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कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?

रजस्वला स्त्री मासिक धर्म, एक स्त्री की पहचान है, यह उसे पूर्ण स्त्रीत्व प्रदान करता है। लेकिन फिर भी हमारे समाज में रजस्वला स्त्री को अपवित्र माना जाता है। महीने के जिन दिनों में वह मासिक चक्र के अंतर्गत आती है, उसे किसी भी पवित्र कार्य में शामिल नहीं होने दिया जाता, उसे किसी भी धार्मिक स्थल पर जाने की मनाही होती है। लेकिन विडंबना देखिए कि एक ओर तो हमारा समाज रजस्वला स्त्री को अपवित्र मानता है वहीं दूसरी ओर मासिक धर्म के दौरान कामाख्या देवी को सबसे पवित्र होने का दर्जा देता है।

तांत्रिक सिद्धियां

यह मंदिर तांत्रिक सिद्धियां प्राप्त करने के लिए प्रसिद्ध है। यहां तारा, धूमवती, भैरवी, कमला, बगलामुखी आदि तंत्र देवियों की मूर्तियां स्थापित हैं।

Prashna Kundli by Acharya Arya

 

पुन: निर्माण

इस मंदिर को सोलहवीं शताब्दी में नष्ट कर दिया गया था लेकिन बाद में कूच बिहार के राजा नर नारायण ने सत्रहवीं शताब्दी में इसका पुन: निर्माण करवाया था।

कामाख्या शक्तिपीठ (कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?)

नीलांचल पर्वत के बीचो-बीच स्थित कामाख्या मंदिर गुवाहाटी से करीब 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह मंदिर प्रसिद्ध 108 शक्तिपीठों में से एक है। माना जाता है कि पिता द्वारा किए जा रहे यज्ञ की अग्नि में कूदकर सती के आत्मदाह करने के बाद जब महादेव उनके शव को लेकर तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने उनके क्रोध को शांत करने के लिए अपना सुदर्शन चक्र छोड़कर सती के शव के टुकड़े कर दिए थे। उस समय जहां सती की योनि और गर्भ आकर गिरे थे, आज उस स्थान पर कामाख्या मंदिर स्थित है।

Horoscope

 

कामदेव का पौरुष

इसके अलावा इस मंदिर को लेकर एक और कथा चर्चित है। कहा जाता है कि एक बार जब काम के देवता कामदेव ने अपना पुरुषत्व खो दिया था तब इस स्थान पर रखे सती के गर्भ और योनि की सहायता से ही उन्हें अपना पुरुषत्व हासिल हुआ था। एक और कथा यह कहती है कि इस स्थान पर ही शिव और पार्वती के बीच प्रेम की शुरुआत हुई थी। संस्कृत भाषा में प्रेम को काम कहा जाता है, जिससे कामाख्या नाम पड़ा।

अधूरी सीढ़ियां (कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?)

इस मंदिर के पास मौजूद सीढ़ियां अधूरी हैं, इसके पीछे भी एक कथा मौजूद है। कहा जाता है एक नरका नाम का राक्षस देवी कामाख्या की सुंदरता पर मोहित होकर उनसे विवाह करना चाहता था। परंतु देवी कामाख्या ने उसके सामने एक शर्त रख दी।

kamakhya Devi - acharya arya - puja

कामाख्या देवी से विवाह

कामाख्या देवी ने नरका से कहा कि अगर वह एक ही रात में नीलांचल पर्वत से मंदिर तक सीढ़ियां बना पाएगा तो ही वह उससे विवाह करेंगी। नरका ने देवी की बात मान ली और सीढ़ियां बनाने लगा। देवी को लगा कि नरका इस कार्य को पूरा कर लेगा इसलिए उन्होंने एक तरकीब निकाली। उन्होंने एक कौवे को मुर्गा बनाकर उसे भोर से पहले ही बांग देने को कहा। नरका को लगा कि वह शर्त पूरी नहीं कर पाया है, परंतु जब उसे हकीकत का पता चला तो वह उस मुर्गे को मारने दौड़ा और उसकी बलि दे दी। जिस स्थान पर मुर्गे की बलि दी गई उसे कुकुराकता नाम से जाना जाता है। इस मंदिर की सीढ़ियां आज भी अधूरी हैं।

मासिक चक्र (कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?)

कामाख्या देवी को ‘बहते रक्त की देवी’ भी कहा जाता है, इसके पीछे मान्यता यह है कि यह देवी का एकमात्र ऐसा स्वरूप है जो नियमानुसार प्रतिवर्ष मासिक धर्म के चक्र में आता है। सुनकर आपको अटपटा लग सकता है लेकिन कामाख्या देवी के भक्तों का मानना है कि हर साल जून के महीने में कामाख्या देवी रजस्वला होती हैं और उनके बहते रक्त से पूरी ब्रह्मपुत्र नदी का रंग लाल हो जाता है।
निषेध है मंदिर में प्रवेश
इस दौरान तीन दिनों तक यह मंदिर बंद हो जाता है लेकिन मंदिर के आसपास ‘अम्बूवाची पर्व’ मनाया जाता है। इस दौरान देश-विदेश से सैलानियों के साथ तांत्रिक, अघोरी साधु और पुजारी इस मेले में शामिल होने आते हैं। शक्ति के उपासक, तांत्रिक और साधक नीलांचल पर्वत की विभिन्न गुफाओं में बैठकर साधना कर सिद्धियां प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।

Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya

 

वाममार्गी (कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?)

कामाख्या मंदिर को वाममार्ग साधना के लिए सर्वोच्च पीठ का दर्जा दिया गया है। ऐसा माना जाता है कि मछन्दरनाथ, गोरखनाथ, लोनाचमारी, ईस्माइलजोगी आदि जितने भी महान तंत्र साधक रहे हैं वे सभी इस स्थान पर साधना करते थे, यहीं उन्होंने अपनी साधना पूर्ण की थी।

भक्तों और स्थानीय लोगों का मानना है कि अम्बूवाची पर्व के दौरान कामाख्या देवी के गर्भगृह के दरवाजे अपने आप ही बंद हो जाते हैं और उनका दर्शन करना निषेध माना जाता है। पौराणिक दस्तावेजों में भी कहा गया है कि इन तीन दिनों में कामाख्या देवी रजस्वला होती हैं और उनकी योनि से रक्त प्रवाहित होता है।

तंत्र साधनाओं में रजस्वला स्त्री और उसके रक्त का विशेष महत्व होता है इसलिए यह पर्व या कामाख्या देवी के रजस्वला होने का यह समय तंत्र साधकों और अघोरियों के लिए सुनहरा काल होता है।

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योनि के वस्त्र (कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?)

इस पर्व की शुरुआत से पूर्व गर्भगृह स्थित योनि के आकार में स्थित शिलाखंड, जिसे महामुद्रा कहा जाता है, को सफेद वस्त्र पहनाए जाते हैं, जो पूरी तरह रक्त से भीग जाते हैं। पर्व संपन्न होने के बाद पुजारियों द्वारा यह वस्त्र भक्तों में वितरित कर दिए जाते हैं।

बहुत से तांत्रिक, साधु, ज्योतिषी ऐसे भी होते हैं जो यहां से वस्त्र ले जाकर उसे छोटा-छोटा फाड़कर मनमाने दामों पर उन वस्त्रों को कमिया वस्त्र या कमिया सिंदूर का नाम देकर बेचते हैं।

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आस्था का विषय

देवी के रजस्वला होने की बात पूरी तरह आस्था से जुड़ी है। इस मानसिकता से इतर सोचने वाले बहुत से लोगों का कहना है कि पर्व के दौरान ब्रह्मपुत्र नदी में प्रचुर मात्रा में सिंदूर डाला जाता है, जिसकी वजह से नदी लाल हो जाती है। कुछ तो यह भी कहते हैं कि यह नदी बेजुबान जानवरों की बलि के दौरान उनके बहते हुए रक्त से लाल होती है। इस मंदिर में कभी मादा पशु की बलि नहीं दी जाती।
सामान्य स्त्री और देवी
खैर, तथ्य चाहे जो भी हो परंतु माहवारी काल के दौरान कामाख्या देवी की आराधना कर कहीं ना कहीं हम स्त्रीत्व की आराधना करते हैं। हम स्त्री, जिसे ‘जननी’ कहा जाता है, उसका भी सम्मान करते हैं। लेकिन जब बात व्यवहारिकता की, एक सामान्य स्त्री की आती है तो हमारा व्यवहार पूरी तरह क्यों बदल जाता है?

कामाख्या सिन्दूर असली में छोटे छोटे पत्थरोँ के रूप में होता है, जो की माँ कामाख्या मंदिर से प्राप्त होता है, प्रसाद के रूप में वहां से और भी माँ कामाख्या की चीज़ें प्राप्त होती है जिनमे कामाख्या वस्त्र, कामाख्या कड़ा और कामाख्या यन्त्र भी मिलता है पर सभी लोगो को नहीं.
सारे भक्तो को सिर्फ दो ही चीज़ें दी जाती है जब मंदिर का द्वार खुलता है और वो दो चीज़ें कामाख्या सिन्दूर और वस्त्र होती है कामाख्या सिन्दूर को लोग कामिया सिन्दूर भी कहते है और कामाख्या वस्त्र को लोग अम्बुबाची वस्त्र भी कहते है।
और ये दोनों चीज़ें सिर्फ अम्बुबाची मेला के दौरान ही वितरित की जाती है, तीन दिन के लिए मंदिर का द्वार बंद कर दिया जाता है और फिर जब मंदिर का द्वार खुलता है तो प्रसाद के रूप में सिन्दूर और वस्त्र वितरित किया जाता है।
अम्बुबाची मेला हर साल जून के महीने में मनाया जाता है, क्योकि जहा पर मंदिर स्थित है उस ग्राम का नाम अम्बुबाची है इसलिए इस मेले का नाम अम्बुबाची मेला है और ये मंदिर नीलांचल पर्वत पर स्थित है हर साल लाखो करोडो भक्त माँ कामाख्या का आशीर्वाद लेने यहाँ आते है और अपनी मनोकामनाओ को पूर्ण करते है।

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(कामाख्या देवी के मासिक धर्म के दौरान कैसे लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी?)

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Piplad Muni ki Katha – पिप्पलाद कथा https://www.astrologyofmylife.com/piplad-muni-ki-katha/ https://www.astrologyofmylife.com/piplad-muni-ki-katha/#respond Tue, 24 Nov 2020 05:42:25 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17447 श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी/भार्या अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी …
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श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी/भार्या अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा। (Piplad Muni ki Katha)
एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-

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नारद- बालक तुम कौन हो ?
बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।
नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ?
बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।
तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की वय में ही हो गयी थी।
बालक- मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?
नारद- तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी।

Prashna Kundli by Acharya Arya

बालक- मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ? (Piplad Muni ki Katha)
नारद- शनिदेव की महादशा।
इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।
नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति माँगी।ब्रह्मा जी से वर्य मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनि देव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आँखे खोलकर भष्म करना शुरू कर दिया।शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे।अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वर्य मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-

Shubh Muhurat

1- जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा।जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ न हो।

2- मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।

ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया।तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे।अतः तभी से शनि “शनै:चरति य: शनैश्चर:” अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए।

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सम्प्रति शनिदेवजी की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है। आगे चलकर पिप्पलाद ने प्रश्न उपनिषद की रचना की, जो आज भी ज्ञान का वृहद भंडार है…..। (Piplad Muni ki Katha)

Horoscope

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Shraavana Special – 2020 https://www.astrologyofmylife.com/shraavana-special-month-2020-in-hindu-festival/ https://www.astrologyofmylife.com/shraavana-special-month-2020-in-hindu-festival/#respond Sat, 04 Jul 2020 10:13:42 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17196 6 जुलाई से शुरू होगा सावन महीना, 25 को रहेगी नागपंचमी और 3 अगस्त को मनाया जाएगा रक्षाबंधन सोमवार, 6 जुलाई से सावन महीना शुरू हो रहा है। इस महीने में वर्षा ऋतु की शुरुआत होती है। शिव पुराण के अनुसार ये शिवजी का प्रिय महीना है। जो कि 3 अगस्त तक रहेगा। इस दिन …
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6 जुलाई से शुरू होगा सावन महीना, 25 को रहेगी नागपंचमी और 3 अगस्त को मनाया जाएगा रक्षाबंधन

सोमवार, 6 जुलाई से सावन महीना शुरू हो रहा है। इस महीने में वर्षा ऋतु की शुरुआत होती है। शिव पुराण के अनुसार ये शिवजी का प्रिय महीना है। जो कि 3 अगस्त तक रहेगा। इस दिन पूर्णिमा रहेगी और रक्षा बंधन पर्व मनाया जाएगा। इस पूरे महीने में शिवजी की विशेष पूजा की जाती है। शिव पूजा के साथ ही इन दिनों में कई महत्वपूर्ण तीज-त्योहार भी रहते हैं। इनमें ज्यादातर व्रत भगवान शिव-पार्वती को समर्पित होते हैं। इस बार तिथि क्षय होने के कारण सावन महीना 29 दिन का रहेगा। इन दिनों में कई महत्वपूर्ण तीज-त्योहार मनाए जाएंगे।

भोले शंकर का महीना सावन के महीने की शुरुआत इस सोमवार से हो जाएगी। इस साल सावन के महीने कई विशेष योग लग रहे हैं। सावन का महीना 6 जुलाई को सोमवार यानी भोले शंकर के दिन से शुरू हो रहा है। इसके अलावा सावन के महीने की समाप्ति भी सोमवार के दिन से ही हो रही है। गुरु पूर्णिमा के साथ ही सावन शुरू हो जाएंगे। हिन्दु पंचांग के अनुसार पांचवां महीना श्रावण का होता है।

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इस दौरान भगवान शिव सृष्टी संभालेंगे। सावन के महीने में भगवान शिव और विष्णु की अराधना बहुत फलदाई मानी जाती है। पूरे श्रावण मास में 06, 13, 20,27 जुलाई और 03 अगस्त को है। ऐसा माना जाता है कि सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा करने से जीवन से सभी तरह की परेशानियों से छुटकारा मिलता है। इस महीने लोग अपनी पसंद की चीज का एक महीने के लिए त्याग करते हैं। सावन के महीने के आखिर में रक्षा बंधन का त्योहार मनाया जाता है।

Horoscope

 

  1. मंगलवार, 7 जुलाई को पहला मंगला गौरी व्रत किया जाएगा। सौभाग्य और समृद्धि पाने के लिए इस व्रत में सावन महीने के हर मंगलवार को देवी पार्वती की पूजा की जाती है। इस बार ये व्रत 7, 14, 21 और 28 जुलाई को किया जाएगा।
  2. बुधवार, 8 जुलाई को संकष्टी गणेश चतुर्थी रहेगी। इस बार बुधवार का संयोग होने से ये व्रत और भी खास रहेगा। इस व्रत से सुख और समृद्धि मिलती है।
  3. गुरुवार, 16 जुलाई को सावन महीने के कृष्णपक्ष की एकादशी है। इसे कामिका एकादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के लिए व्रत-उपवास और पूजन करना चाहिए।
  4. शनिवार, 18 जुलाई को प्रदोष व्रत रहेगा। इस दिन शिवजी और माता पार्वती की विशेष पूजा करने की परंपरा है।
  5. सोमवार, 20 जुलाई को हरियाली अमावस्या है। इस तिथि पर पितर देवता के लिए धूप-ध्यान और श्राद्ध-तर्पण किया जाता है। इस बार सोमवार होने से इसका महत्व और भी बढ़ गया है। ये सोमवती अमावस्या भी है।
  6. गुरुवार, 23 जुलाई को हरियाली तीज है। इस तिथि पर दांपत्य सुख और अखंड सौभाग्य के लिए माता पार्वती की पूजा के साथ व्रत और उपवास किया जाता है।
  7. शुक्रवार, 24 जुलाई को विनायकी चतुर्थी है। इस दिन भगवान गणपति के लिए व्रत किया जाता है।
  8. शनिवार, 25 जुलाई को नाग पंचमी है। इस तिथि पर नाग देवता की विशेष पूजा की जाती है। इसके साथ पितरों की पूजा की भी परंपरा है।
  9. गुरुवार, 30 जुलाई को पुत्रदा एकादशी है। इस दिन संतान सुखा के लिए भगवान विष्णु की पूजा के साथ व्रत और उपवास किया जाता है।
  10. शनिवार, 1 अगस्त को प्रदोष व्रत रहेगा। ये आखिरर सावन सोमवार से पहले भगवान शिव की विशेष पूजा का दिन है। इस दिन व्रत करने से हर तरह के दोष खत्म हो जाते हैं।
  11. सोमवार, 3 अगस्त को सावन महीने का आाखिरी दिन रहेगा। इस दिन पूर्णिमा तिथि और श्रवण नक्षत्र के संयोग में रक्षाबंधन पर्व मनाया जाएगा।

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Detailed story of Lord Sri Jagannath Ji https://www.astrologyofmylife.com/detailed-story-of-lord-sri-jagannath-ji/ https://www.astrologyofmylife.com/detailed-story-of-lord-sri-jagannath-ji/#respond Fri, 03 Jul 2020 19:07:49 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17188 एक बार भगवान श्री कृष्ण सो रहे थे और निद्रावस्था में उनके मुख से राधा जी का नाम निकला. पटरानियों को लगा कि वह प्रभु की इतनी सेवा करती है परंतु प्रभु सबसे ज्यादा राधा जी का ही स्मरण रहता है। रुक्मिणी जी एवं अन्य रानियों ने रोहिणी जी से राधा रानी व श्री कृष्ण …
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एक बार भगवान श्री कृष्ण सो रहे थे और निद्रावस्था में उनके मुख से राधा जी का नाम निकला. पटरानियों को लगा कि वह प्रभु की इतनी सेवा करती है परंतु प्रभु सबसे ज्यादा राधा जी का ही स्मरण रहता है।

रुक्मिणी जी एवं अन्य रानियों ने रोहिणी जी से राधा रानी व श्री कृष्ण के प्रेम व ब्रज-लीलाओं का वर्णन करने की प्रार्थना की. माता ने कथा सुनाने की हामी तो भर दी लेकिन यह भी कहा कि श्री कृष्ण व बलराम को इसकी भनक न मिले।

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तय हुआ कि सभी रानियों को रोहिणी जी एक गुप्त स्थान पर कथा सुनाएंगी. वहां कोई और न आए इसके लिए सुभद्रा जी को पहरा देने के लिए मना लिया गया।

सुभद्रा जी को आदेश हुआ कि स्वयं श्री कृष्ण या बलराम भी आएं तो उन्हें भी अंदर न आने देना. माता ने कथा सुनानी आरम्भ की. सुभद्रा द्वार पर तैनात थी. थोड़ी देर में श्री कृष्ण एवं बलराम वहां आ पहुंचे. सुभद्रा ने अन्दर जाने से रोक लिया।

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इससे भगवान श्री कृष्ण को कुछ संदेह हुआ. वह बाहर से ही अपनी सूक्ष्म शक्ति द्वारा अन्दर की माता द्वारा वर्णित ब्रज लीलाओं को आनंद लेकर सुनने लगे. बलराम जी भी कथा का आनंद लेने लगे।

कथा सुनते-सुनते श्री कृष्ण, बलराम व सुभद्रा के हृदय में ब्रज के प्रति अद्भुत प्रेम भाव उत्पन्न हुआ. उस भाव में उनके पैर-हाथ सिकुड़ने लगे जैसे बाल्य काल में थे. तीनों राधा जी की कथा में ऐसे विभोर हुए कि मूर्ति के समान जड़ प्रतीत होने लगे।

बड़े ध्यान पूर्वक देखने पर भी उनके हाथ-पैर दिखाई नहीं देते थे. सुदर्शन ने भी द्रवित होकर लंबा रूप धारण कर लिया. उसी समय देवमुनि नारद वहां आ पहुंचे. भगवान के इस रूप को देखकर आश्चर्यचकित हो गए और निहारते रहे।

कुछ समय बाद जब तंद्रा भंग हुई तो नारद जी ने प्रणाम करके भगवान श्री कृष्ण से कहा- हे प्रभु ! मेरी इच्छा है कि मैंने आज जो रूप देखा है, वह रूप आपके भक्त जनों को पृथ्वी लोक पर चिर काल तक देखने को मिले. आप इस रूप में पृथ्वी पर वास करें।

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भगवान श्री कृष्ण नारद जी की बात से प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि ऐसा ही होगा. कलिकाल में मैं इसी रूप में नीलांचल क्षेत्र में अपना स्वरूप प्रकट करुंगा।

कलियुग आगमन के उपरांत प्रभु की प्रेरणा से मालव राज इन्द्रद्युम्न ने भगवान श्री कृष्ण, बलभद्र जी और बहन सुभद्रा जी की ऐसी ही प्रतिमा जगन्नाथ मंदिर में स्थापित कराई. यह रोचक कथा आगे पड़े।

Gemstone Suggestion

राजा इन्द्रद्युम्न श्रेष्ठ प्रजा पालक राजा थे. प्रजा उन्हें बहुत प्रेम करती थी. प्रजा सुखी और संतुष्ट थी. राजा के मन में इच्छा थी कि वह कुछ ऐसा करे जिससे सभी उन्हें स्मरण रखें।

दैवयोग से इंद्रद्युम्न के मन में एक अज्ञात कामना प्रगट हुई कि वह ऐसा मंदिर का निर्माण कराएं जैसा दुनिया में कहीं और न हो. इंद्रद्युम्न विचारने लगे कि आखिर उनके मंदिर में किस देवता की मूर्ति स्थापित करें।

राजा के मन में यही इच्छा और चिंतन चलने लगा. एक रात इसी पर गंभीर चिंतन करते सो गए. नीद में राजा ने एक सपना देखा. सपने में उन्हें एक देव वाणी सुनाई पड़ी।

इंद्रद्युम्न ने सुना- राजा तुम पहले नए मंदिर का निर्माण आरंभ करो. मूर्ति विग्रह की चिंता छोड़ दो. उचित समय आने पर तुम्हें स्वयं राह दिखाई पड़ेगी. राजा नीद से जाग उठे. सुबह होते ही उन्होंने अपने मंत्रियों को सपने की बात बताई।

Horoscope

राज पुरोहित के सुझाव पर शुभ मुहूर्त में पूर्वी समुद्र तट पर एक विशाल मंदिर के निर्माण का निश्चय हुआ. वैदिक-मंत्रोचार के साथ मंदिर निर्माण का श्रीगणेश हुआ।

राजा इंद्रद्युम्न के मंदिर बनवाने की सूचना शिल्पियों और कारीगरों को हुई. सभी इसमें योगदान देने पहुंचे. दिन रात मंदिर के निर्माण में जुट गए. कुछ ही वर्षों में मंदिर बनकर तैयार हुआ।

सागर तट पर एक विशाल मंदिर का निर्माण तो हो गया परंतु मंदिर के भीतर भगवान की मूर्ति की समस्या जस की तस थी. राजा फिर से चिंतित होने लगे. एक दिन मंदिर के गर्भगृह में बैठकर इसी चिंतन में बैठे राजा की आंखों से आंसू निकल आए।

राजा ने भगवान से विनती की- प्रभु आपके किस स्वरूप को इस मंदिर में स्थापित करूं इसकी चिंता से व्यग्र हूं. मार्ग दिखाइए. आपने स्वप्न में जो संकेत दिया था उसे पूरा होने का समय कब आएगा ? देव विग्रह विहीन मंदिर देख सभी मुझ पर हंसेंगे।

राजा की आंखों से आंसू झर रहे थे और वह प्रभु से प्रार्थना करते जा रहे थे- प्रभु आपके आशीर्वाद से मेरा बड़ा सम्मान है. प्रजा समझेगी कि मैंने झूठ-मूठ में स्वप्न में आपके आदेश की बात कहकर इतना बड़ा श्रम कराया. हे प्रभु मार्ग दिखाइए।

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राजा दुखी मन से अपने महल में चले गए. उस रात को राजा ने फिर एक सपना देखा. सपने में उसे देव वाणी सुनाई दी- राजन ! यहां निकट में ही भगवान श्री कृष्ण का विग्रह रूप है. तुम उन्हें खोजने का प्रयास करो, तुम्हें दर्शन मिलेंगे।

इन्द्रद्युम्न ने स्वप्न की बात पुनः पुरोहित और मंत्रियों को बताई. सभी यह निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्रभु की कृपा सहज प्राप्त नहीं होगी. उसके लिए हमें निर्मल मन से परिश्रम आरंभ करना होगा।

भगवान के विग्रह का पता लगाने की जिम्मेदारी राजा इंद्रद्युम्न ने चार विद्वान पंडितों को सौंप दिया. प्रभु इच्छा से प्रेरित होकर चारों विद्वान चार दिशाओं में निकले।

उन चारों में एक विद्वान थे विद्यापति. वह चारों में सबसे कम उम्र के थे. प्रभु के विग्रह की खोज के दौरान उनके साथ बहुत से अलौकिक घटनाएं हुई।

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प्रभु का विग्रह किसे मिला ? यह प्रसंग आगे पढ़ें।

पंडित विद्यापति पूर्व दिशा की ओर चले. कुछ आगे चलने के बाद विद्यापति उत्तर की ओर मुडे तो उन्हें एक जंगल दिखाई दिया. वन भयावह था. विद्यापति श्री कृष्ण के उपासक थे. उन्होंने श्री कृष्ण का स्मरण किया और राह दिखाने की प्रार्थना की।

भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से उन्हें राह दिखने लगी. प्रभु का नाम लेते वह वन में चले जा रहे थे. जंगल के मध्य उन्हें एक पर्वत दिखाई दिया. पर्वत के वृक्षों से संगीत की ध्वनि सा सुरम्य गीत सुनाई पड़ रहा था।

विद्यापति संगीत के जान कार थे. उन्हें वहां मृदंग, बंसी और करताल की मिश्रित ध्वनि सुनाई दे रही थी. यह संगीत उन्हें दिव्य लगा. संगीत की लहरियों को खोजते विद्यापति आगे बढ़ चले।

वह जल्दी ही पहाड़ी की चोटी पर पहुंच गए. पहाड़ के दूसरी ओर उन्हें एक सुंदर घाटी दिखी जहां भील नृत्य कर रहे थे. विद्यापति उस दृश्य को देखकर मंत्र मुग्ध थे. सफर के कारण थके थे पर संगीत से थकान मिट गयी और उन्हें नींद आने लगी।

अचानक एक बाघ की गर्जना सुनकर विद्यापति घबरा उठे. बाघ उनकी और दौड़ता आ रहा था. बाघ को देखकर विद्यापति घबरा गए और बेहोश होकर वहीं गिर पडे।

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बाघ विद्यापति पर आक्रमण करने ही वाला था कि तभी एक स्त्री ने बाघ को पुकारा- बाघा..!! उस आवाज को सुनकर बाघ मौन खडा हो गया. स्त्री ने उसे लौटने का आदेश दिया तो बाघ लौट पड़ा।

बाघ उस स्त्री के पैरों के पास ऐसे लोटने लगा जैसे कोई बिल्ली पुचकार सुनकर खेलने लगती है. युवती बाघ की पीठ को प्यार से थपथपाने लगी और बाघ स्नेह से लोटता रहा।

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वह स्त्री वहां मौजूद स्त्रियों में सर्वाधिक सुंदर थी. वह भीलों के राजा विश्वावसु की इकलौती पुत्री ललिता थी. ललिता ने अपनी सेविकाओं को अचेत विद्यापति की देखभाल के लिए भेजा।

सेविकाओं ने झरने से जल लेकर विद्यापति पर छिड़का. कुछ देर बाद विद्यापति की चेतना लौटी. उन्हें जल पिलाया गया. विद्यापति यह सब देख कर कुछ आश्चर्य में थे।

ललिता विद्यापति के पास आई और पूछा- आप कौन हैं और भयानक जानवरों से भरे इस वन में आप कैसे पहुंचे. आपके आने का प्रयोजन बताइए ताकि मैं आपकी सहायता कर सकूं।

विद्यापति के मन से बाघ का भय पूरी तरह गया नहीं था. ललिता ने यह बात भांप ली और उन्हें सांत्वना देते हुए कहा- विप्रवर आप मेरे साथ चलें. जब आप स्वस्थ हों तब अपने लक्ष्य की ओर प्रस्थान करें।

विद्यापति ललिता के पीछे-पीछे उनकी बस्ती की तरफ चल दिए. विद्यापति भीलों के पाजा विश्वावसु से मिले और उन्हें अपना परिचय दिया. विश्वावसु विद्यापति जैसे विद्वान से मिलकर बड़े प्रसन्नता हुए।

विश्वावसु के अनुरोध पर विद्यापति कुछ दिन वहां अतिथि बनकर रूके. वह भीलों को धर्म और ज्ञान का उपदेश देने लगे. उनके उपदेशों को विश्वावसु तथा ललिता बड़ी रूचि के साथ सुनते थे. ललिता के मन में विद्यापति के लिए अनुराग पैदा हो गया।

विद्यापति ने भी भांप लिया कि ललिता जैसी सुंदरी को उनसे प्रेम हो गया है किंतु विद्यापति एक बड़े कार्य के लिए निकले थे. अचानक एक दिन विद्यापति बीमार हो गए. ललिता ने उसकी सेवा सुश्रुषा की।

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इससे विद्यापति के मन में भी ललिता के प्रति प्रेम भाव पैदा हो गया. विश्वावसु ने प्रस्ताव रखा की विद्यापति ललिता से विवाह कर ले. विद्यापति ने इसे स्वीकार कर लिया।

कुछ दिन दोनों के सुखमय बीते. ललिता से विवाह करके विद्यापति प्रसन्न तो था पर जिस महत्व पूर्ण कार्य के लिए वह आए थे, वह अधूरा था। यही चिंता उन्हें बार बार सताती थी।

इस बीच विद्यापति को एक विशेष बात पता चली. विश्वावसु हर रोज सवेरे उठ कर कहीं चला जाता था और सूर्योदय के बाद ही लौटता था. कितनी भी विकट स्थिति हो उसका यह नियम कभी नहीं टूटता था।

विश्वावसु के इस व्रत पर विद्यापति को आश्चर्य हुआ. उनके मन में इस रहस्य को जानने की इच्छा हुई. आखिर विश्वावसु जाता कहां है. एक दिन विद्यापति ने ललिता से इस सम्बन्ध में पूछा. ललिता यह सुनकर सहम गई।

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आखिर वह क्या रहस्य था ? क्या वह रहस्य विद्यापति के कार्य में सहयोगी था या विद्यापति पत्नी के प्रेम में मार्ग भटक गए. यह प्रसंग आगे पढ़ें

विद्यापति ने ललिता से उसके पिता द्वारा प्रतिदिन सुबह किसी अज्ञात स्थान पर जाने और सूर्योदय के पूर्व लौट आने का रहस्य पूछा. विश्ववासु का नियम किसी हाल में नहीं टूटता था चाहे कितनी भी विकट परिस्थिति हो।

ललिता के सामने धर्म संकट आ गया. वह पति की बात को ठुकरा नहीं सकती थी लेकिन पति जो पूछ रहा था वह उसके वंश की गोपनीय परंपरा से जुड़ी बात थी जिसे खोलना संभव नहीं था।

ललिता ने कहा- स्वामी ! यह हमारे कुल का रहस्य है जिसे किसी के सामने खोला नहीं जा सकता परंतु आप मेरे पति हैं और मैं आपको कुल का पुरुष मानते हुए जितना संभव है उतना बताती हूं।

यहां से कुछ दूरी पर एक गुफा है जिसके अन्दर हमारे कुल देवता हैं. उनकी पूजा हमारे सभी पूर्वज करते आए हैं. यह पूजा निर्बाध चलनी चाहिए. उसी पूजा के लिए पिता जी रोज सुबह नियमित रूप से जाते हैं।

विद्यापति ने ललिता से कहा कि वह भी उनके कुल देवता के दर्शन करना चाहते हैं. ललिता बोली- यह संभव नहीं. हमारे कुल देवता के बारे में किसी को जानने की इच्छा है, यह सुनकर मेरे पिता क्रोधित हो जाएंगे।

विद्यापति की उत्सुक्ता बढ़ रही थी. वह तरह-तरह से ललिता के अपने प्रेम की शपथ देकर उसे मनाने लगे. आखिर कार ललिता ने कहा कि वह अपने पिता जी से विनती करेगी कि वह आपको देवता के दर्शन करा दें।

ललिता ने पिता से सारी बात कही. वह क्रोधित हो गए. ललिता ने जब यह कहा कि मैं आपकी अकेली संतान हूं. आपके बाद देवता के पूजा का दायित्व मेरा होगा. इसलिए मेरे पति का यह अधिकार बनता है क्योंकि आगे उसे ही पूजना होगा।

विश्वावसु इस तर्क के आगे झुक गए. वह बोले- गुफा के दर्शन किसी को तभी कराए जा सकते हैं जब वह भगवान की पूजा का दायित्व अपने हाथ में ले ले. विद्यापति ने दायित्व स्वीकार किया तो विश्वावसु देवता के दर्शन कराने को राजी हुए।

दूसरे दिन सूर्योदय से पूर्व विद्यापति की आंखों पर पट्टी बांधकर विश्वावसु उनका दाहिना हाथ पकड़ कर गुफा की तरफ निकले. विद्यापति ने मुट्ठी में सरसों रख लिया था जिसे रास्ते में छोड़ते हुए गए।

गुफा के पास पहुंचकर विश्वावसु रुके और गुफा के पास पहुंच गए. विश्वावसु ने विद्यापति के आँखों की काली पट्टी खोल दी. उस गुफा में नीले रंग का प्रकाश चमक उठा. हाथों में मुरली लिए भगवान श्री कृष्ण का रूप विद्यापति को दिखाई दिया।

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विद्यापति आनंद मग्न हो गए. उन्होंने भगवान के दर्शन किए. दर्शन के बाद तो जैसे विद्यापति जाना ही नहीं चाहते थे. पर विश्वावसु ने लौटने का आदेश दिया. फिर उनकी आंखों पर पट्टी बांधी और दोनों लौट पड़े।

लौटने पर ललिता ने विद्यापति से पूछा. विद्यापति ने गुफा में दिखे अलौकिक दृश्य के बारे में पत्नी को बताना भी उसने उचित नहीं समझा. वह टाल गए. यह तो जानकारी हो चुकी थी कि विश्वावसु श्री कृष्ण की मूर्ति की पूजा करते हैं।

विद्यापति को आभास हो गया कि महाराज ने स्वप्न में जिस प्रभु विग्रह के बारे में देव वाणी सुनी थी, वह इसी मूर्ति के बारे में थी. विद्यापति विचार करने लगे कि किसी तरह इसी मूर्ति को लेकर राजधानी पहुंचना होगा।

वह एक तरफ तो गुफा से मूर्ति को लेकर जाने की सोच रहे थे दूसरी तरफ भील राज और पत्नी के साथ विश्वासघात के विचार से उनका मन व्यथित हो रहा था. विद्यापति धर्म-अधर्म के बारे में सोचता रहे।

फिर विचार आया कि यदि विश्वावसु ने सचमुच उसपर विश्वास किया होता तो आंखों पर पट्टी बांधकर गुफा तक नहीं ले जाता. इसलिए उसके साथ विश्वास घात का प्रश्न नहीं उठता. उसने गुफा से मूर्ति चुराने का मन बना लिया।

विद्यापति ने ललिता से कहा कि वह अपने माता-पिता के दर्शन करने के लिए जाना चाहता है. वे उसे लेकर परेशान होंगे. ललिता भी साथ चलने को तैयार हुई तो विद्यापति ने यह कह कर समझा लिया कि वह शीघ्र ही लौटेगा तो उसे लेकर जाएगा।

ललिता मान गई. विश्वावसु ने उसके लिए घोड़े का प्रबंध किया. अब तक सरसों के दाने से पौधे निकल आए थे. उनको देखता विद्यापति गुफा तक पहुंच गया. उसने भगवान की स्तुति की और क्षमा प्रार्थना के बाद उनकी मूर्ति उठाकर झोले में रख ली।

शाम तक वह राजधानी पहुंच गया और सीधा राजा के पास गया. उसने दिव्य प्रतिमा राजा को सौंप दी और पूरी कहानी सुनायी. राजा ने बताया कि उसने कल एक सपना देखा कि सुबह सागर में एक कुन्दा बहकर आएगा।

उस कुंदे की नक्काशी करवाकर भगवान की मूर्ति बनवा लेना जिसका अंश तुम्हें प्राप्त होने वाला है. वह भगवान श्री विष्णु का स्वरूप होगा. तुम जिस मूर्ति को लाए हो वह भी भगवान विष्णु का अंश है. दोनों आश्वस्त थे कि उनकी तलाश पूरी हो गई है।

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राजा ने कहा कि जब भगवान द्वारा भेजी लकड़ी से हम इस प्रतिमा का वड़ा स्वरूप बनवा लेंगे तब तुम अपने ससुर से मिलकर उन्हें मूर्ति वापस कर देना. उनके कुल देवता का इतना बड़ा विग्रह एक भव्य मंदिर में स्थापित देखकर उन्हें खुशी ही होगी।

दूसरे दिन सूर्योदय से पूर्व राजा विद्यापति तथा मंत्रियों को लेकर सागर तट पर पहुंचा. स्वप्न के अनुसार एक बड़ा कुंदा पानी में बहकर आ रहा था. सभी उसे देखकर प्रसन्न हुए. दस नावों पर बैठकर राजा के सेवक उस कुंदे को खींचने पहुंचे।

मोटी-मोटी रस्सियों से कुंदे को बांधकर खींचा जाने लगा लेकिन कुंदा टस से मस नहीं हुआ. और लोग भेजे गए लेकिन सैकड़ों लोग और नावों का प्रयोग करके भी कुंदे को हिलाया तक नहीं जा सका।

राजा का मन उदास हो गया. सेनापति ने एक लंबी सेना कुंदे को खींचने के लिए भेज दी. सारे सागर में सैनिक ही सैनिक नजर आने लगे लेकिन सभी मिल कर कुंदे को अपने स्थान से हिला तक न सके. सुबह से रात हो गई।

अचानक राजा ने काम रोकने का आदेश दिया. उसने विद्यापति को अकेले में ले जाकर कहा कि वह समस्या का कारण जान गया है. राजा के चेहरे पर संतोष के भाव थे. राजा ने विद्यापति को गोपनीय रूप से कहीं चलने की बात कही।

राजा इंद्रद्युम्न ने कहा कि अब भगवान का विग्रह बन जाएगा. बस एक काम करना होगा. भगवान श्री कृष्ण ने राजा को ऐसा क्या संकेत दे दिया था कि उसकी सारी परेशानी समाप्त हो गई. यह प्रसंग आगे पढ़ें।

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राजा इंद्रध्युम्न को भगवान की प्रेरणा से समझ में आने लगा कि आखिर प्रभु के विग्रह के लिए जो लकड़ी का कुंदा पानी में बह कर आया है वह हिल-डुल भी क्यों नहीं रहा।

राजा ने विद्यापति को बुलाया और कहा- तुम जिस दिव्य मूर्ति को अपने साथ लाए हो उसकी अब तक जो पूजा करता आया था उससे तुरंत भेंट करके क्षमा मांगनी होगी. बिना उसके स्पर्श किए यह कुंदा आगे नहीं बढ सकेगा।

राजा इंद्रद्युम्न और विद्यापति विश्वावसु से मिलने पहुंचे. राजा ने पर्वत की चोटी से जंगल को देखा तो उसकी सुंदरता को देखता ही रह गया. दोनों भीलों की बस्ती की ओर चुपचाप चलते रहे।

इधर विश्वावसु अपने नियमित दिनचर्या के हिसाब से गुफा में अपने कुल देवता की पूजा के लिए चले. वहां प्रभु की मूर्ति गायब देखी तो वह समझ गए कि उनके दामाद ने ही यह छल किया है।

विश्वावसु लौटे और ललिता को सारी बात सुना दी. विश्वावसु पीड़ा से भरा घर के आंगन में पछाड़ खाकर गिर गए. ललिता अपने पति द्वारा किए विश्वास घात से दुखी थी और स्वयं को इसका कारण मान रही थी. पिता-पुत्री दिन भर विलाप करते रहे।

उन दोनों ने अन्न का एक दाना भी न छुआ. अगली सुबह विश्वावसु उठे और सदा की तरह अपनी दिनचर्या का पालन करते हुए गुफा की तरफ बढ़ निकले. वह जानते थे कि प्रभु का विग्रह वहां नहीं है फिर भी उनके पैर गुफा की ओर खींचे चले जाते थे।

विश्वावसु के पीछे ललिता और रिश्तेदार भी चले. विश्वावसु गुफा के भीतर पहुंचे. जहां भगवान की मूर्ति होती थी उस चट्टान के पास खड़े होकर हाथ जोड़ कर खडे रहे. फिर उस ऊंची चट्टान पर गिर गए और बिलख–बिलख कर रोने लगे. उनके पीछे प्रजा भी रो रही थी।

एक भील युवक भागता हुआ गुफा के पास आया और बताया कि उसने महाराज और उनके साथ विद्यापति को बस्ती की ओर से आते देखा है. यह सुन कर सब चौंक उठे. विश्वावसु राजा के स्वागत में गुफा से बाहर आए लेकिन उनकी आंखों में आंसू थे।

राजा इंद्रद्युमन विश्वावसु के पास आए और उन्हें अपने हृदय से लगा लिया. राजा बोले- भीलराज, तुम्हारे कुल देवता की प्रतिमा का चोर तुम्हारा दामाद नहीं मैं हूं. उसने तो अपने महाराज के आदेश का पालन किया. यह सुन कर सब चौंक उठे।

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विश्वावसु ने राजा को आसन दिया. राजा ने उस विश्वावसु को शुरू से अंत तक पूरी बात बता कर कहा कि आखिर क्यों यह सब करना पड़ा. फिर राजा ने उनसे अपने स्वप्न और फिर जगन्नाथ पुरी में सागर तट पर मंदिर निर्माण की बात कह सुनाई।

राजा ने विश्वावसु से प्रार्थना की- भील सरदार विश्वावसु, कई पीढ़ियों से आपके वंश के लोग भगवान की मूर्ति को पूजते आए हैं. भगवान के उस विग्रह के दर्शन सभी को मिले इसके लिए आपकी सहायता चाहिए।

ईश्वर द्वारा भेजे गए लकड़ी के कुंदे से बनी मूर्ति के भीतर हम इस दिव्य मूर्ति को सुरछित रखना चाहते हैं. अपने कुल की प्रतिमा को पुरी के मंदिर में स्थापित करने की अनुमति दो. उस कुंदे को तुम स्पर्श करोगे तभी वह हिलेगा

विश्वावसु राजी हो गए. राजा सपरिवार विश्वावसु को लेकर सागर तट पर पहुंचे. विश्वावसु ने कुंदे को छुआ. छूते ही कुंदा अपने आप तैरता हुआ किनारे पर आ लगा. राजा के सेवकों ने उस कुंदे को राज महल में पहुंचा दिया।

अगले दिन मूर्तिकारों और शिल्पियों को राजा ने बुलाकर मंत्रणा की कि आखिर इस कुंदे से कौन सी देवमूर्ति बनाना शुभ दायक होगा. मूर्तिकारों ने कह दिया कि वे पत्थर की मूर्तियां बनाना तो जानते हैं लेकिन लकड़ी की मूर्ति बनाने का उन्हें ज्ञान नहीं।

एक नए विघ्न के पैदा होने से राजा फिर चिंतित हो गए. उसी समय वहां एक बूढा आया. उसने राजा से कहा- इस मंदिर में आप भगवान श्री कृष्ण को उनके भाई बलभद्र तथा बहन सुभद्रा के साथ विराज मान करें. इस दैवयोग का यही संकेत है।

राजा को उस बूढ़े व्यक्ति की बात से सांत्वना तो मिली लेकिन समस्या यह थी कि आखिर मूर्ति बने कैसे ? उस बूढ़े ने कहा कि मैं इस कला में कुशल हूं. मैं इस पवित्र कार्य को पूरा करूंगा और मूर्तियां बनाउंगा. पर मेरी एक शर्त है।

राजा प्रसन्न हो गए और उनकी शर्त पूछी. बूढ़े शिल्पी ने कहा- मैं भगवान की मूर्ति निर्माण का काम एकांत में करूंगा. मैं यह काम बंद कमरे में करुंगा. कार्य पूरा करने के बाद मैं स्वयं दरवाजा खोल कर बाहर आऊंगा. इस बीच कोई मुझे नहीं बुलाए।

राजा सहमत तो थे लेकिन उन्हें एक चिंता हुई और बोले- यदि कोई आपके पास नहीं आएगा तो ऐसी हालत में आपके खाने पीने की व्यवस्था कैसे होगी ? शिल्पी ने कहा- जब तक मेरा काम पूर्ण नहीं होता मैं कुछ खाता-पीता नहीं हूं।

राज मंदिर के एक विशाल कक्ष में उस बूढ़े शिल्पी ने स्वयं को 21 दिनों के लिए बंद कर लिया और काम शुरू कर दिया. भीतर से आवाजें आती थीं. महारानी गुंडीचा देवी दरवाजे से कान लगाकर अक्सर छेनी-हथौड़े के चलने की आवाजें सुना करती थीं।

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महारानी रोज की तरह कमरे के दरवाजे से कान लगाए खड़ी थीं. 15 दिन बीते थे कि उन्हें कमरे से आवाज सुनायी पडनी बंद हो गई. जब मूर्ति कार के काम करने की कोई आवाज न मिली तो रानी चिंतित हो गईं।

उन्हें लगा कि वृद्ध आदमी है, खाता-पीता भी नहीं कहीं उसके साथ कुछ अनिष्ट न हो गया हो. व्याकुल होकर रानी ने दरवाजे को धक्का देकर खोला और भीतर झांककर देखा।

महारानी गुंडीचा देवी ने इस तरह मूर्ति कार को दिया हुआ वचन भंग कर दिया था. मूर्ति कार अभी मूर्तियां बना रहा था. परंतु रानी को देखते ही वह अदृश्य हो गए. मूर्ति निर्माण का कार्य अभी तक पूरा नहीं हुआ था. हाथ-पैर का निर्माण पूर्ण नहीं हुआ था।

वृद्ध शिल्प कार के रूप में स्वयं देवताओं के शिल्पी भगवान विश्वकर्मा आए थे. उनके अदृश्य होते ही मूर्तियां अधूरी ही रह गईं. इसी कारण आज भी यह मूर्तियां वैसी ही हैं. उन प्रतिमाओं को ही मंदिर में स्थापित कराया गया।

कहते हैं विश्वावसु संभवतः उस जरा बहेलिए का वंशज था जिसने अंजाने में भगवान कृष्ण की ह्त्या कर दी थी. विश्वावसु शायद कृष्ण के पवित्र अवशेषों की पूजा करता था. ये अवशेष मूर्तियों में छिपाकर रखे गए थे।

विद्यापति और ललिता के वंशज जिन्हें दैत्यपति कहते हैं उनका परिवार ही यहां अब तक पूजा करता है।

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Symptoms of Auspicious and Inauspicious Rahu https://www.astrologyofmylife.com/symptoms-of-auspicious-and-inauspicious-rahu/ https://www.astrologyofmylife.com/symptoms-of-auspicious-and-inauspicious-rahu/#respond Sat, 04 Jan 2020 09:32:42 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=12716 शुभ-अशुभ राहु के लक्षण ज्योतिष के जनक महर्षि पराशर के अनुसार राहु ग्रह को पितामह (दादा), समाज एवं जाती से अलग लोग (विद्रोही भी), सर्प, सामाजिक जहर का फैलाना, क्रानिक बीमारियां, भय, विधवा, दुर्वचन, तीर्थ यात्रायें, निष्ठुर वाणी, विदेश में जीवन, त्वचा पर दाग, सरीसृप, महामारी, किसी महिला से अनैतिक संबन्ध, नानी, व्यर्थ के तर्क, …
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शुभ-अशुभ राहु के लक्षण

ज्योतिष के जनक महर्षि पराशर के अनुसार राहु ग्रह को पितामह (दादा), समाज एवं जाती से अलग लोग (विद्रोही भी), सर्प, सामाजिक जहर का फैलाना, क्रानिक बीमारियां, भय, विधवा, दुर्वचन, तीर्थ यात्रायें, निष्ठुर वाणी, विदेश में जीवन, त्वचा पर दाग, सरीसृप, महामारी, किसी महिला से अनैतिक संबन्ध, नानी, व्यर्थ के तर्क, भडकाऊ भाषण, बनावटीपन, दर्द और सूजन, डूबना, अंधेरा, दु:ख पहुंचाने वाले शब्द, निम्न जाति, दुष्ट स्त्री, जुआरी, विधर्मी, चालाकी, संक्रीण सोच, पीठ पीछे बुराई करने वाले, पाखण्डी, बुरी आदतों के आदी, जहाज के साथ जलमग्न होना, डूबना, रोगी स्त्री के साथ आनन्द लेना, अंगच्छेदन होना, डूबना, पथरी, कोढ, बल, व्यय,आत्मसम्मान, शत्रु, मिलावट दुर्घटना, नितम्ब, देश निकाला, विकलांग, खोजकर्ता, शराब, झगडा, गैरकानूनी, तरकीब से सामान देश से अन्दर बाहर ले जाना, जासूसी करना, आत्महत्या, विषैला, विधवा, पहलवान, शिकारी, दासता, शीघ्र उत्तेजित होने इत्यादि का कारक होता है।

कौन कौन से दोष आ जाते हैं, राहु खराब होने पर :-

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जैसे की कहा जाता है, पीपल की छाया में सोने वाले को किसी भी प्रकार का रोग नहीं होता परंतु यदि बबूल की छाया में सोते रहें तो श्वास रोग या चर्म रोग हो सकता है।

इसी प्रकार ग्रहों की छाया का भी हमारे जीवन पर प्रभाव पढ़ता है। नवग्रहों में राहु ग्रह हमारी बुद्धि भ्रमित करता है, लेकिन जो चतुराई हमारी बुद्धि में पैदा होती है, उसका कारक भी राहु ही है। ज्योतिष शास्त्र में राहु के दोषपूर्ण या खराब होने पर जातक चतुराई से घोटाले तो करता है, परंतु एक दिन अपने ही बुने जाल में बुरी तरह फंस जाता है।

क्यों होता है राहु खराब ? :-

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1 :- यदि कोई व्यक्ति अपने गुरु या फिर अपने धर्म का अपमान करता है, तो उस व्यक्ति का राहू ग्रह अवश्य बुरा फल देता है।

2 :- यदि कोई व्यक्ति शराब का सेवन नियमित करता है, या फिर पराई स्त्री के साथ सम्बन्ध बनाने की इच्छा रखता है, तो उसका राहू ग्रह अवश्य बुरा फल देता है।

3 :- यदि कोई व्यक्ति ब्याज वाले पैसों का प्रयोग घर में करता है तो, उस व्यक्ति का राहू ग्रह अवश्य बुरा फल देता है।

4 :- यदि कोई व्यक्ति चतुराई से किसी को धोखा देता है, और झूठ बोलने की आदत को नहीं छोड़ता तो उस व्यक्ति का राहू ग्रह बुरा फल देता है।

5 :- यदि कोई व्यक्ति हमेशा तामसिक भोजन करता है तो, उस व्यक्ति का राहू ग्रह बुरा फल देता है।

6 :- यदि कोई व्यक्ति खाना हमेशा घर से बाहर खाता है, या बाहर का खाना हमेशा खाता है तो, उस व्यक्ति का राहू ग्रह बुरा फल देने लगता है।

खराब राहु को कैसे पहचानेगे ? :-

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1 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके ससुर, साले या साली से झगडा बढ़ने लगेगा।

2 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके सोचने की ताकत कम हो जायेगी।

3 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके जीवन में शत्रु बढ़ जायेंगे, और सोचने की क्षमता कम होने लगती है।

4 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके साथ दुर्घटना, पुलिस केस, या पत्नी के साथ लड़ाई झगडे में बढ़ोत्तरी हो जायेगी।

5 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो वो व्यक्ति छोटी छोटी बातों पर गुस्सा होने लगता है, और लोगों के साथ सही तालमेल नहीं बिठा पाता है।

6 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उस व्यक्ति का एक तरह से दिमाग खराब होने लगता है, और उस व्यक्ति के सर में फालतू में छोटी छोटी चोट लगने लगती है या चक्कर आते हैं।

7 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो वह व्यक्ति अधिक मदिरापान या फिर सम्भोग/हस्तमैथुन की तरफ भागने लगता है।

8 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो व्यक्ति नीच हरकते करने लगता है, और निर्दयी हो जाता है।

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राहु ग्रह खराब होने से होने वाले रोग :-

1 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो सबसे पहले उसको गैस से सम्बन्धित शिकायत बढ़ने लगती है।

2 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके बाल झड़ने लगते हैं, तथा बवासीर से सम्बन्धित भी समस्या होने लगती है।

3 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो वो जातक पागलों की तरह व्यवहार करेगा और लगातार मानसिक तनाव में रहेगा।

4 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके नाखून अपने आप ही टूटने लगते हैं और व्यक्ति के सर में पीड़ा या दर्द बनी रहती है।

5 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उस व्यक्ति को अचानक पता चलेगा की मुझे कोई बीमारी है और उस पर पैसा भी खूब खर्चा होगा तथा व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है।

राहु के शुभ होने पर

Married Life Report

व्यक्ति दौलतमंद होगा। कल्पना शक्ति तेज होगी। रहस्यमय या धार्मिक बातों में रुचि लेगा। राहु के अच्छा होने से व्यक्ति में श्रेष्ठ साहित्यकार, दार्शनिक, वैज्ञानिक या फिर रहस्यमय विद्याओं के गुणों का विकास होता है। इसका दूसरा पक्ष यह कि इसके अच्छा होने से राजयोग भी फलित हो सकता है। आमतौर पर पुलिस या प्रशासन में इसके लोग ज्यादा होते हैं।

राहु को प्रसन्न करने के उपाय

Prashna Kundli by Acharya Arya

राहु बीज मन्त्र: ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम: (108 बार)

पक्षियों को प्रतिदिन बाजरा खिलाएं.

एक नारियल ग्यारह साबुत बादाम काले वस्त्र में बांधकर बहते जल में प्रवाहित करें.

अपने घर के नैऋत्य कोण में पीले रंग के फूल अवश्य लगाएं.

तामसिक आहार व मदिरापान बिल्कुल न करें.

अपने पास सफेद चन्दन अवश्य रखना चाहिए. सफेद चन्दन की माला भी धारण की जा सकती है. प्रतिदिन

सुबह चन्दन का टीका भी लगाना चाहिए. अगर हो सके तो नहाने के पानी में चन्दन का इत्र डाल कर नहाएं.

हाथी को हरे पत्ते, नारियल गोले या गुड़ खिलाएं.

अधिक जानकारी के लिए आचार्य आर्य +91 99999 54145 पर सम्पर्क करें…

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ज्योतिष अनुसार शिक्षा के योग

जन्म कुंडली के चौथे व पाँचवें भाव से चुने विषय दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करते ही ‘कौन-सा विषय चुनें’ यह यक्ष प्रश्न बच्चों के सामने आ खड़ा होता है। माता-पिता को अपनी महत्वाकांक्षाओं को परे रखकर एक नजर कुंडली पर भी मार लेनी चाहिए। बच्चे किस विषय में सिद्धहस्त होंगे, यह ग्रह स्थिति स्पष्ट बताती है। आज जीवन के हर मोड़ पर आम आदमी स्वयं को खोया हुआ महसूस करता है। विशेष रूप से वह विद्यार्थी जिसने हाल ही में दसवीं या बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की है, उसके सामने सबसे बड़ा संकट यह रहता है कि वह कौन से विषय का चयन करे जो उसके लिए लाभदायक हो। एक अनुभवी ज्योतिषी आपकी अच्छी मदद कर सकता है।

Married Life Report

जन्मपत्रिका में पंचम भाव से शिक्षा तथा नवम भाव से उच्च शिक्षा तथा भाग्य के बारे में विचार किया जाता है। सबसे पहले जातक की कुंडली में पंचम भाव तथा उसका स्वामी कौन है तथा पंचम भाव पर किन-किन ग्रहों की दृष्टि है, ये ग्रह शुभ-अशुभ है अथवा मित्र-शत्रु, अधिमित्र हैं विचार करना चाहिए। दूसरी बात नवम भाव एवं उसका स्वामी, नवम भाव स्थित ग्रह, नवम भाव पर ग्रह दृष्टि आदि शुभाशुभ का जानना। तीसरी बात जातक का सुदर्शन चंद्र स्थित श्रेष्ठ लग्न के दशम भाव का स्वामी नवांश कुंडली में किस राशि में किन परिस्थितियों में स्थित है ज्ञात करना, तीसरी स्थिति से जातक की आय एवं आय के स्त्रोत का ज्ञान होगा। जन्मकुंडली में जो सर्वाधिक प्रभावी ग्रह होता है सामान्यत: व्यक्ति उसी ग्रह से संबंधित कार्य-व्यवसाय करता है। यदि हमें कार्य व्यवसाय के बारे में जानकारी मिल जाती है तो शिक्षा भी उसी से संबंधित होगी। जैसे यदि जन्म कुंडली में गुरु सर्वाधिक प्रभावी है तो जातक को चिकित्सा, लेखन, शिक्षा, खाद्य पदार्थ के द्वारा आय होगी। यदि जातक को चिकित्सक योग है तो जातक जीव विज्ञान विषय लेकर चिकित्सक बनेगा।

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यदि पत्रिका में गुरु कमजोर है तो जातक आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक, रैकी या इनके समकक्ष ज्ञान प्राप्त करेगा। श्रेष्ठ गुरु होने पर एमबीबीएस की पढ़ाई करेगा। यदि गुरु के साथ मंगल का श्रेष्ठ योग बन रहा है तो शल्य चिकित्सक, यदि सूर्य से योग बन रहा है तो नेत्र चिकित्सा या सोनोग्राफी या इलेक्ट्रॉनिक उपकरण से संबंधित विषय की शिक्षा, यदि शुक्र है तो महिला रोग विशेषज्ञ, बुध है तो मनोरोग तथा राहु है तो हड्डी रोग विशेषज्ञ बनेगा। चंद्र की श्रेष्ठ स्थिति में किसी विषय पर गहन अध्ययन करेगा। लेखक, कवि, श्रेष्ठ विचारक बनेगा तथा बीए, एमए कर श्रेष्ठ चिंतनशील, योजनाकार होगा। सूर्य के प्रबल होने पर इलेक्ट्रॉनिक से संबंधित शिक्षा ग्रहण करेगा। यदि मंगल अनुकूल है तो ऐसा जातक कला, भूमि, भवन, निर्माण, खदान, केमिकल आदि से संबंधित विषय शिक्षा ग्रहण करेगा।

Horoscope

बुध प्रधान कुंडली वाले जातक बैंक, बीमा, कमीशन, वित्तीय संस्थान, वाणी से संबंधित कार्य, ज्योतिष-वैद्य, शिक्षक, वकील, सलाहकार, चार्टड अकाउंटेंट, इंजीनियर, लेखपाल आदि का कार्य करते हैं। अत: ऐसे जातक को साइंस, मैथ्स की शिक्षा ग्रहण करना चाहिए किंतु यदि बुध कमजोर हो तो वाणिज्य विषय लेना चाहिए। बुध की श्रेष्ठ स्थिति में चार्टड अकाउंटेंट की शिक्षा ग्रहण करना चाहिए। शुक्र की अनुकूलता से जातक साइंस की शिक्षा ग्रहण करेगा। शुक्र की अधिक अनुकूलता होने से जातक फैशन, सुगंधित व्यवसाय, श्रेष्ठ कलाकार तथा रत्नों से संबंधित विषय को चुनता है। शनि ग्रह प्रबंध, लौह तत्व, तेल, मशीनरी आदि विषय का कारक है। अत: ऐसे जातकों की शिक्षा में व्यवधान के साथ पूर्ण होती है। शनि के साथ बुध होने पर जातक एमबीए फाइनेंस में करेगा। यदि शनि के साथ मंगल भी कारक है तो सेना-पुलिस अथवा शौर्य से संबंधित विभाग में अधिकारी बनेगा। राहु की प्रधानता कुटिल ज्ञान को दर्शाती है।

Varshphal Report

केतु – तेजी मंदी तथा अचानक आय देने वाले कार्य शेयर, तेजी मंदी के बाजार, सट्टा, प्रतियोगी क्वीज, लॉटरी आदि। कभी-कभी एक ही ग्रह विभिन्न विषयों के सूचक होते हैं तो ऐसी स्थिति में जातक एवं ज्योतिषी दोनों ही अनिर्णय की स्थिति में आ जाते हैं। उसका सही अनुमान लगाना ज्योतिषी का कार्य है। ऐसी स्थिति में देश, काल एवं पात्र को देखकर निर्णय लेना उचित रहेगा। जैसे नवांश में बुध का स्वराशि होना ज्योतिष, वैद्य, वकील, सलाहकार का सूचक है। अब यहां जातक के पिता का व्यवसाय (स्वयं की रुचि) जिस विषय की होगी, वह उसी विषय का अध्ययन कर धनार्जन करेगा।

Life Prediction

सामान्यत: वैदिक ग्रंथों के अनुसार सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरू और शनि इन सात ग्रहों का अपना अलग-अलग क्षेत्र और प्रभाव है। लेकिन, जब इन ग्रहों का आपसी योग बनता है तो क्षेत्र और प्रभाव बदल जाते हैं। इन ग्रहों के साथ राहु और केतु मिल जाये, तो कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं। व्यवहारिक भाशा में कहें तो टांग अड़ाते हैं। जन्मकुंडली के मुख्य कारक ग्रह ही कुंडली के प्रेसिडेंट होते हैं। यानी जो भी कुछ होगा वह उन ग्रहों की देखरेख में होगा, अत: यह ध्यान में जरूर रखें कि इस कुंडली में कारक ग्रह कौन से हैं। अगर कारक ग्रह कमजोर हैं या अस्त है, वृद्धावस्था में हैं तो उसके बाद वाले ग्रहों का असर आरंभ हो जायेगा। मंगल, शुक्र और सूर्य, शनि करियर की दशा तय करते हैं। बुध और गुरु उस क्षेत्र की बुद्धि और शिक्षा प्रदान करते हैं।

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यद्यपि क्षेत्र इनका भी निश्चित है, लेकिन इन पर जिम्मेदारियां ज्यादा रहती हैं। इसलिये कुंडली में इनकी शक्ति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आज हम किसी एक या दो ग्रहों के करियर पर प्रभाव की चर्चा करेंगे। जन्मकुंडली में वैसे तो सभी बारह भाव एक दूसरे को पूरक हैं, किंतु पराक्रम, ज्ञान, कर्म और लाभ इनमें महत्?वपूर्ण है। इसके साथ ही इन सभी भावों का प्रभाव नवम भाग्य भाव से तय होता है। अत: यह परम भाव है।

ओर अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे…

आचार्य आर्य

+91 99999 5145

Vastu Check by Scientifically

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राजनीति में सफलता के योग https://www.astrologyofmylife.com/yog-of-success-in-politics/ https://www.astrologyofmylife.com/yog-of-success-in-politics/#respond Fri, 02 Aug 2019 07:17:34 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=5584 राजनीति में सफलता के योग नीतिकारक ग्रह राहु, सत्ता का कारक सूर्य, न्याय-प्रिय ग्रह गुरु, जनता का हितैषी शनि और नेतृत्व का कारक मंगल जब राज्य-सत्ता के कारक दशम भाव, दशम से दशम सप्तम भाव, जनता की सेवा के छठे भाव, लाभ एवं भाग्य स्थान से शुभ संबंध बनाए तो व्यक्ति सफल राजनीतिज्ञ बनता है। …
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राजनीति में सफलता के योग

नीतिकारक ग्रह राहु, सत्ता का कारक सूर्य, न्याय-प्रिय ग्रह गुरु, जनता का हितैषी शनि और नेतृत्व का कारक मंगल जब राज्य-सत्ता के कारक दशम भाव, दशम से दशम सप्तम भाव, जनता की सेवा के छठे भाव, लाभ एवं भाग्य स्थान से शुभ संबंध बनाए तो व्यक्ति सफल राजनीतिज्ञ बनता है। व्यक्ति सफल राजनीतिज्ञ बनेगा या नहीं इसका बहुत कुछ उसके जन्मकालिक ग्रहों की स्थिति पर निर्भर करता है। अन्य व्यवसायों एवं करियर की भांति ही राजनीति में प्रवेश करने वालों की कुंडली में भी ज्योतिषीय योग होते हैं।

राहु:-राजनीति में राहु का महत्वपूर्ण स्थान है। राहु को सभी ग्रहों में नीतिकारक ग्रह का दर्जा दिया गया है। इसका प्रभाव राजनीति के घर से होना चाहिए। राहु के शुभ प्रभाव से ही नीतियों के निर्माण व उन्हें लागू करने की क्षमता व्यक्ति विशेष में आती है। राजनीति के घर (दशमभाव) से राहु का संबंध बने तो राजनेता में स्थिति के अनुसार बात करने की योग्यता आती है। सफल राजनेताओं की कुंडली में राहु का संबंध छठे, सातवें, दशमें व ग्यारहवें भाव से देखा गया है। छठे भाव को सेवा का भाव कहते हैं। व्यक्ति में सेवा भाव होने के लिए इस भाव से दशम या दशमेश का संबंध होना चाहिए। सातवां भाव दशम से दशम है इसलिए इसे विशेष रूप से देखा जाता है।

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सूर्य:- राजनीति के क्षेत्र में सफलता के लिए सूर्य ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रह है क्योंकि सूर्य को ही सरकार और सत्ता का कारक माना गया है इसके अलावा शासन की कुशलता, प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा, इच्छाशक्ति और यश का कारक भी सूर्य ही होता है और राजनीति में आगे बढ़ने के लिए प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा का होना बहुत आवश्यक है इसलिए भी राजनीति में सफलता पाने के लिए कुण्डली में सूर्य का बलि होना आवश्यक है।

शनि:- शनि को जनता और जनता से मिलने वाला सपोर्ट का कारक माना गया है और सक्रीय राजनीति में सफल होने के लिए जनता के साथ मिलना बहुत आवश्यक है अतः कुण्डली में बलवान शनि जनता का सहयोग दिलाकर व्यक्ति को सफल राजनेता बनाता है।

चतुर्थ-भाव- कुण्डली का चौथा भाव भी जनता का कारक है अतः राजनीति में सफलता के लिए कुण्डली के चतुर्थ भाव और चतुर्थेश का बलि होना भी बहुत आवश्यक है।

षष्ठ और तृतीय भाव- कुण्डली का छठा और तीसरा भाव प्रतिस्पर्धा की क्षमता और विरोधियों पर विजय को दर्शाता है अतः कुण्डली में इन दोनों भावों का बलि होना भी राजनीति में सहायक होता है तथा विरोधियों पर विजय दिलाकर प्रतिस्पर्धा में आगे रखता है।

Horoscope

दशम भाव-जन्म कुंडली के दशमें घर को राजनीति का घर कहते हैं। सत्ता में भाग लेने के लिए दशमेश और दशम भाव का मजबूत स्थिति में होना आवष्यक है। दशम भाव में उच्च, मूल त्रिकोण या स्वराशिस्थ ग्रह के बैठने से व्यक्ति को राजनीति के क्षेत्र में बल मिलता है। गुरु नवम भाव में शुभ प्रभाव में स्थित हो और दशम घर या दशमेश का संबंध सप्तम भाव से हो तो व्यक्ति राजनीति में सफलता प्राप्त करता है। सूर्य राज्य का कारक ग्रह है अत: यह दशम भाव में स्वराशि या उच्च राशि में होकर स्थित हो और राहु छठे, दशवें व ग्यारहवें भाव से संबंध बनाए तो राजनीति में सफलता की प्रबल संभावना बनती है। इस योग में वाणी के कारक (द्वितीय भाव के स्वामी) ग्रह का प्रभाव आने से व्यक्ति अच्छा वक्ता बनता है।

शनि दशम भाव में हो या दशमेश से संबंध बनाए और इसी दशम भाव में मंगल भी स्थित हो तो व्यक्ति समाज के लोगों के हितों के लिए राजनीति में आता है। यहां शनि जनता का हितैषी हैऔर मंगल व्यक्ति में नेतृत्व का गुण दे रहा है। दोनों का संबंध व्यक्ति को राजनेता बनने के गुण प्रदान करेगा। सूर्य और राहु के अमात्यकारक बनने से व्यक्ति रुचि होने पर राजनीति के क्षेत्र में सफलता पाने की संभावना रखता है और समाज में मान सम्मान तथा उच्च पद की प्राप्ति होती है। जन्मकुंडली, नवमांश तथा दशमांश तीनों कुंडलियों में समान तथा योग व्यक्ति को राजनीति में ऊंचाइयों पर ले जाते हैं।

Varshphal Report

राजनैतिक सफलता के कुछ विशेष योग:-

1. यदि सूर्य स्वराशि या उच्च राशि के सिंह, मेष में होकर केन्द्र, त्रिकोण आदि शुभ भावों में बैठा हो तो राजनीति में सफलता मिलती हैं। उदाहरण के तौर पर समझिये आपकी मेष लग्न की कुण्डली है तो 5th हाउस में सिंह राशि में सूर्य स्वग्रह होकर स्थित होंगे एवं 5th हाउस कुण्डली का त्रिकोण भाव होता हैं तब यह योग बनता है। और ऐसे व्यक्तियों को राजनीति में सफलता प्राप्त होती है।
2. सूर्य 10th हाउस में हो या 10th हाउस पर सूर्य की दृष्टि हो तो राजनीति में सफलता मिलती है। उदाहरण के तौर पर समझिये आपकी मिथुन लग्न की कुण्डली है तो 10th हाउस में मीन राशि में सूर्य स्थित हो या सूर्य 4th हाउस कन्या राशि में स्थित होेकर 10th हाउस पर पूर्ण दृष्टि होती है तब यह योग बनता है। और ऐसे व्यक्तियों को राजनीति में सफलता प्राप्त होती है।
3. सूर्य यदि मित्र राशि में शुभ भाव में हो और अन्य किसी प्रकार पीड़ित ना हो तो भी राजनैतिक सफलता मिलती है। उदाहरण के तौर पर समझिये आपकी कर्क लग्न की कुण्डली है तो सूर्य 10th हाउस में मेष राशि में मित्रराशिस्थ होकर शुभ भाव मे होगा। तब यह योग बनता है। और ऐसे व्यक्तियों को राजनीति में सफलता प्राप्त होती है।
4. शनि यदि स्वराशि या उच्च राशि मकर, कुंभ, तुला में होकर केन्द्र त्रिकोण आदि शुभ स्थानों में बैठा हो तो राजनीति में अच्छी सफलता मिलती है। उदाहरण के तौर पर समझिये आपकी वृषभ लग्न की कुण्डली है तो शनि 9th हाउस में मकर राशि में स्वग्रही होकर स्थित होंगे जो कि त्रिकोण भाव है या फिर शनि 10th हाउस में कुंभ राशि में स्वग्रही होकर स्थित होंगे जो कि केन्द्र भाव है। तब यह योग बनता है। और ऐसे व्यक्तियों को राजनीति में सफलता प्राप्त होती है।
5. यदि चतुर्थेश चैथे भाव में बैठा या चतुर्थेश की चतुर्थ भाव पर दृष्टि हो तो ऐसे व्यक्ति को विशेष जनसमर्थन मिलता है। उदाहरण के तौर पर समझिये आपकी सिंह लग्न की कुण्डली है तो 4th हाउस के लाॅर्ड मंगल 4th हाउस में स्वग्रही होकर स्थित होंगे जोकि त्रिकोण भाव है या फिर 4th हाउस के लाॅर्ड मंगल 10th हाउस में स्थित होकर 4th हाउस पर दृष्टि हो तब यह योग बनता है। और ऐसे व्यक्तियों को राजनीति में सफलता प्राप्त होती है।

Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya

6. 4th हाउस के लाॅर्ड का स्वगृही या उच्च राशि में होकर शुभ स्थान में होना भी राजनैतिक सफलता में सहायक होता है। उदाहरण के तौर पर समझिये आपकी कर्क लग्न की कुण्डली है तो 4th हाउस के लाॅर्ड शुक्र 9th हाउस में मीन राशि में उच्च के होकर विराजमान हो तब यह योग बनता है। और ऐसे व्यक्तियों को राजनीति में सफलता प्राप्त होती है।
7. दशमेश और चतुर्थेश का योग हो तो दशमेश चतुर्थ भाव में और चतुर्थेश दशम भाव में हो तो ये भी राजनीति में सफलता दिलाता है। उदाहरण के तौर पर समझिये आपकी कुंभ लग्न की कुण्डली है तो 10th हाउस के लाॅर्ड मंगल 4th हाउस में वृषभ राशि में विराजमान हो तथा 4th हाउस के लाॅर्ड शुक्र 10th हाउस में विराजमान हो तब यह योग बनता है। और ऐसे व्यक्तियों को राजनीति में सफलता प्राप्त होती है।
8. सूर्य और बृहस्पति का योग केन्द्र, त्रिकोण में बना हो तो ये भी राजनैतिक सफलता दिलाता हैं। उदाहरण के तौर पर समझिये आपकी धनु लग्न की कुण्डली है तो सूर्य 5th हाउस में मेष राशि में त्रिकोण में स्थित हो और देवगुरु बृहस्पति 10th हाउस में केन्द्र में स्थित हो तब यह योग बनता है। और ऐसे व्यक्तियों को राजनीति में सफलता प्राप्त होती है।
9. कर्क लग्न में पैदा होने वाला अधिकतर व्यक्ति नेतृत्व गुणों से संपन्न होता है। भारत के अधिकतर शासक इस लग्न या राशि के है। उनमें मुख्य हैं- पं. जवाहरलाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी, इन्द्र कुमार गुजराल, श्रीमती सोनिया गांधी, एच डी देवेगौड़ा, डाॅ. मनमोहन सिंह आदि।
10. बृहस्पति यदि बलि होकर लग्न में बैठा हो तो राजनैतिक सफलता दिलाता है।

Career Report : One Year

उपाय:- राजनीति से जुड़ें या राजनीति में जाने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को सूर्य की उपासना अवश्य करनी चाहिए।

1. आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें।
2. सूर्यदेव को तांबे के कलश में कुंकुंम एवं गुड़ मिलाकर जल अर्पित करें।
3. ऊँ घृणि सूर्याय नमः का जाप करें।

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शिव भक्तों के लिए सावन पर विशेष https://www.astrologyofmylife.com/special-for-shiv-bhagat-on-sawan/ https://www.astrologyofmylife.com/special-for-shiv-bhagat-on-sawan/#respond Mon, 15 Jul 2019 17:10:20 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=5088 शिव भक्तों के लिए सावन पर विशेष 17 जुलाई से सुरु हो रहा है सावन 5 सोमवार का संयोग:– सावन का पूरा महीना ही जहां अराधना के लिए विशेष है तो वहीं 5 दिन सावन सोमवार के भी भक्तों के लिए व्रत रखने को मिलेंगे। प्रथम सावन सोमवार22 जुलाई को, दूसरा 29 जुलाई को, तीसरा …
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शिव भक्तों के लिए सावन पर विशेष


17 जुलाई से सुरु हो रहा है सावन

5 सोमवार का संयोग:–

सावन का पूरा महीना ही जहां अराधना के लिए विशेष है तो वहीं 5 दिन सावन सोमवार के भी भक्तों के लिए व्रत रखने को मिलेंगे।

प्रथम सावन सोमवार22 जुलाई को,
दूसरा 29 जुलाई को,
तीसरा 5अगस्त,
चौथा सोमवार 12 अगस्त और
19वां सोमवार को होगा।

इस दिन भाई बहन के पवित्र बंधन का त्यौहार रक्षाबंधन भी मनेगा।

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इस मास के प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर कुछ विशेष वास्तु अर्पित की जाती है जिसे शिवामुट्ठी कहते है।

1. प्रथम सोमवार को कच्चे चावल एक मुट्ठी,

2. दूसरे सोमवार को सफेद तिल् एक मुट्ठी,

3. तीसरे सोमवार को खड़े मूँग एक मुट्ठी,

4. चौथे सोमवार को जौ एक मुट्ठी और

5. यदि जिस मॉस में पांच सोमवार हो तो पांचवें सोमवार को सतुआ चढ़ाने जाते हैं।

यदि पांच सोमवार न हो तो आखरी सोमवार को दो मुट्ठी भोग अर्पित करते है।

Horoscope

माना जाता है कि श्रावण मास में शिव की पूजा करने से सारे कष्ट खत्म हो जाते हैं। महादेव शिव सर्व समर्थ हैं। वे मनुष्य के समस्त पापों का क्षय करके मुक्ति दिलाते हैं। इनकी पूजा से ग्रह बाधा भी दूर होती है।

1. सूर्य से संबंधित बाधा है, तो विधिवत या पंचोपचार के बाद लाल आक के पुष्प एवं पत्तों से शिव की पूजा करनी चाहिए।

2. चंद्रमा से परेशान हैं, तो प्रत्येक सोमवार शिवलिंग पर गाय का दूध अर्पित करें। साथ ही सोमवार का व्रत भी करें।

3. मंगल से संबंधित बाधाओं के निवारण के लिए गिलोय की जड़ी-बूटी के रस से शिव का अभिषेक करना लाभप्रद रहेगा।

4. बुध से संबंधित परेशानी दूर करने के लिए विधारा की जड़ी के रस से शिव का अभिषेक करना ठीक रहेगा।

5. बृहस्पति से संबंधित समस्याओं को दूर करने के लिए प्रत्येक बृहस्पतिवार को हल्दी मिश्रित दूध शिवलिंग पर अर्पित करना चाहिए।

6. शुक्र ग्रह को अनुकूल बनाना चाहते हैं, तो पंचामृत एवं घृत से शिवलिंग का अभिषेक करें।

7. शनि से संबंधित बाधाओं के निवारण के लिए गन्ने के रस एवं छाछ से शिवलिंग का अभिषेक करें।

8-9. राहु-केतु से मुक्ति के लिए कुश और दूर्वा को जल में मिलाकर शिव का अभिषेक करने से लाभ होगा।

शास्त्रों में मनोरथ पूर्ति व संकट मुक्ति के लिए अलग-अलग तरह की धारा से शिव का अभिषेक करना शुभ बताया गया है।

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अलग-अलग धाराओं से शिव अभिषेक का फल- जब किसी का मन बेचैन हो, निराशा से भरा हो, परिवार में कलह हो रहा हो, अनचाहे दु:ख और कष्ट मिल रहे हो तब शिव लिंग पर दूध की धारा चढ़ाना सबसे अच्छा उपाय है।

इसमें भी शिव मंत्रों का उच्चारण करते रहना चाहिए।

1. वंश की वृद्धि के लिए शिवलिंग पर शिव सहस्त्रनाम बोलकर घी की धारा अर्पित करें।

2. शिव पर जलधारा से अभिषेक मन की शांति के लिए श्रेष्ठ मानी गई है।

3. भौतिक सुखों को पाने के लिए इत्र की धारा से शिवलिंग का अभिषेक करें।

4. बीमारियों से छुटकारे के लिए शहद की धारा से शिव पूजा करें।

5. गन्ने के रस की धारा से अभिषेक करने पर हर *सुख और आनंद मिलता है*।

6. सभी धाराओं से श्रेष्ठ है गंगाजल की धारा। शिव को गंगाधर कहा जाता है। शिव को गंगा की धार बहुत प्रिय है। गंगा जल से शिव अभिषेक करने पर चारों पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है। इससे अभिषेक करते समय महामृत्युंजय मन्त्र जरुर बोलना चाहिए।

Career Report : One Year

कार्य सिद्धि के लिए:–

1. हर ‍इच्छा पूर्ति के लिए हैं अलग शिवलिंग
पार्थिव शिवलिंग हर कार्य सिद्धि के लिए।

2. गुड़ के शिवलिंग प्रेम पाने के लिए।

3. भस्म से बने शिवलिंग सर्वसुख की प्राप्ति के लिए।

4. जौ या चावल या आटे के शिवलिंग दाम्पत्य सुख, संतान प्राप्ति के लिए।

5. दही से बने शिवलिंग ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए।

6. पीतल, कांसी के शिवलिंग मोक्ष प्राप्ति के लिए।

7. सीसा इत्यादि के शिवलिंग शत्रु संहार के लिए।

8. पारे के शिवलिंग अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष के लिए।

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पूजन में रखे इन बातों का ध्यान:–

1. सावन के महीने में शिवलिंग की करें पूजा शिवलिंग जहां स्थापित हो पूरव् दिशा की ओर मुख करके नहीं बैठें।

2. शिवलिंग के दक्षिण दिशा में ही बैठकर पूजन करें।

ये होता है अभिषेक का फल:–

1. दूध से अभिषेक करने पर परिवार में कलह, मानसिक पीड़ा में शांति मिलती है।

2. घी से अभिषेक करने पर वंशवृद्धि होती है।

3. इत्र से अभिषेक करने पर भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है।

4. जलधारा से अभिषेक करने पर मानसिक शान्ति मिलती है।

5. शहद से अभिषेक करने पर परिवार में बीमारियों का अधिक प्रकोप नहीं रहता।

6. गन्ने के रस की धारा डालते हुये अभिषेक करने से आर्थिक समृद्धि व परिवार में सुखद माहौल बना रहता है।

7. गंगा जल से अभिषेक करने पर चारो पुरूषार्थ की प्राप्ति होती है।

8. अभिषेक करते समय महामृत्युंजय का जाप करने से फल की प्राप्ति कई गुना अधिक हो जाती है।

9. सरसों के तेल से अभिषेक करने से शत्रुओं का शमन होता।

Panch Mukhi/ Five Faced Rudraksha

ये भी मिलते हैं फल:–

9. बिल्वपत्र चढ़ाने से जन्मान्तर के पापों व रोग से मुक्ति मिलती है।

10. कमल पुष्प चढ़ाने से शान्ति व धन की प्राप्ति होती है।

11. कुशा चढ़ाने से मुक्ति की प्राप्ति होती है।

12. दूर्वा चढ़ाने से आयु में वृद्धि होती है।

13. धतूरा अर्पित करने से पुत्र रत्न की प्राप्ति व पुत्र का सुख मिलता है।

14. कनेर का पुष्प चढ़ाने से परिवार में कलह व रोग से निवृत्ति मिलती हैं।

15. शमी पत्र चढ़ाने से पापों का नाश होता, शत्रुओं का शमन व भूत-प्रेत बाधा से मुक्ति मिलती है।
हर हर महादेव।।ॐ उमा महेश्वराय नमः।।ॐ नमो नमः।।

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