुडली और गोचर कुण्डली दोनों पर निर्भर है। गोचर विचार करते समय ग्रहों की स्थिति का विचार सूर्य, चन्द्र एवं लग्न से करना चाहिए। यदि इनमें से जो सर्वाधिक बली हो तो उससे करना चाहिए। तीनों से ग्रहस्थिति का विचार करके व दशादि विचार कर समन्वय युक्त फल कहना चाहिए।

बुजुर्गों की सेवा… देव गुरु जीवन में शुभ फल देते है

दोस्तों आप सभी को एक बहुत ही सरल उपाय बता रहा हूँ ज्योतिष में गुरु को पितामह की उपाधि दी गई है ,और जिनके कुंडली में गुरु अशुभ हो वो सिर्फ धर्म स्थान और बुजुर्गों की सेवा करे गुरु कभी अशुभ फल नहीं देगा , ज्योतिष में बृहस्पति धनु और मीन राशी के स्वामी है और कर्क राशी में शुभ और मकर राशी में अशुभ फल देते है , गुरु के सूर्य, मंगल, चंद्र मित्र व शुक्र, बुध शत्रु तथा शनि, राहु, केतु सम हैं। कुण्डली में बृहस्पति से पंचम, सप्तम और नवम भावों पर इसकी पूर्ण दृष्टि होती है , देव गुरु बृहस्पति कर्क, धनु, मीन राशियों तथा केंद्र 1,4,7,10 या त्रिकोण 5,9 भावों में स्थित होने पर शुभ फल देने वाला और योगकारक कहा गया है .बृहस्पति का राशि फल :- जन्म कुंडली में गुरु का मेषादि राशियों में स्थित होने का फल इस प्रकार है :- मेष में – गुरु हो तो जातक तर्क वितर्क करने वाला , किसी से न दबने वाला ,सात्विक,धनी,कार्य क्षेत्र में विख्यात,क्षमाशील ,पुत्रवान,बलवान, प्रतिभाशाली,तेजस्वी,अधिक शत्रु वाला,बहु व्ययी ,दंडनायक व तीक्ष्ण स्वभाव का होता है | वृष में गुरु हो तो जातक वस्त्र अलंकार प्रेमी ,विशाल देह वाला ,देव –ब्राह्मण –गौ भक्त, प्रचारक ,सौभाग्यशाली,अपनी स्त्री में ही आसक्त ,सुन्दर कृषि व गौ धन युक्त, वैद्यक क्रिया में कुशल ,मनोहर वाणी-बुद्धि व गुणों से युक्त ,विनम्र तथा नीतिकुशल होता है मिथुन में गुरु हो तो जातक ,विज्ञान विशारद ,बुद्धिमान,सुनयनी,वक्ता,सरल,निपुण,धर्मात्मा ,मान्य ,गुरुजनों व बंधुओं से सत्कृत होता है | कर्क में गुरु हो तो जातक विद्वान,सुरूप देह युक्त ,ज्ञानवान ,धार्मिक, सत्य स्वभाव वाला,यशस्वी ,अन्न संग्रही ,कोषाध्यक्ष,स्थिर पुत्र वाला,संसार में पूज्य ,विशिष्ट कर्मा तथा मित्रों में आसक्त होता है | सिंह में गुरु हो तो जातक स्थिर शत्रुता वाला ,धीर ,विद्वान,शिष्ट परिजनों से युक्त,राजा या उसके तुल्य,पुरुषार्थी,सभा में लक्ष्य ,क्रोध से समस्त शत्रुओं को जीतने वाला ,सुदृढ़ शरीर का ,वन-पर्वत आदि के भ्रमण में रूचि रखने वाला होता है | कन्या में गुरु हो तो जातक मेधावी, धार्मिक ,कार्यकुशल ,गंध –पुष्प-वस्त्र प्रेमी ,कार्यों में स्थिर, शास्त्रज्ञान व शिल्प कार्य से धनी दानी ,सुशील चतुर ,अनेक भाषाओं का ज्ञाता तथा धनी होता है | तुला मे गुरु हो तो जातक मेधावी ,पुत्रवान,विदेश भ्रमण से धनी विनीत ,आभूषण प्रिय ,नृत्य व नाटक से धन संग्रह करने वाला ,सुन्दर ,अपने सह व्यापारियों में बड़ा,पंडित,देव अतिथि का पूजन करने वाला होता है | वृश्चिक में गुरु हो तो जातक अधिक शास्त्रों में चतुर , क्षमाशील, नृपति, ग्रंथों का भाष्य करने वाला ,निपुण ,देव मंदिर व नगर में कार्य करने वाला , सद्स्त्रीवान,अल्प पुत्र वाला ,रोग से पीड़ित ,अधिक श्रम करने वाला ,क्रोधी, धर्म में पाखण्ड करने वाला व निंद्य आचरण वाला होता है | धनु में गुरु हो तो जातक आचार्य ,स्थिर धनी ,दाता , मित्रों का शुभ करने वाला ,परोपकारी ,शास्त्र में तत्पर ,मंत्री या सचिव ,अनेक देशों का भ्रमण करने वाला तथा तीर्थ सेवन में रूचि रखने वाला होता है |मकर में गुरु हो तो जातक अल्प बलि ,अधिक मेहनत करने वाला ,क्लेश धारक,नीच आचरण करने वाला ,मूर्ख ,निर्धन , दूसरों की नौकरी करने वाला , दया –धर्म –प्रेम –पवित्रता –स्व बन्धु व मंगल से रहित ,दुर्बल देह वाला ,डरपोक,प्रवासी,व विषाद युक्त होता है | कुम्भ में गुरु हो तो जातक चुगलखोर ,असाधु ,निंद्य कार्यों में तत्पर ,नीच जन सेवी ,पापी,लोभी ,रोगी ,अपने वचनों के दोष से अपने धन का नाशक ,बुद्धिहीन व गुरु की स्त्री में आसक्त होता है | मीन में गुरु हो तो जातक वेदार्थ शास्त्र वेत्ता ,मित्र व सज्जनों द्वारा पूजनीय ,राज मंत्री ,प्रशंसा प्राप्त करने वाला ,धनी ,निडर ,गर्वीला, स्थिर कार्यारम्भ करने वाला ,शांतिप्रिय ,विख्यात ,नीति व व्यवहार को जानने वाला होता है | (गुरु पर किसी अन्य ग्रह कि युति या दृष्टि के प्रभाव से उपरोक्त राशि फल में परिवर्तन भी संभव है| ) गुरु का सामान्य दशा फल जन्म कुंडली में गुरु स्व ,मित्र ,उच्च राशि -नवांश का ,शुभ भावाधिपति ,षड्बली ,शुभ युक्त -दृष्ट हो तो गुरु की शुभ दशा में,यश प्राप्ति,वाणी में प्रभाव व अधिकार, बुध्धि कि प्रखरता,विद्या लाभ,परीक्षाओं में सफलता,सुख-सौभाग्य ,राज कृपा ,मनोरथ सिध्धि ,दान पुण्य –तीर्थ भ्रमण आदि धार्मिक कार्यों में रूचि ,प्रभुत्व प्राप्ति, विवाह ,संतान सुख , स्वर्ण आभूषण की प्राप्ति ,सत्संग सात्विक गुणों की वृद्धि,मिष्टान भोजन की प्राप्ति ,व्यापार में लाभ ,स्वाध्याय में रूचि,पद प्राप्ति व पदोन्नति होती है | अध्यापन ,न्याय सेवा ,बैंकिंग ,प्रबंधन व धार्मिक प्रवचनों से सम्बंधित क्षेत्रों में सफलता मिलती है |राजनीतिक व प्रशासनिक पद की प्राप्ति होती है |ईशान दिशा से लाभ होता है | शहद ,तगर ,जटामांसी ,मोम , घी व पीले रंग के पदार्थों के व्यापार में लाभ होता है | जिस भाव का स्वामी गुरु होता है उस भाव से विचारित कार्यों व पदार्थों में सफलता व लाभ होता है | यदि गुरु अस्त ,नीच शत्रु राशि नवांश का ,षड्बल विहीन ,अशुभभावाधिपति पाप युक्त दृष्ट हो तो गुरु दशा में शरीर में सूजन ,शोक ,कर्ण रोग ,गठिया ,राजा से भय ,स्थान हानि ,अपवित्रता ,विद्या प्राप्ति में बाधा ,स्मरणशक्ति में कमी ,गुरु जनों व ब्राह्मणों से द्वेष ,गुरु के कारकत्व वाले पदार्थों से हानि ,संतान प्राप्ति में बाधा या कष्ट ,मान हानि ,संचित धन की हानि होती है | जिस भाव का स्वामी गुरु होता है उस भाव से विचारित कार्यों व पदार्थों में असफलता व हानि होती है | गोचर में बृहस्पति जन्म या नाम राशि से 2,5,7,9, व 11 वें स्थान पर गुरु शुभ फल देता है |शेष स्थानों पर गुरु का भ्रमण अशुभ कारक होता है | जन्मकालीन चन्द्र से प्रथम स्थान पर गुरु का गोचर मान हानि ,व्यवसाय में बाधा,राजभय ,मानसिक व्यथा ,कार्यों में विलम्ब,सुख में कमी तथा भारी व्यय से आर्थिक स्थिति को कमजोर करता है | दूसरे स्थान पर गुरु का गोचर धन लाभ ,परिवार में सुख समृद्धि, विवाह ,संतान प्राप्ति , शत्रु को हानि ,दान व परोपकार में रूचि ,चल संपत्ति में वृद्धि करता है | तीसरे स्थान पर गुरु का गोचर शरीर पीड़ा ,सम्बन्धियों से झगडा ,राज्य से भय ,मित्र का अनिष्ट ,यात्रा में हानि तथा व्यवसाय में बाधा देता है | चौथे स्थान पर गुरु का गोचर मानसिक अशांति ,शत्रु से कष्ट, जमीन जायदाद की हानि ,माता को कष्ट तथा स्थान परिवर्तन करता है | पांचवें स्थान पर गुरु का गोचर शिक्षा में सफलता ,संतान सुख ,पद लाभ ,पदोन्नति ,हर काम में सफलता ,सट्टे या शेयर मार्किट में लाभ प्रदान करता है | छ्टे स्थान पर गुरु का गोचर रोग ,राज्य से विरोध,संतान से कष्ट ,दुर्घटना का भय तथा विवाद से हानि करता है | सातवें स्थान पर गुरु के गोचर से विवाह एवम दाम्पत्य सुख की प्राप्ति , आरोग्यता , दान पुण्य व तीर्थ यात्रा में रूचि ,व्यवसाय व्यापार में लाभ तथा यात्रा में लाभ होता है | आठवें स्थान पर गुरु के गोचर से रोग,बंधन ,चोर या राज्य से कष्ट ,धन हानि ,संतान को कष्ट तथा कफ विकार होता है | नवें स्थान पर गुरु के गोचर से भाग्य वृद्धि ,धार्मिक यात्रा ,संतान सुख ,यश मान की प्राप्ति ,सफलता .आर्थिक लाभ तथा आध्यात्मिक विचारों का श्रवण होता है | दसवें स्थान पर गुरु के गोचर से मान हानि ,दीनता ,व्यवसाय में बाधा व धन हानि होती है | ग्यारहवें स्थान पर गुरु के गोचर से धन व प्रतिष्ठा की वृद्धि ,विवाह,संतान सुख ,पद लाभ व पदोन्नति ,व्यापार में लाभ ,वाहन सुख ,भोग विलास के साधनों की वृद्धि व सभी कार्यों में सफलता मिलती है | बारहवें स्थान पर गुरु के गोचर से आर्थिक हानि ,व्यय में वृद्धि ,अस्वस्थता ,संतान कष्ट , मिथ्या आरोप लगने का भय होता है | ( गोचर में गुरु के उच्च ,स्व मित्र,शत्रु नीच आदि राशियों में स्थित होने पर , अन्य ग्रहों से युति ,दृष्टि के प्रभाव से , अष्टकवर्ग फल से या वेध स्थान पर शुभाशुभ ग्रह होने पर उपरोक्त गोचर फल में परिवर्तन संभव है | कुंडली में गुरु के अशुभ के लक्षण : – सिर पर चोटी के स्थान से बाल उड़ जाते हैं। गले में व्यक्ति माला पहनने की आदत डाल लेता है। सोना खो जाए या चोरी हो जाए। बिना कारण शिक्षा रुक जाए। व्यक्ति के संबंध में व्यर्थ की अफवाहें उड़ाई जाती हैं। आंखों में तकलीफ होना, मकान और मशीनों की खराबी, अनावश्यक दुश्मन पैदा होना, धोखा होना, सांप के सपने। सांस या फेफड़े की बीमारी, गले में दर्द। 2, 5, 9, 12वें भाव में बृहस्पति के शत्रु ग्रह हों या शत्रु ग्रह उसके साथ हों तो बृहस्पति मंदा होता है। जनम कुंडली में गुरु अस्त ,नीच या शत्रु राशि का ,छटे -आठवें -बारहवें भाव में स्थित हो ,पाप ग्रहों से युत या दृष्ट, षड्बल विहीन हो तो ऊँचाई से पतन , शरीर में चर्बी की वृद्धि ,कफ विकार ,मूर्च्छा ,हर्निया,कान के रोग ,स्मृति विकार , जिगर के रोग ,मानसिक तनाव , रक्त धमनी से सम्बंधित रोग करता है |शुभ के लक्षण:- व्यक्ति कभी झूठ नहीं बोलता। उनकी सच्चाई के लिए वह प्रसिद्ध होता है। आंखों में चमक और चेहरे पर तेज होता है। अपने ज्ञान के बल पर दुनिया को झुकाने की ताकत रखने वाले ऐसे व्यक्ति के प्रशंसक और हितैषी बहुत होते हैं। यदि बृहस्पति उसकी उच्च राशि के अलावा 2, 5, 9, 12 में हो तो शुभ। बृहस्पति शान्ति के उपाय जन्मकालीन गुरु निर्बल होने के कारण अशुभ फल देने वाला हो तो निम्नलिखित उपाय करने से बलवान हो कर शुभ फल दायक हो जाता है |

Signature Design

रत्न धारण – पीत रंग का पुखराज सोने या चांदी की अंगूठी मेंपुनर्वसु ,विशाखा ,पूर्व भाद्रपद नक्षत्रों में जड़वा कर गुरुवार को सूर्योदय के बाद पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की तर्जनी अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सःगुरुवे नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप , पीले पुष्प, हल्दी ,अक्षत आदि से पूजन कर लें |पुखराज की सामर्थ्य न हो तो उपरत्न सुनैला या पीला जरकन भी धारण कर सकते हैं | केले की जड़ गुरु पुष्य योग में धारण करें | दान व्रत ,जाप – गुरूवार के नमक रहित व्रत रखें , ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सःगुरुवे नमः मन्त्र का १९००० की संख्या में जाप करें | गुरूवार को घी, हल्दी, चने की दाल ,बेसन पपीता ,पीत रंग का वस्त्र ,स्वर्ण, इत्यादि का दान करें | फलदार पेड़ सार्वजनिक स्थल पर लगाने से या ब्राह्मण विद्यार्थी को भोजन करा कर दक्षिणा देने से भी बृहस्पति प्रसन्न हो कर शुभ फल देते हैं |

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इनकी शान्ति के लिये वैदिक मन्त्र- ‘ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्॥’,पौराणिक मन्त्र :- ‘देवानां च ऋषीणां च गुरुं कांचनसंनिभम्। बुद्धिभूतं
त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्॥’

बीज मन्त्र-’ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:।

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राजनीति में सफलता के योग https://www.astrologyofmylife.com/yog-of-success-in-politics/ https://www.astrologyofmylife.com/yog-of-success-in-politics/#respond Fri, 02 Aug 2019 07:17:34 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=5584 राजनीति में सफलता के योग नीतिकारक ग्रह राहु, सत्ता का कारक सूर्य, न्याय-प्रिय ग्रह गुरु, जनता का हितैषी शनि और नेतृत्व का कारक मंगल जब राज्य-सत्ता के कारक दशम भाव, दशम से दशम सप्तम भाव, जनता की सेवा के छठे भाव, लाभ एवं भाग्य स्थान से शुभ संबंध बनाए तो व्यक्ति सफल राजनीतिज्ञ बनता है। …
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राजनीति में सफलता के योग

नीतिकारक ग्रह राहु, सत्ता का कारक सूर्य, न्याय-प्रिय ग्रह गुरु, जनता का हितैषी शनि और नेतृत्व का कारक मंगल जब राज्य-सत्ता के कारक दशम भाव, दशम से दशम सप्तम भाव, जनता की सेवा के छठे भाव, लाभ एवं भाग्य स्थान से शुभ संबंध बनाए तो व्यक्ति सफल राजनीतिज्ञ बनता है। व्यक्ति सफल राजनीतिज्ञ बनेगा या नहीं इसका बहुत कुछ उसके जन्मकालिक ग्रहों की स्थिति पर निर्भर करता है। अन्य व्यवसायों एवं करियर की भांति ही राजनीति में प्रवेश करने वालों की कुंडली में भी ज्योतिषीय योग होते हैं।

राहु:-राजनीति में राहु का महत्वपूर्ण स्थान है। राहु को सभी ग्रहों में नीतिकारक ग्रह का दर्जा दिया गया है। इसका प्रभाव राजनीति के घर से होना चाहिए। राहु के शुभ प्रभाव से ही नीतियों के निर्माण व उन्हें लागू करने की क्षमता व्यक्ति विशेष में आती है। राजनीति के घर (दशमभाव) से राहु का संबंध बने तो राजनेता में स्थिति के अनुसार बात करने की योग्यता आती है। सफल राजनेताओं की कुंडली में राहु का संबंध छठे, सातवें, दशमें व ग्यारहवें भाव से देखा गया है। छठे भाव को सेवा का भाव कहते हैं। व्यक्ति में सेवा भाव होने के लिए इस भाव से दशम या दशमेश का संबंध होना चाहिए। सातवां भाव दशम से दशम है इसलिए इसे विशेष रूप से देखा जाता है।

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सूर्य:- राजनीति के क्षेत्र में सफलता के लिए सूर्य ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रह है क्योंकि सूर्य को ही सरकार और सत्ता का कारक माना गया है इसके अलावा शासन की कुशलता, प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा, इच्छाशक्ति और यश का कारक भी सूर्य ही होता है और राजनीति में आगे बढ़ने के लिए प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा का होना बहुत आवश्यक है इसलिए भी राजनीति में सफलता पाने के लिए कुण्डली में सूर्य का बलि होना आवश्यक है।

शनि:- शनि को जनता और जनता से मिलने वाला सपोर्ट का कारक माना गया है और सक्रीय राजनीति में सफल होने के लिए जनता के साथ मिलना बहुत आवश्यक है अतः कुण्डली में बलवान शनि जनता का सहयोग दिलाकर व्यक्ति को सफल राजनेता बनाता है।

चतुर्थ-भाव- कुण्डली का चौथा भाव भी जनता का कारक है अतः राजनीति में सफलता के लिए कुण्डली के चतुर्थ भाव और चतुर्थेश का बलि होना भी बहुत आवश्यक है।

षष्ठ और तृतीय भाव- कुण्डली का छठा और तीसरा भाव प्रतिस्पर्धा की क्षमता और विरोधियों पर विजय को दर्शाता है अतः कुण्डली में इन दोनों भावों का बलि होना भी राजनीति में सहायक होता है तथा विरोधियों पर विजय दिलाकर प्रतिस्पर्धा में आगे रखता है।

Horoscope

दशम भाव-जन्म कुंडली के दशमें घर को राजनीति का घर कहते हैं। सत्ता में भाग लेने के लिए दशमेश और दशम भाव का मजबूत स्थिति में होना आवष्यक है। दशम भाव में उच्च, मूल त्रिकोण या स्वराशिस्थ ग्रह के बैठने से व्यक्ति को राजनीति के क्षेत्र में बल मिलता है। गुरु नवम भाव में शुभ प्रभाव में स्थित हो और दशम घर या दशमेश का संबंध सप्तम भाव से हो तो व्यक्ति राजनीति में सफलता प्राप्त करता है। सूर्य राज्य का कारक ग्रह है अत: यह दशम भाव में स्वराशि या उच्च राशि में होकर स्थित हो और राहु छठे, दशवें व ग्यारहवें भाव से संबंध बनाए तो राजनीति में सफलता की प्रबल संभावना बनती है। इस योग में वाणी के कारक (द्वितीय भाव के स्वामी) ग्रह का प्रभाव आने से व्यक्ति अच्छा वक्ता बनता है।

शनि दशम भाव में हो या दशमेश से संबंध बनाए और इसी दशम भाव में मंगल भी स्थित हो तो व्यक्ति समाज के लोगों के हितों के लिए राजनीति में आता है। यहां शनि जनता का हितैषी हैऔर मंगल व्यक्ति में नेतृत्व का गुण दे रहा है। दोनों का संबंध व्यक्ति को राजनेता बनने के गुण प्रदान करेगा। सूर्य और राहु के अमात्यकारक बनने से व्यक्ति रुचि होने पर राजनीति के क्षेत्र में सफलता पाने की संभावना रखता है और समाज में मान सम्मान तथा उच्च पद की प्राप्ति होती है। जन्मकुंडली, नवमांश तथा दशमांश तीनों कुंडलियों में समान तथा योग व्यक्ति को राजनीति में ऊंचाइयों पर ले जाते हैं।

Varshphal Report

राजनैतिक सफलता के कुछ विशेष योग:-

1. यदि सूर्य स्वराशि या उच्च राशि के सिंह, मेष में होकर केन्द्र, त्रिकोण आदि शुभ भावों में बैठा हो तो राजनीति में सफलता मिलती हैं। उदाहरण के तौर पर समझिये आपकी मेष लग्न की कुण्डली है तो 5th हाउस में सिंह राशि में सूर्य स्वग्रह होकर स्थित होंगे एवं 5th हाउस कुण्डली का त्रिकोण भाव होता हैं तब यह योग बनता है। और ऐसे व्यक्तियों को राजनीति में सफलता प्राप्त होती है।
2. सूर्य 10th हाउस में हो या 10th हाउस पर सूर्य की दृष्टि हो तो राजनीति में सफलता मिलती है। उदाहरण के तौर पर समझिये आपकी मिथुन लग्न की कुण्डली है तो 10th हाउस में मीन राशि में सूर्य स्थित हो या सूर्य 4th हाउस कन्या राशि में स्थित होेकर 10th हाउस पर पूर्ण दृष्टि होती है तब यह योग बनता है। और ऐसे व्यक्तियों को राजनीति में सफलता प्राप्त होती है।
3. सूर्य यदि मित्र राशि में शुभ भाव में हो और अन्य किसी प्रकार पीड़ित ना हो तो भी राजनैतिक सफलता मिलती है। उदाहरण के तौर पर समझिये आपकी कर्क लग्न की कुण्डली है तो सूर्य 10th हाउस में मेष राशि में मित्रराशिस्थ होकर शुभ भाव मे होगा। तब यह योग बनता है। और ऐसे व्यक्तियों को राजनीति में सफलता प्राप्त होती है।
4. शनि यदि स्वराशि या उच्च राशि मकर, कुंभ, तुला में होकर केन्द्र त्रिकोण आदि शुभ स्थानों में बैठा हो तो राजनीति में अच्छी सफलता मिलती है। उदाहरण के तौर पर समझिये आपकी वृषभ लग्न की कुण्डली है तो शनि 9th हाउस में मकर राशि में स्वग्रही होकर स्थित होंगे जो कि त्रिकोण भाव है या फिर शनि 10th हाउस में कुंभ राशि में स्वग्रही होकर स्थित होंगे जो कि केन्द्र भाव है। तब यह योग बनता है। और ऐसे व्यक्तियों को राजनीति में सफलता प्राप्त होती है।
5. यदि चतुर्थेश चैथे भाव में बैठा या चतुर्थेश की चतुर्थ भाव पर दृष्टि हो तो ऐसे व्यक्ति को विशेष जनसमर्थन मिलता है। उदाहरण के तौर पर समझिये आपकी सिंह लग्न की कुण्डली है तो 4th हाउस के लाॅर्ड मंगल 4th हाउस में स्वग्रही होकर स्थित होंगे जोकि त्रिकोण भाव है या फिर 4th हाउस के लाॅर्ड मंगल 10th हाउस में स्थित होकर 4th हाउस पर दृष्टि हो तब यह योग बनता है। और ऐसे व्यक्तियों को राजनीति में सफलता प्राप्त होती है।

Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya

6. 4th हाउस के लाॅर्ड का स्वगृही या उच्च राशि में होकर शुभ स्थान में होना भी राजनैतिक सफलता में सहायक होता है। उदाहरण के तौर पर समझिये आपकी कर्क लग्न की कुण्डली है तो 4th हाउस के लाॅर्ड शुक्र 9th हाउस में मीन राशि में उच्च के होकर विराजमान हो तब यह योग बनता है। और ऐसे व्यक्तियों को राजनीति में सफलता प्राप्त होती है।
7. दशमेश और चतुर्थेश का योग हो तो दशमेश चतुर्थ भाव में और चतुर्थेश दशम भाव में हो तो ये भी राजनीति में सफलता दिलाता है। उदाहरण के तौर पर समझिये आपकी कुंभ लग्न की कुण्डली है तो 10th हाउस के लाॅर्ड मंगल 4th हाउस में वृषभ राशि में विराजमान हो तथा 4th हाउस के लाॅर्ड शुक्र 10th हाउस में विराजमान हो तब यह योग बनता है। और ऐसे व्यक्तियों को राजनीति में सफलता प्राप्त होती है।
8. सूर्य और बृहस्पति का योग केन्द्र, त्रिकोण में बना हो तो ये भी राजनैतिक सफलता दिलाता हैं। उदाहरण के तौर पर समझिये आपकी धनु लग्न की कुण्डली है तो सूर्य 5th हाउस में मेष राशि में त्रिकोण में स्थित हो और देवगुरु बृहस्पति 10th हाउस में केन्द्र में स्थित हो तब यह योग बनता है। और ऐसे व्यक्तियों को राजनीति में सफलता प्राप्त होती है।
9. कर्क लग्न में पैदा होने वाला अधिकतर व्यक्ति नेतृत्व गुणों से संपन्न होता है। भारत के अधिकतर शासक इस लग्न या राशि के है। उनमें मुख्य हैं- पं. जवाहरलाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी, इन्द्र कुमार गुजराल, श्रीमती सोनिया गांधी, एच डी देवेगौड़ा, डाॅ. मनमोहन सिंह आदि।
10. बृहस्पति यदि बलि होकर लग्न में बैठा हो तो राजनैतिक सफलता दिलाता है।

Career Report : One Year

उपाय:- राजनीति से जुड़ें या राजनीति में जाने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को सूर्य की उपासना अवश्य करनी चाहिए।

1. आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें।
2. सूर्यदेव को तांबे के कलश में कुंकुंम एवं गुड़ मिलाकर जल अर्पित करें।
3. ऊँ घृणि सूर्याय नमः का जाप करें।

Name Check & Suggestion by Numerology

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वकील बनने के योग https://www.astrologyofmylife.com/yog-to-become-a-lawyer/ https://www.astrologyofmylife.com/yog-to-become-a-lawyer/#respond Wed, 31 Jul 2019 07:23:27 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=5482 ज्योतिषीय विश्लेषण के लिए हमारे शास्त्रों मे कई सूत्र दिए हैं। कुछ प्रमुख सूत्र इस प्रकार से हैं। बुध ही बुद्धि तथा वाणी का स्वामी है। मंगल: जोश, उत्साह, उत्तेजना, पराक्रम, इच्छा, तर्क शक्ति, शत्रु पर विजय, दृढ़ निश्चय, कोर्ट कचहरी के विवादों को निपटाने की शक्ति। शनि: अत्यधिक परिश्रम, धैर्य, सही वक्त के इंतजार …
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ज्योतिषीय विश्लेषण के लिए हमारे शास्त्रों मे कई सूत्र दिए हैं।
कुछ प्रमुख सूत्र इस प्रकार से हैं।
बुध ही बुद्धि तथा वाणी का स्वामी है।
मंगल: जोश, उत्साह, उत्तेजना, पराक्रम, इच्छा, तर्क शक्ति, शत्रु पर विजय, दृढ़ निश्चय, कोर्ट कचहरी के विवादों को निपटाने की शक्ति।
शनि: अत्यधिक परिश्रम, धैर्य, सही वक्त के इंतजार का कारक है।

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गुरू :हाइ कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के वकील या जज ।
राहु: चतुरता,
एडवोकेट के लिए पाठ्यक्रम श.बु.रा.मं..
मंगल+बुध+गुरू – वकील।
मंगल+गुरु +सूर्य – कानून विभाग, ।
बुध+गुरू – वकील,।
गुरु व बुध ग्रह :वकील बनने के लिए मानसिक ऊर्जा, तीव्र बुद्धि, शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता, वाक्पटुता के कारक गुरु व बुध ग्रह को देखा जाता है।गुरु ग्रह को न्याय का कारक है। करता गुरु ग्रह से प्रभाव से जातक न्यायाधीषादि जैसे उच्च पदों को प्राप्त करता है।
शनि को मजिस्ट्रेट या दण्डाधिकारी माना जाता है
गुरु, बुध व शनि :ग्रह और भाव बली होना चाहिए

Horoscope

शुक्र : धनी एवं सफल वकील ।
राहु ग्रह : झूठे बयान ,कूटनीतिपूर्ण व्यवहार,का कारक होता है।
मंगल ग्रह :साहसी होना चाहिए।
छठे भाव : कोर्ट-कचहरी, कानून व मुकद्दमे ।
नवम् भाव : न्याय का विचार।
द्वितीय भाव : वाक्पटुता,
पंचम भाव से बुद्धि।
दषम भाव से व्यवसाय ।
ग्रह :बुध, गुरु , मंगल ,शनि, राहु।
भाव : दूसरा, छठा, दशम, पंचम , एकादश,
द्वितीय, पंचम, षष्ठ, नवम भाव एकादश और इनके स्वामी व कारक का सम्बन्ध दषम भाव से होना चाहिए।
डी 9 ,डी १० चार्ट मे भी देखना चाहिए ।
गुरु:ज्ञान के कारक , गुरु धन तथा परामर्श

Varshphal Report

मंगल :साहस व प्रतियोगिता के कारक
दूसरा भाव :अर्थ व धन।
छठा भाव :प्रतियोगिता ,कानून।
दशम भाव :कर्म स्थान,
चतुर्थ ,पंचम भाव :शिक्षा :सलाह।
शनि का प्रभाव भी पंचम भाव/पंचमेश पर अच्छा समझा जाता है.

Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya

गुरु :पंचम ,चतुर्थ, , सप्तम, दशम ,द्वितीय भाव में हो।
पंचमेश, बुध, गुरु व राहु भी बली होना चाहिए।
बुध और राहु का परस्पर संबंध हो ,पंचम और पंचमेश से संबंध ।
लग्नेश :पंचम भाव ,पंचमेश भी पंचम, या लग्न से संबंध बनाता हो।
पंचमेश बलवान : संबंध गुरु, बुध, राहु तथा लग्नेश से हो।
ग्रह :दूसरे, पंचम तथा एकादश भावों से संबध।

Life Prediction

 

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Jyotish Suggestions https://www.astrologyofmylife.com/jyotish-suggestions/ https://www.astrologyofmylife.com/jyotish-suggestions/#respond Sat, 06 Jul 2019 07:17:41 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=4853 ज्योतिषीय सलाह– 1.किसी की इस्तेमाल की गई वस्तु न लें। 2.उपयोग किये गए इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं तो भूलकर भी न लें। Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya 3.दूसरे के बिस्तर पर न लेटें न सोएं।सबके घर निमंत्रण में भोजन न करें।यदि वह व्यक्ति तामसी,अपराधी,चोर,और चरित्रहीन है,तो उसके यहां कदापि भोजन ग्रहण न करें।अन्यथा आप भी भागीदार …
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ज्योतिषीय सलाह–


1.किसी की इस्तेमाल की गई वस्तु न लें।


2.उपयोग किये गए इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं तो भूलकर भी न लें।

Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya

3.दूसरे के बिस्तर पर न लेटें न सोएं।सबके घर निमंत्रण में भोजन न करें।यदि वह व्यक्ति तामसी,अपराधी,चोर,और चरित्रहीन है,तो उसके यहां कदापि भोजन ग्रहण न करें।अन्यथा आप भी भागीदार हो जाएंगे।इसमे कोई संशयः नही है।


4.केशर,हल्दी,रुमाल,अपने भाग्येश ग्रह के रंग की वस्तुएं दूसरों को न दें।

5.कभी किसी के हाँथ से नमक, कोयला,काली मिर्च,चमड़ा, और लोहा कभी न ले,अन्यथा आप उसके सारे संकट अपने पर ले लेंगे।

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6.घर का कबाड़ कभी बेंचे नही,मुफ्त में दे दें,अन्यथा दरिद्रता आपके घर से कभी नही जाएगी।लोग अक्सर यह गलती करते हैं।


7.तामसिक,राजसिक,अपराधी,व्यक्ति का साथ कभी न करें।अन्यथा उसके अदृश्य प्रभाव से बच नही सकते।


8.कई महानुभाव मुझसे पूंछे हैं,की वो कुछ ऐसे दुखों से पीड़ित हैं,जिसका उनसे कोई संबंध नही है।बात बिल्कुल सही है,लेकिन क्या कभी सोचा कि मैंने किस किस का साथ किया,किस किस का खाया,क्या क्या देखा,किन किन स्थानों में गया?बस इसका ध्यान रखिये अनजानी पीड़ाओं से मुक्त हो जाएंगे। शरीर मे सोना अवश्य पहने यह नकारात्मक ऊर्जा से बचाता है।

Varshphal Report

9.पत्नी संग भी पूर्ण स्वच्छता,सात्विक भाव से किया जाय,भोग भाव से नही,बल्कि त्याग भाव से करें।पत्नी के अंतःकरण की नकारात्मकता,बाहरी मलिनता,से आप निश्चित ही प्रभावित होंगे।और पत्नी आपसे।अतः यह पूर्ण ध्यान रखें।मै, और शायद मै ही यह बताने का साहस कर रहा हूँ कि इसका जबरदस्त प्रभाव होता है।लोग कहते पाए जाते हैं कि बहु आने के बाद बर्बाद हो गए,कोई कहतें हैं,इसका आना शुभ हुआ।दहेज नही,लड़की के अंतःकरण का दहेज न लो,नही तो बर्बादी नही रुकेगी।दूसरे का धन तुम्हारे घर मे क्या प्रभाव डालेगा?कभी चिंतन किया क्या।वोअपना कबाड़ तुम्हे दे रहा है,और तुम उस कबाड़ को ले रहे हो।कहते हैं,बेटी के ब्याह के बाद उस व्यक्ति को बहुत मानसिक शांति,समृद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।बिल्कुल सही है,क्यों कि बेटी का बाप, राहु,केतु,शनि,और अपने अन्य अनिष्टकारी ग्रहों का दान कर देता है,इसलिए उसकी बृद्धि तो होगी ही।बेटी के बाप की पूरी विपत्ति,पूरे संकट,दूल्हे के पिता जी स्वीकार कर लेते हैं।ये विज्ञान है,ये विज्ञान सम्मत है महाशय,।बस समझने का प्रयास करिये बस।मैं जो भी लिखता हूँ,शास्त्र ज्ञान के साथ जीवंत प्रमाण भी रखता हूँ।


10.रात को दूध,दही और मूली का भूलकर दान न करें।

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