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त्रिपिंडी श्राद्ध क्या है…?

त्रिपिंडी श्राद्ध का अर्थ है पिछली तीन पीढ़ियों के हमारे पूर्वजों के पिंड दान।

अगर पिछली तीन पीढ़ियों से परिवार में यदि किसी का भी बहुत कम उम्र या बुढ़ापे में निधन हो गया हो।

तो वे लोग हमारे लिए समस्या पैदा करते हैं।

उन लोगों को मुक्त अथवा उनकी आत्मा की शांति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध करना पड़ता है।

प्रियजनों लोगों की याद में त्रिपिंडी श्राद्ध एक योगदान मन जाता है ।

ऐसा माना जाता है की यदि लगातार तीन वर्षों तक यह योगदान नहीं किया गया तो वे प्रियजन (मृतक) क्रोधित हो जाते है ।

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इसलिए उन्हें शांत करने के लिए ये योगदान किए जाते हैं।

अधिकांश लोगों का विचार है कि त्रिपिंडी का अर्थ है 3 पीढ़ी के पूर्वजों (पिता-माता, दादाजी-दादी और परदादा- परदादी ) को संतुष्ट करना।

लेकिन यह 3 पीढ़ियों के साथ प्रकट नहीं होता है। अपितु वे तीन  ‘अस्मदकुले’, ‘मातमहा’, भ्राता  पक्ष , ससुराल पक्ष और शिक्षक पक्ष का संकेत देते हैं।

कोई भी आत्मा जो अपने जीवन में शांत नहीं है और शरीर छोड़ चुकी है, भविष्य की पीढ़ियों को परेशान करती है।

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ऐसी आत्मा को ‘त्रिपिंडी श्राद्ध’ की सहायता से मोक्ष की प्राप्ति करवाई जा सकती  है।

श्राद्ध का उद्देस्य पूर्वजों के लिए उनके अपने वंशजों द्वारा ईमानदारी से किया गया अनुष्ठान है।

त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा

त्रिपिंडी श्राद्ध एक ऐसा अनुष्ठान है जो परिचित और भौतिक चीजों की तरह कुछ हासिल करने के लिए किया जाता है।

इसलिए त्रिपिंडी श्राद्ध को “काम्य श्राद्ध” कहा जाता है। श्राद्धकर्मकर्ता शास्त्र के अनुसार, यह कहा जाता है कि पुरखों का श्राद्ध एक वर्ष में 72 बार किया जाना चाहिए।

यदि श्राद्ध कई वर्षों तक नहीं किया जाता है तो (माता -पिता, दादा -दादी ) पूर्वजों की आत्मा दुखी रहती है।

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प्रत्येक व्यक्ति को अपने पूर्वजों का श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। यदि श्राद्ध अनुष्ठान नहीं किया जाता हैतो।

वंशज को पूर्वज दोष के कारण विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है ।

और इस प्रकार के दोष “त्रिपिंडी श्राद्ध” से अनुष्ठान करना पड़ता है।

साथ ही उसी श्राद्ध को पारंपरिक रूप से गन्धर्व, शाकिनी।

जैसे डाकिनी आदि के भूतों के अत्याचारों से मुक्त होने के लिए भी किया जाता है।

पारंपरिक रूप से त्रिपिंडी श्राद्ध का अनुष्ठान करने का उद्देस्य है

कि घर में लड़ाई, शांति की कमी, अक्सर बीमारियों का कारण पुरुषत्व की भावना पैदा करते हैं। असफलता, असामयिक मृत्यु, इच्छा की पूर्ति न होना।

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व्यावसायिक समृद्धि की कमी, उचित अवधि तक शादी न होना और बांझपन आदि जैसी समस्याओं का हल निकलन हैं।

त्रिपिंडी अनुष्ठान पूजा (Tripindi Shraddha Puja)

त्रिपिंडी श्राद्ध अनुष्ठान में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान रुद्र(शिव) की भक्तिपूर्वक पूजा की जाती है।

भगवान ब्रम्हा, विष्णु और रुद्र क्रमशः सम्माननीय, राजसी और गर्म स्वभाव के प्रतिनिधि हैं।

नैतिक पूवजों की आत्माओं के कष्ट से राहत पाने के लिए भगवान ब्रह्मदेव की पूजा की जाती है और जौ का आटा अर्पित किया जाता  है ।

शाही पूर्वजों की आत्माओं के कष्ट से राहत पाने के लिए भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और चावल का आटा  अर्पित किया जाता है ।

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और साथ ही गर्म स्वभाव वाले पूर्वजों की आत्माओं के कष्ट से छुटकारा पाने के लिए भगवान रुद्र की पूजा की जाती है।

तिल की गांठका आटा अर्पित किया जाता।

जिस व्यक्ति का बचपन, युवावस्था और वृद्धावस्था में निधन हो जाता है और उनकी आत्मा संतुष्ट नहीं होती है ।

उसी अवस्था में सम्मानित आत्मा को मोक्ष प्राप्त करने के लिए, वही त्रिपिंडी श्राद्ध अनुष्ठान करना चाहिए।

उसी अनुष्ठान में पूर्वजों के नाम और “गोत्र” का नाम नहीं उच्चरित किया जाता है क्योंकि हमें इस बात का कोई सही ज्ञान नहीं है ।

कि हम किन पूर्वजों के दुख से पीड़ित हैं और किन पूर्वजों की आत्मा दुखी है।

तो हमारे पूर्वजों की हर असंतुष्ट आत्मा को मुक्ति दिलाने के  लिए ।

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“त्रिपिंडी श्राद्ध” अनुष्ठान धर्मशास्त्र के अनुसार किया जाता है।

ऐसी विपदाओं के निवारण के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। इसकी पुष्टि “श्राद्ध चिंतामणि” में की गई है।

त्रिपिंडी श्राद्ध विधि (Tripindi Shraddha Puja)

आम तौर पर जब एक अधेड़ उम्र या वृद्ध इंसान का निधन हो जाता है ।

तो लोग उसका पिंड दान, श्राद्ध और अन्य सभी अनुष्ठान करते हैं।

लेकिन अगर कोई छोटा बच्चा या युवा गुजर जाता है तो सभी रस्में नहीं की जाती हैं।

यह उनकी आत्माओं को एक दुष्चक्र में डालता है और यह हमारे लिए कठिनाइयों का कारण बनता है।

और इसलिए त्रिपिंडी श्राद्ध को इन आत्माओं को मुक्त करने और स्वर्ग की ओर भेजने के लिए किया जाना चाहिए।

उनकी पुण्यतिथि पर हर साल उचित श्राद्ध करना बहुत आवश्यक है।

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दूसरी बात, भाद्रपद माह के पितृपक्ष में पारिवारिक श्राद्ध करना होता है। ये अनुष्ठान सम्वत्सरिक श्राद्ध और महालया श्राद्ध हैं।

यदि दोनों श्राद्ध तीन क्रम वर्षों तक लगातार नहीं किए जाते हैं ।

तो यह वर्तमान में पितृदोष का कारण बनता है।

इसके अतिरिक्त , यह हमारे पूर्वजों की आत्माओं को दर्द और समस्याओं का कारण बनता है ।

और वे प्रेता योनी या आत्माओं के दायरे में प्रवेश करते हैं।

नतीजतन, वे हमारे वर्तमान जीवन में मुद्दों का कारण बनते हैं ।

क्योंकि हमारे पूर्वज हमारे माध्यम से मोक्ष की उम्मीद करते हैं।

इस स्थिति को पितृदोष कहा जाता है।

त्रिपिंडी पूजा कौन करे ? (Tripindi Shraddha Puja)

इस दोष से मुक्ति  पाने का एक तरीका यह है कि हमारे पवित्र ग्रंथों में बताए अनुसार त्रिपिंडी श्राद्ध करें।

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जिस व्यक्ति की कुंडली में इस प्रकार का दोष पाया जाता है, उसे त्रिपिंडी श्राद्ध करना चाहिए।

विवाहित और अविवाहित दोनों ही त्रिपिंडी श्राद्ध कर सकते हैं।

केवल अविवाहित महिलाएं त्रिपिंडी श्राद्ध नहीं कर सकती हैं। परिवार का कोई भी व्यक्ति त्रिपिंडी श्राद्ध कर सकता है।

इस धार्मिक अनुष्ठान को एक पवित्र स्थान पर किया जाना चाहिए जिसका उद्देश्य अशांत आत्माओं को मुक्ति दिलाना है।

इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश मुख्य रूप से पूजे जाते हैं।

पृथ्वी से, आकाश से और आत्मा से, दो प्रकार के, पुण्य, कण, अनियंत्रित शिशु, युवा और वृद्ध सभी चरणों में मृत भावुक भावनाओं के साथ हानि पहुँचाते हैं।

और अंत में परंपरा और परंपराओं के अनुसार त्रिपिंडी श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

इस अनुष्ठान से पहले गंगा में अर्पण और शरीर शुद्धि के लिए पवित्र स्नान करना महत्वपूर्ण है।

यहाँ स्केहुर महत्वपूर्ण नहीं है। चूँकि शेखर अभिव्यक्ति का हिस्सा है, त्रिपिंडी संस्कार पत्नी के साथ किया जाना चाहिए है।

यह संस्कार आप यदि अविवाहित हैं या विधुर(तलाकशुदा ) होने पर भी कर सकते हैं।

इसमें भगवान ब्रह्मा (रजत), विष्णु (स्वर्ण), रुद्र (ताम्र) व्याप्त हैं।

त्रिपिंडी श्राद्ध विधि (Tripindi Shraddha Puja)

त्रिपिंडी संस्कार महाकाल  व त्र्यंबकेश्वर  में किया जा सकता है।

प्रियजनों  को भेंट देने के इस धार्मिक कार्य में, ‘येचुकीप्रपीन पिंडयन्ते च महेश्वर’में भी इसका उल्लेख किया है।

यह काम श्राद्ध यानि अर्पण करने से आत्माएं राक्षसों से अलग हो जाता है।

नवरात्रा के उत्सव के समय यह काम श्राद्ध न करें। उसी दिन त्रिपिंडी श्राद्ध और तीर्थ श्राद्ध भी नहीं करना चाहिए।

इसे अलग-अलग दिनों में करें लेकिन अगर आपके पास समय कम है ।

तो सबसे पहले त्रिपिंडी श्राद्ध करें और फिर तीर्थ श्राद्ध करें।

इस धार्मिक अनुष्ठान को एक पवित्र स्थान पर किया जाना चाहिए जिसका उद्देश्य अशांत आत्माओं को मुक्ति दिलाना है।

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इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश मुख्य रूप से पूजे जाते हैं।

पृथ्वी से, आकाश से और आत्मा से, दो प्रकार के, पुण्य, कण, अनियंत्रित शिशु, युवा और वृद्ध सभी चरणों में मृत भावुक भावनाओं के साथ हानि पहुँचाते हैं।

और अंत में परंपरा और परंपराओं के अनुसार त्रिपिंडी श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

इस अनुष्ठान से पहले गंगा में अर्पण और शरीर शुद्धि के लिए पवित्र स्नान करना महत्वपूर्ण है। यहाँ स्केहुर महत्वपूर्ण नहीं है।

चूँकि शेखर अभिव्यक्ति का हिस्सा है, त्रिपिंडी संस्कार पत्नी के साथ किया जाना चाहिए है।

यह संस्कार आप यदि अविवाहित हैं या विधुर(तलाकशुदा ) होने पर भी कर सकते हैं।

इसमें भगवान ब्रह्मा (रजत), विष्णु (स्वर्ण), रुद्र (ताम्र) व्याप्त हैं।

त्रिपिंडी श्राद्ध करने के लाभ (Tripindi Shraddha Puja)

अन्य श्राद्ध पूजा एक विशिष्ट व्यक्ति के लिए की जाती है ।

यह पूजा पूर्वजों की तीन पीढ़ियों तक ही सीमित होती है।

अर्थात् पिता, दादा और परदादा, त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा, तीन पीढ़ियों से पूर्व के साथ-साथ पूर्वजों को भी शांत करती है।

इस प्रकार यह आग्रह किया जाता है ।

कि प्रत्येक परिवार को हर बारह वर्ष में कम से कम एक बार इस समारोह को करना चाहिए।

इसके अलावा, यदि किसी ब्यक्ति या जातक की कुंडली में परिलक्षित होता है।

या किसी के कुंडली में पितृ दोष है ।

तो यह श्राद्ध पूजा, दोषों के प्रभाव से राहत पाने के लिए सबसे महत्वापूर्ण है।

यदि हमारे पुरखे(पूर्वज ) हमसे अच्छी तरह से प्रसन्न हैं, तो वे हमें संतान, सुख और समृद्धि के रूप में आशीर्वाद देते  हैं।

हमारे पूर्वजों के आशीर्वाद को दैवीय आशीर्वाद के समान माना जाता है।

श्राद्ध पूजा के लिए (Tripindi Shraddha Puja)

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त्रिपिंडी श्राद्ध इसलिए किया जाता है ताकि मृतकों की आत्माओं को मोक्ष का मार्ग मिल जाए।

इस पूजा को करने से परिवार को पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है।

इस पूजा का मुख्य लाभ यह है कि इससे परिवार को सुख और शांति मिलती है। परिवार के सदस्य रोग मुक्त और स्वस्थ रहते हैं।

इससे परिवार को धन भी मिलता है।

यह पूजा अच्छे विवाह प्रस्तावों और योग का भाग्य भी लाती है। परिवार में कोई भी युवा अवस्था में नहीं मरता है।

यह पूजा उनके पेशेवर जीवन में प्रगति लाती है।

त्रिपिंडी श्राद्ध करने वाले लोगों को सभी 3 दुनिया में सम्मान मिलता है। और किसी को अपनी मृत्यु के बाद मोक्ष मिलता है।

अगर उसने अपने पूर्वजों के लिए इस पूजा अनुष्ठान किया है।

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Makar Sankranti Special – Acharya Dr MSD Arya https://www.astrologyofmylife.com/makar-sankranti-special/ https://www.astrologyofmylife.com/makar-sankranti-special/#respond Mon, 11 Jan 2021 06:53:09 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17731 मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात् नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात् सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया …
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मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व

शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात् नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात् सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है।

Shubh Muhurat

 

मकर संक्रांति से अग्नि तत्त्व की शुरुआत होती है और कर्क संक्रांति से जल तत्त्व की. इस समय सूर्य उत्तरायण होता है अतः इस समय किये गए जप और दान का फल अनंत गुना होता है मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है। सामान्यत: सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त फलदायक है। यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छ:-छ: माह के अन्तराल पर होती है। भारत देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित है। मकर संक्रान्ति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है अर्थात् भारत से अपेक्षाकृत अधिक दूर होता है। इसी कारण यहाँ पर रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है। किन्तु मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतएव इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गरमी का मौसम शुरू हो जाता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अन्धकार कम होगा। अत: मकर संक्रान्ति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्य शक्ति में वृद्धि होगी।

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मकर संक्रांं‍ति पूजा व‍िध‍ि (Makar Sankranti Special – Acharya Dr MSD Arya)

भविष्यपुराण के अनुसार सूर्य के उत्तरायण के दिन संक्रांति व्रत करना चाहिए। पानी में तिल मिलाकार स्नान करना चाहिए। अगर संभव हो तो गंगा स्नान करना चाहिए। इस द‍िन तीर्थ स्थान या पवित्र नदियों में स्नान करने का महत्व अधिक है।इसके बाद भगवान सूर्यदेव की पंचोपचार विधि से पूजा-अर्चना करनी चाहिए इसके बाद यथा सामर्थ्य गंगा घाट अथवा घर मे ही पूर्वाभिमुख होकर यथा सामर्थ्य गायत्री मन्त्र अथवा सूर्य के इन मंत्रों का अधिक से अधिक जाप करना चाहिये।

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मन्त्र

१- ऊं सूर्याय नम: ऊं आदित्याय नम: ऊं सप्तार्चिषे नम:

२- ऋड्मण्डलाय नम: , ऊं सवित्रे नम: , ऊं वरुणाय नम: , ऊं सप्तसप्त्ये नम: , ऊं मार्तण्डाय नम: , ऊं विष्णवे नम:

पूजा-अर्चना में भगवान को भी तिल और गुड़ से बने सामग्रियों का भोग लगाएं। तदोपरान्त ज्यादा से ज्यादा भोग प्रसाद बांटे।

इसके घर में बनाए या बाजार में उपलब्ध तिल के बनाए सामग्रियों का सेवन करें। इस पुण्य कार्य के दौरान किसी से भी कड़वे बोलना अच्छा नहीं माना गया है।

Horoscope

 

मकर संक्रांति पर अपने पितरों का ध्यान और उन्हें तर्पण जरूर देना चाहिए।

राशि के अनुसार दान योग्य वस्तु (Makar Sankranti Special – Acharya Dr MSD Arya)

मेष       – गुड़, मूंगफली दाने एवं तिल का दान करें।
वृषभ    – सफेद कपड़ा, दही एवं तिल का दान करें।
मिथुन   – मूंग दाल, चावल एवं कंबल का दान करें।
कर्क     – चावल, चांदी एवं सफेद तिल का दान करें।
सिंह     –  तांबा, गेहूं एवं सोने के मोती का दान करें।
कन्या   –  खिचड़ी, कंबल एवं हरे कपड़े का दान करें।
तुला     –  सफेद डायमंड, शकर एवं कंबल का दान करें।
वृश्चिक  –  मूंगा, लाल कपड़ा एवं तिल का दान करें।
धनु      –  पीला कपड़ा, खड़ी हल्दी एवं सोने का मोती दान करें।
मकर  –  काला कंबल, तेल एवं काली तिल दान करें।
कुंभ    –  काला कपड़ा, काली उड़द, खिचड़ी एवं तिल दान करें।
मीन   –   रेशमी कपड़ा, चने की दाल, चावल एवं तिल दान करें।

2021 Rashi Fal – Acharya Arya – Moksha Mukti

कुछ अन्य उपाय (Makar Sankranti Special – Acharya Dr MSD Arya)

सूर्य और शनि का सम्बन्ध इस पर्व से होने के कारण यह काफी महत्वपूर्ण है
कहते हैं इसी त्यौहार पर सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने के लिए आते हैं
आम तौर पर शुक्र का उदय भी लगभग इसी समय होता है इसलिए यहाँ से शुभ कार्यों की शुरुआत होती है
अगर कुंडली में सूर्य या शनि की स्थिति ख़राब हो तो इस पर्व पर विशेष तरह की पूजा से उसको ठीक कर सकते हैं
जहाँ पर परिवार में रोग कलह तथा अशांति हो वहां पर रसोई घर में ग्रहों के विशेष नवान्न से पूजा करके लाभ लिया जा सकता है
पहली होरा में स्नान करें,सूर्य को अर्घ्य दें
श्रीमदभागवद के एक अध्याय का पाठ करें,या गीता का पाठ करें
मनोकामना संकल्प कर नए अन्न,कम्बल ठ घी का दान करें
लाल फूल और अक्षत डाल कर सूर्य को अर्घ्य दें
सूर्य के बीज मंत्र का जाप करें
मंत्र “ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः”
संध्या काल में अन्न का सेवन न करें
तिल और अक्षत डाल कर सूर्य को अर्घ्य दें
शनि देव के मंत्र का जाप करें
मंत्र “ॐ प्रां प्री प्रौं सः शनैश्चराय नमः”
घी,काला कम्बल और लोहे का दान करें।

2021 – Hindu fasts festivals and dates

 

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Diwali Laxmi Pujan Samagri: ये है दिवाली की पूजन सामग्री लिस्ट, पहले ही कर लें तैयारी और जान लें गणेश-लक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त https://www.astrologyofmylife.com/diwali-2020-laxmi-puja-samagri-full-list-for-ganesh-laxmi-pujan-and-subh-muhurat-acharya-arya/ https://www.astrologyofmylife.com/diwali-2020-laxmi-puja-samagri-full-list-for-ganesh-laxmi-pujan-and-subh-muhurat-acharya-arya/#respond Fri, 06 Nov 2020 10:01:58 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17413 दीपों का त्योहार दिवाली कार्तिक मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है। दिवाली पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। मान्यता है कि दीपावली पर मां लक्ष्मी और श्री गणेश पूजन से शांति, तरक्की और समृद्धि का वरदान प्राप्त होता है। दिवाली पर हर व्यक्ति माता लक्ष्मी और भगवान गणेश …
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दीपों का त्योहार दिवाली कार्तिक मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है। दिवाली पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। मान्यता है कि दीपावली पर मां लक्ष्मी और श्री गणेश पूजन से शांति, तरक्की और समृद्धि का वरदान प्राप्त होता है। दिवाली पर हर व्यक्ति माता लक्ष्मी और भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए पूरे विधि-विधान से पूजा करना चाहता है। इनकी पूजा में कोई कमी न रह जाए इसके लिए पहले से दीपावली पूजन सामग्री का इंतजाम कर लें। देखें यहां सामग्री लिस्ट-

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दिवाली पूजा की सामग्री (Diwali Pujan Samagri)-

मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमा, रोली, कुमुकम, अक्षत (चावल), पान, सुपारी, नारियल, लौंग, इलायची, धूप, कपूर, अगरबत्तियां, मिट्टी, दीपक, रूई, कलावा, शहद, दही, गंगाजल, गुड़, धनिया, फल, फूल, जौ, गेहूं, दूर्वा, चंदन, सिंदूर, पंचामृत, दूध, मेवे, खील, बताशे, जनेऊ, श्वेस वस्त्र, इत्र, चौकी, कलश, कमल गट्टे की माला, शंख, आसन, थाली. चांदी का सिक्का, चंदन, बैठने के लिए आसन, हवन कुंड, हवन सामग्री, आम के पत्ते प्रसाद।

Shri Ganpati Ganesh Yantra

 

दिवाली पर लक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त (Diwali Laxmi Pujan Subh Muhurat)-

 इस शुभ मुहूर्त के समय लक्ष्मी और गणेश पूजा की जा सकती है।

Shree Kuber Yantra

 

दिवाली पर क्यों की जाती है लक्ष्मी जी की पूजा? एक साहूकार की बेटी से जुड़ी है पौराणिक कथा, पढ़ें यहां

पढ़ें दिवाली की पौराणिक कथा-

एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक गांव में साहूकार रहता था। उसकी बेटी हर दिन पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाने के लिए जाती थी। जिस पीपल के पेड़ पर वह जल चढ़ाती थी, उस पेड़ पर मां लक्ष्मी का वास था। एक दिन लक्ष्मीजी ने साहूकार की बेटी से कहा कि वह उसकी मित्र बनना चाहती हैं। लड़की ने जवाब में कहा कि वह अपने पिता से पूछकर बताएगी। घर आकर साहूकार की बेटी ने पूरी बात बताई। बेटी की बात सुनकर साहूकार ने हां कर दी। दूसरे दिन साहूकार की बेटी ने लक्ष्मीजी को सहेली बना लिया।

Shri Guru Yantra

 

दोनों अच्छी सखियों की तरह एक-दूसरे से बातें करतीं। एक दिन लक्ष्मीजी साहूकार की बेटी को अपने घर ले आईं। लक्ष्मी जी ने अपने घर में साहूकार की बेटी का खूब आदर किया और पकवान परोसे। जब साहूकार की बेटी अपने घर लौटने लगी तो लक्ष्मीजी ने उससे पूछा कि वह उन्हें कब अपने घर बुलाएगी। साहूकार की बेटी ने लक्ष्मी जी को अपने घर बुला लिया, लेकिन आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण वह स्वागत करने में घबरा रही थी कि क्या वह अच्छे तरह से स्वागत कर पाएगी।

Horoscope

साहूकार अपनी बेटी की मनोदशा को समझ गया। उसने बेटी को समझाते हुए कहा कि वह परेशान न हो और फौरन घर की साफ-सफाई कर चौका मिट्टी से लगा दे। चार बत्ती वाला दीया लक्ष्मी जी के नाम से जलाने के लिए भी साहूकार ने अपनी बेटी से कहा। उसी समय एक चील किसी रानी का नौलखा हार लेकर साहूकार के घर आ गया। साहूकार की बेटी ने उस हार को बेचकर भोजन की तैयारी की। थोड़ी ही देर में मां लक्ष्मी भगवान गणेश के साथ साहूकार के घर आईं और साहूकार के स्वागत से प्रसन्न होकर उसपर अपनी कृपा बरसाई। लक्ष्मी जी की कृपा से साहूकार के पास किसी चीज की फिर कभी कमी न हुई।

(इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)

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Detailed story of Lord Sri Jagannath Ji https://www.astrologyofmylife.com/detailed-story-of-lord-sri-jagannath-ji/ https://www.astrologyofmylife.com/detailed-story-of-lord-sri-jagannath-ji/#respond Fri, 03 Jul 2020 19:07:49 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17188 एक बार भगवान श्री कृष्ण सो रहे थे और निद्रावस्था में उनके मुख से राधा जी का नाम निकला. पटरानियों को लगा कि वह प्रभु की इतनी सेवा करती है परंतु प्रभु सबसे ज्यादा राधा जी का ही स्मरण रहता है। रुक्मिणी जी एवं अन्य रानियों ने रोहिणी जी से राधा रानी व श्री कृष्ण …
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एक बार भगवान श्री कृष्ण सो रहे थे और निद्रावस्था में उनके मुख से राधा जी का नाम निकला. पटरानियों को लगा कि वह प्रभु की इतनी सेवा करती है परंतु प्रभु सबसे ज्यादा राधा जी का ही स्मरण रहता है।

रुक्मिणी जी एवं अन्य रानियों ने रोहिणी जी से राधा रानी व श्री कृष्ण के प्रेम व ब्रज-लीलाओं का वर्णन करने की प्रार्थना की. माता ने कथा सुनाने की हामी तो भर दी लेकिन यह भी कहा कि श्री कृष्ण व बलराम को इसकी भनक न मिले।

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तय हुआ कि सभी रानियों को रोहिणी जी एक गुप्त स्थान पर कथा सुनाएंगी. वहां कोई और न आए इसके लिए सुभद्रा जी को पहरा देने के लिए मना लिया गया।

सुभद्रा जी को आदेश हुआ कि स्वयं श्री कृष्ण या बलराम भी आएं तो उन्हें भी अंदर न आने देना. माता ने कथा सुनानी आरम्भ की. सुभद्रा द्वार पर तैनात थी. थोड़ी देर में श्री कृष्ण एवं बलराम वहां आ पहुंचे. सुभद्रा ने अन्दर जाने से रोक लिया।

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इससे भगवान श्री कृष्ण को कुछ संदेह हुआ. वह बाहर से ही अपनी सूक्ष्म शक्ति द्वारा अन्दर की माता द्वारा वर्णित ब्रज लीलाओं को आनंद लेकर सुनने लगे. बलराम जी भी कथा का आनंद लेने लगे।

कथा सुनते-सुनते श्री कृष्ण, बलराम व सुभद्रा के हृदय में ब्रज के प्रति अद्भुत प्रेम भाव उत्पन्न हुआ. उस भाव में उनके पैर-हाथ सिकुड़ने लगे जैसे बाल्य काल में थे. तीनों राधा जी की कथा में ऐसे विभोर हुए कि मूर्ति के समान जड़ प्रतीत होने लगे।

बड़े ध्यान पूर्वक देखने पर भी उनके हाथ-पैर दिखाई नहीं देते थे. सुदर्शन ने भी द्रवित होकर लंबा रूप धारण कर लिया. उसी समय देवमुनि नारद वहां आ पहुंचे. भगवान के इस रूप को देखकर आश्चर्यचकित हो गए और निहारते रहे।

कुछ समय बाद जब तंद्रा भंग हुई तो नारद जी ने प्रणाम करके भगवान श्री कृष्ण से कहा- हे प्रभु ! मेरी इच्छा है कि मैंने आज जो रूप देखा है, वह रूप आपके भक्त जनों को पृथ्वी लोक पर चिर काल तक देखने को मिले. आप इस रूप में पृथ्वी पर वास करें।

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भगवान श्री कृष्ण नारद जी की बात से प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि ऐसा ही होगा. कलिकाल में मैं इसी रूप में नीलांचल क्षेत्र में अपना स्वरूप प्रकट करुंगा।

कलियुग आगमन के उपरांत प्रभु की प्रेरणा से मालव राज इन्द्रद्युम्न ने भगवान श्री कृष्ण, बलभद्र जी और बहन सुभद्रा जी की ऐसी ही प्रतिमा जगन्नाथ मंदिर में स्थापित कराई. यह रोचक कथा आगे पड़े।

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राजा इन्द्रद्युम्न श्रेष्ठ प्रजा पालक राजा थे. प्रजा उन्हें बहुत प्रेम करती थी. प्रजा सुखी और संतुष्ट थी. राजा के मन में इच्छा थी कि वह कुछ ऐसा करे जिससे सभी उन्हें स्मरण रखें।

दैवयोग से इंद्रद्युम्न के मन में एक अज्ञात कामना प्रगट हुई कि वह ऐसा मंदिर का निर्माण कराएं जैसा दुनिया में कहीं और न हो. इंद्रद्युम्न विचारने लगे कि आखिर उनके मंदिर में किस देवता की मूर्ति स्थापित करें।

राजा के मन में यही इच्छा और चिंतन चलने लगा. एक रात इसी पर गंभीर चिंतन करते सो गए. नीद में राजा ने एक सपना देखा. सपने में उन्हें एक देव वाणी सुनाई पड़ी।

इंद्रद्युम्न ने सुना- राजा तुम पहले नए मंदिर का निर्माण आरंभ करो. मूर्ति विग्रह की चिंता छोड़ दो. उचित समय आने पर तुम्हें स्वयं राह दिखाई पड़ेगी. राजा नीद से जाग उठे. सुबह होते ही उन्होंने अपने मंत्रियों को सपने की बात बताई।

Horoscope

राज पुरोहित के सुझाव पर शुभ मुहूर्त में पूर्वी समुद्र तट पर एक विशाल मंदिर के निर्माण का निश्चय हुआ. वैदिक-मंत्रोचार के साथ मंदिर निर्माण का श्रीगणेश हुआ।

राजा इंद्रद्युम्न के मंदिर बनवाने की सूचना शिल्पियों और कारीगरों को हुई. सभी इसमें योगदान देने पहुंचे. दिन रात मंदिर के निर्माण में जुट गए. कुछ ही वर्षों में मंदिर बनकर तैयार हुआ।

सागर तट पर एक विशाल मंदिर का निर्माण तो हो गया परंतु मंदिर के भीतर भगवान की मूर्ति की समस्या जस की तस थी. राजा फिर से चिंतित होने लगे. एक दिन मंदिर के गर्भगृह में बैठकर इसी चिंतन में बैठे राजा की आंखों से आंसू निकल आए।

राजा ने भगवान से विनती की- प्रभु आपके किस स्वरूप को इस मंदिर में स्थापित करूं इसकी चिंता से व्यग्र हूं. मार्ग दिखाइए. आपने स्वप्न में जो संकेत दिया था उसे पूरा होने का समय कब आएगा ? देव विग्रह विहीन मंदिर देख सभी मुझ पर हंसेंगे।

राजा की आंखों से आंसू झर रहे थे और वह प्रभु से प्रार्थना करते जा रहे थे- प्रभु आपके आशीर्वाद से मेरा बड़ा सम्मान है. प्रजा समझेगी कि मैंने झूठ-मूठ में स्वप्न में आपके आदेश की बात कहकर इतना बड़ा श्रम कराया. हे प्रभु मार्ग दिखाइए।

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राजा दुखी मन से अपने महल में चले गए. उस रात को राजा ने फिर एक सपना देखा. सपने में उसे देव वाणी सुनाई दी- राजन ! यहां निकट में ही भगवान श्री कृष्ण का विग्रह रूप है. तुम उन्हें खोजने का प्रयास करो, तुम्हें दर्शन मिलेंगे।

इन्द्रद्युम्न ने स्वप्न की बात पुनः पुरोहित और मंत्रियों को बताई. सभी यह निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्रभु की कृपा सहज प्राप्त नहीं होगी. उसके लिए हमें निर्मल मन से परिश्रम आरंभ करना होगा।

भगवान के विग्रह का पता लगाने की जिम्मेदारी राजा इंद्रद्युम्न ने चार विद्वान पंडितों को सौंप दिया. प्रभु इच्छा से प्रेरित होकर चारों विद्वान चार दिशाओं में निकले।

उन चारों में एक विद्वान थे विद्यापति. वह चारों में सबसे कम उम्र के थे. प्रभु के विग्रह की खोज के दौरान उनके साथ बहुत से अलौकिक घटनाएं हुई।

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प्रभु का विग्रह किसे मिला ? यह प्रसंग आगे पढ़ें।

पंडित विद्यापति पूर्व दिशा की ओर चले. कुछ आगे चलने के बाद विद्यापति उत्तर की ओर मुडे तो उन्हें एक जंगल दिखाई दिया. वन भयावह था. विद्यापति श्री कृष्ण के उपासक थे. उन्होंने श्री कृष्ण का स्मरण किया और राह दिखाने की प्रार्थना की।

भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से उन्हें राह दिखने लगी. प्रभु का नाम लेते वह वन में चले जा रहे थे. जंगल के मध्य उन्हें एक पर्वत दिखाई दिया. पर्वत के वृक्षों से संगीत की ध्वनि सा सुरम्य गीत सुनाई पड़ रहा था।

विद्यापति संगीत के जान कार थे. उन्हें वहां मृदंग, बंसी और करताल की मिश्रित ध्वनि सुनाई दे रही थी. यह संगीत उन्हें दिव्य लगा. संगीत की लहरियों को खोजते विद्यापति आगे बढ़ चले।

वह जल्दी ही पहाड़ी की चोटी पर पहुंच गए. पहाड़ के दूसरी ओर उन्हें एक सुंदर घाटी दिखी जहां भील नृत्य कर रहे थे. विद्यापति उस दृश्य को देखकर मंत्र मुग्ध थे. सफर के कारण थके थे पर संगीत से थकान मिट गयी और उन्हें नींद आने लगी।

अचानक एक बाघ की गर्जना सुनकर विद्यापति घबरा उठे. बाघ उनकी और दौड़ता आ रहा था. बाघ को देखकर विद्यापति घबरा गए और बेहोश होकर वहीं गिर पडे।

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बाघ विद्यापति पर आक्रमण करने ही वाला था कि तभी एक स्त्री ने बाघ को पुकारा- बाघा..!! उस आवाज को सुनकर बाघ मौन खडा हो गया. स्त्री ने उसे लौटने का आदेश दिया तो बाघ लौट पड़ा।

बाघ उस स्त्री के पैरों के पास ऐसे लोटने लगा जैसे कोई बिल्ली पुचकार सुनकर खेलने लगती है. युवती बाघ की पीठ को प्यार से थपथपाने लगी और बाघ स्नेह से लोटता रहा।

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वह स्त्री वहां मौजूद स्त्रियों में सर्वाधिक सुंदर थी. वह भीलों के राजा विश्वावसु की इकलौती पुत्री ललिता थी. ललिता ने अपनी सेविकाओं को अचेत विद्यापति की देखभाल के लिए भेजा।

सेविकाओं ने झरने से जल लेकर विद्यापति पर छिड़का. कुछ देर बाद विद्यापति की चेतना लौटी. उन्हें जल पिलाया गया. विद्यापति यह सब देख कर कुछ आश्चर्य में थे।

ललिता विद्यापति के पास आई और पूछा- आप कौन हैं और भयानक जानवरों से भरे इस वन में आप कैसे पहुंचे. आपके आने का प्रयोजन बताइए ताकि मैं आपकी सहायता कर सकूं।

विद्यापति के मन से बाघ का भय पूरी तरह गया नहीं था. ललिता ने यह बात भांप ली और उन्हें सांत्वना देते हुए कहा- विप्रवर आप मेरे साथ चलें. जब आप स्वस्थ हों तब अपने लक्ष्य की ओर प्रस्थान करें।

विद्यापति ललिता के पीछे-पीछे उनकी बस्ती की तरफ चल दिए. विद्यापति भीलों के पाजा विश्वावसु से मिले और उन्हें अपना परिचय दिया. विश्वावसु विद्यापति जैसे विद्वान से मिलकर बड़े प्रसन्नता हुए।

विश्वावसु के अनुरोध पर विद्यापति कुछ दिन वहां अतिथि बनकर रूके. वह भीलों को धर्म और ज्ञान का उपदेश देने लगे. उनके उपदेशों को विश्वावसु तथा ललिता बड़ी रूचि के साथ सुनते थे. ललिता के मन में विद्यापति के लिए अनुराग पैदा हो गया।

विद्यापति ने भी भांप लिया कि ललिता जैसी सुंदरी को उनसे प्रेम हो गया है किंतु विद्यापति एक बड़े कार्य के लिए निकले थे. अचानक एक दिन विद्यापति बीमार हो गए. ललिता ने उसकी सेवा सुश्रुषा की।

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इससे विद्यापति के मन में भी ललिता के प्रति प्रेम भाव पैदा हो गया. विश्वावसु ने प्रस्ताव रखा की विद्यापति ललिता से विवाह कर ले. विद्यापति ने इसे स्वीकार कर लिया।

कुछ दिन दोनों के सुखमय बीते. ललिता से विवाह करके विद्यापति प्रसन्न तो था पर जिस महत्व पूर्ण कार्य के लिए वह आए थे, वह अधूरा था। यही चिंता उन्हें बार बार सताती थी।

इस बीच विद्यापति को एक विशेष बात पता चली. विश्वावसु हर रोज सवेरे उठ कर कहीं चला जाता था और सूर्योदय के बाद ही लौटता था. कितनी भी विकट स्थिति हो उसका यह नियम कभी नहीं टूटता था।

विश्वावसु के इस व्रत पर विद्यापति को आश्चर्य हुआ. उनके मन में इस रहस्य को जानने की इच्छा हुई. आखिर विश्वावसु जाता कहां है. एक दिन विद्यापति ने ललिता से इस सम्बन्ध में पूछा. ललिता यह सुनकर सहम गई।

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आखिर वह क्या रहस्य था ? क्या वह रहस्य विद्यापति के कार्य में सहयोगी था या विद्यापति पत्नी के प्रेम में मार्ग भटक गए. यह प्रसंग आगे पढ़ें

विद्यापति ने ललिता से उसके पिता द्वारा प्रतिदिन सुबह किसी अज्ञात स्थान पर जाने और सूर्योदय के पूर्व लौट आने का रहस्य पूछा. विश्ववासु का नियम किसी हाल में नहीं टूटता था चाहे कितनी भी विकट परिस्थिति हो।

ललिता के सामने धर्म संकट आ गया. वह पति की बात को ठुकरा नहीं सकती थी लेकिन पति जो पूछ रहा था वह उसके वंश की गोपनीय परंपरा से जुड़ी बात थी जिसे खोलना संभव नहीं था।

ललिता ने कहा- स्वामी ! यह हमारे कुल का रहस्य है जिसे किसी के सामने खोला नहीं जा सकता परंतु आप मेरे पति हैं और मैं आपको कुल का पुरुष मानते हुए जितना संभव है उतना बताती हूं।

यहां से कुछ दूरी पर एक गुफा है जिसके अन्दर हमारे कुल देवता हैं. उनकी पूजा हमारे सभी पूर्वज करते आए हैं. यह पूजा निर्बाध चलनी चाहिए. उसी पूजा के लिए पिता जी रोज सुबह नियमित रूप से जाते हैं।

विद्यापति ने ललिता से कहा कि वह भी उनके कुल देवता के दर्शन करना चाहते हैं. ललिता बोली- यह संभव नहीं. हमारे कुल देवता के बारे में किसी को जानने की इच्छा है, यह सुनकर मेरे पिता क्रोधित हो जाएंगे।

विद्यापति की उत्सुक्ता बढ़ रही थी. वह तरह-तरह से ललिता के अपने प्रेम की शपथ देकर उसे मनाने लगे. आखिर कार ललिता ने कहा कि वह अपने पिता जी से विनती करेगी कि वह आपको देवता के दर्शन करा दें।

ललिता ने पिता से सारी बात कही. वह क्रोधित हो गए. ललिता ने जब यह कहा कि मैं आपकी अकेली संतान हूं. आपके बाद देवता के पूजा का दायित्व मेरा होगा. इसलिए मेरे पति का यह अधिकार बनता है क्योंकि आगे उसे ही पूजना होगा।

विश्वावसु इस तर्क के आगे झुक गए. वह बोले- गुफा के दर्शन किसी को तभी कराए जा सकते हैं जब वह भगवान की पूजा का दायित्व अपने हाथ में ले ले. विद्यापति ने दायित्व स्वीकार किया तो विश्वावसु देवता के दर्शन कराने को राजी हुए।

दूसरे दिन सूर्योदय से पूर्व विद्यापति की आंखों पर पट्टी बांधकर विश्वावसु उनका दाहिना हाथ पकड़ कर गुफा की तरफ निकले. विद्यापति ने मुट्ठी में सरसों रख लिया था जिसे रास्ते में छोड़ते हुए गए।

गुफा के पास पहुंचकर विश्वावसु रुके और गुफा के पास पहुंच गए. विश्वावसु ने विद्यापति के आँखों की काली पट्टी खोल दी. उस गुफा में नीले रंग का प्रकाश चमक उठा. हाथों में मुरली लिए भगवान श्री कृष्ण का रूप विद्यापति को दिखाई दिया।

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विद्यापति आनंद मग्न हो गए. उन्होंने भगवान के दर्शन किए. दर्शन के बाद तो जैसे विद्यापति जाना ही नहीं चाहते थे. पर विश्वावसु ने लौटने का आदेश दिया. फिर उनकी आंखों पर पट्टी बांधी और दोनों लौट पड़े।

लौटने पर ललिता ने विद्यापति से पूछा. विद्यापति ने गुफा में दिखे अलौकिक दृश्य के बारे में पत्नी को बताना भी उसने उचित नहीं समझा. वह टाल गए. यह तो जानकारी हो चुकी थी कि विश्वावसु श्री कृष्ण की मूर्ति की पूजा करते हैं।

विद्यापति को आभास हो गया कि महाराज ने स्वप्न में जिस प्रभु विग्रह के बारे में देव वाणी सुनी थी, वह इसी मूर्ति के बारे में थी. विद्यापति विचार करने लगे कि किसी तरह इसी मूर्ति को लेकर राजधानी पहुंचना होगा।

वह एक तरफ तो गुफा से मूर्ति को लेकर जाने की सोच रहे थे दूसरी तरफ भील राज और पत्नी के साथ विश्वासघात के विचार से उनका मन व्यथित हो रहा था. विद्यापति धर्म-अधर्म के बारे में सोचता रहे।

फिर विचार आया कि यदि विश्वावसु ने सचमुच उसपर विश्वास किया होता तो आंखों पर पट्टी बांधकर गुफा तक नहीं ले जाता. इसलिए उसके साथ विश्वास घात का प्रश्न नहीं उठता. उसने गुफा से मूर्ति चुराने का मन बना लिया।

विद्यापति ने ललिता से कहा कि वह अपने माता-पिता के दर्शन करने के लिए जाना चाहता है. वे उसे लेकर परेशान होंगे. ललिता भी साथ चलने को तैयार हुई तो विद्यापति ने यह कह कर समझा लिया कि वह शीघ्र ही लौटेगा तो उसे लेकर जाएगा।

ललिता मान गई. विश्वावसु ने उसके लिए घोड़े का प्रबंध किया. अब तक सरसों के दाने से पौधे निकल आए थे. उनको देखता विद्यापति गुफा तक पहुंच गया. उसने भगवान की स्तुति की और क्षमा प्रार्थना के बाद उनकी मूर्ति उठाकर झोले में रख ली।

शाम तक वह राजधानी पहुंच गया और सीधा राजा के पास गया. उसने दिव्य प्रतिमा राजा को सौंप दी और पूरी कहानी सुनायी. राजा ने बताया कि उसने कल एक सपना देखा कि सुबह सागर में एक कुन्दा बहकर आएगा।

उस कुंदे की नक्काशी करवाकर भगवान की मूर्ति बनवा लेना जिसका अंश तुम्हें प्राप्त होने वाला है. वह भगवान श्री विष्णु का स्वरूप होगा. तुम जिस मूर्ति को लाए हो वह भी भगवान विष्णु का अंश है. दोनों आश्वस्त थे कि उनकी तलाश पूरी हो गई है।

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राजा ने कहा कि जब भगवान द्वारा भेजी लकड़ी से हम इस प्रतिमा का वड़ा स्वरूप बनवा लेंगे तब तुम अपने ससुर से मिलकर उन्हें मूर्ति वापस कर देना. उनके कुल देवता का इतना बड़ा विग्रह एक भव्य मंदिर में स्थापित देखकर उन्हें खुशी ही होगी।

दूसरे दिन सूर्योदय से पूर्व राजा विद्यापति तथा मंत्रियों को लेकर सागर तट पर पहुंचा. स्वप्न के अनुसार एक बड़ा कुंदा पानी में बहकर आ रहा था. सभी उसे देखकर प्रसन्न हुए. दस नावों पर बैठकर राजा के सेवक उस कुंदे को खींचने पहुंचे।

मोटी-मोटी रस्सियों से कुंदे को बांधकर खींचा जाने लगा लेकिन कुंदा टस से मस नहीं हुआ. और लोग भेजे गए लेकिन सैकड़ों लोग और नावों का प्रयोग करके भी कुंदे को हिलाया तक नहीं जा सका।

राजा का मन उदास हो गया. सेनापति ने एक लंबी सेना कुंदे को खींचने के लिए भेज दी. सारे सागर में सैनिक ही सैनिक नजर आने लगे लेकिन सभी मिल कर कुंदे को अपने स्थान से हिला तक न सके. सुबह से रात हो गई।

अचानक राजा ने काम रोकने का आदेश दिया. उसने विद्यापति को अकेले में ले जाकर कहा कि वह समस्या का कारण जान गया है. राजा के चेहरे पर संतोष के भाव थे. राजा ने विद्यापति को गोपनीय रूप से कहीं चलने की बात कही।

राजा इंद्रद्युम्न ने कहा कि अब भगवान का विग्रह बन जाएगा. बस एक काम करना होगा. भगवान श्री कृष्ण ने राजा को ऐसा क्या संकेत दे दिया था कि उसकी सारी परेशानी समाप्त हो गई. यह प्रसंग आगे पढ़ें।

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राजा इंद्रध्युम्न को भगवान की प्रेरणा से समझ में आने लगा कि आखिर प्रभु के विग्रह के लिए जो लकड़ी का कुंदा पानी में बह कर आया है वह हिल-डुल भी क्यों नहीं रहा।

राजा ने विद्यापति को बुलाया और कहा- तुम जिस दिव्य मूर्ति को अपने साथ लाए हो उसकी अब तक जो पूजा करता आया था उससे तुरंत भेंट करके क्षमा मांगनी होगी. बिना उसके स्पर्श किए यह कुंदा आगे नहीं बढ सकेगा।

राजा इंद्रद्युम्न और विद्यापति विश्वावसु से मिलने पहुंचे. राजा ने पर्वत की चोटी से जंगल को देखा तो उसकी सुंदरता को देखता ही रह गया. दोनों भीलों की बस्ती की ओर चुपचाप चलते रहे।

इधर विश्वावसु अपने नियमित दिनचर्या के हिसाब से गुफा में अपने कुल देवता की पूजा के लिए चले. वहां प्रभु की मूर्ति गायब देखी तो वह समझ गए कि उनके दामाद ने ही यह छल किया है।

विश्वावसु लौटे और ललिता को सारी बात सुना दी. विश्वावसु पीड़ा से भरा घर के आंगन में पछाड़ खाकर गिर गए. ललिता अपने पति द्वारा किए विश्वास घात से दुखी थी और स्वयं को इसका कारण मान रही थी. पिता-पुत्री दिन भर विलाप करते रहे।

उन दोनों ने अन्न का एक दाना भी न छुआ. अगली सुबह विश्वावसु उठे और सदा की तरह अपनी दिनचर्या का पालन करते हुए गुफा की तरफ बढ़ निकले. वह जानते थे कि प्रभु का विग्रह वहां नहीं है फिर भी उनके पैर गुफा की ओर खींचे चले जाते थे।

विश्वावसु के पीछे ललिता और रिश्तेदार भी चले. विश्वावसु गुफा के भीतर पहुंचे. जहां भगवान की मूर्ति होती थी उस चट्टान के पास खड़े होकर हाथ जोड़ कर खडे रहे. फिर उस ऊंची चट्टान पर गिर गए और बिलख–बिलख कर रोने लगे. उनके पीछे प्रजा भी रो रही थी।

एक भील युवक भागता हुआ गुफा के पास आया और बताया कि उसने महाराज और उनके साथ विद्यापति को बस्ती की ओर से आते देखा है. यह सुन कर सब चौंक उठे. विश्वावसु राजा के स्वागत में गुफा से बाहर आए लेकिन उनकी आंखों में आंसू थे।

राजा इंद्रद्युमन विश्वावसु के पास आए और उन्हें अपने हृदय से लगा लिया. राजा बोले- भीलराज, तुम्हारे कुल देवता की प्रतिमा का चोर तुम्हारा दामाद नहीं मैं हूं. उसने तो अपने महाराज के आदेश का पालन किया. यह सुन कर सब चौंक उठे।

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विश्वावसु ने राजा को आसन दिया. राजा ने उस विश्वावसु को शुरू से अंत तक पूरी बात बता कर कहा कि आखिर क्यों यह सब करना पड़ा. फिर राजा ने उनसे अपने स्वप्न और फिर जगन्नाथ पुरी में सागर तट पर मंदिर निर्माण की बात कह सुनाई।

राजा ने विश्वावसु से प्रार्थना की- भील सरदार विश्वावसु, कई पीढ़ियों से आपके वंश के लोग भगवान की मूर्ति को पूजते आए हैं. भगवान के उस विग्रह के दर्शन सभी को मिले इसके लिए आपकी सहायता चाहिए।

ईश्वर द्वारा भेजे गए लकड़ी के कुंदे से बनी मूर्ति के भीतर हम इस दिव्य मूर्ति को सुरछित रखना चाहते हैं. अपने कुल की प्रतिमा को पुरी के मंदिर में स्थापित करने की अनुमति दो. उस कुंदे को तुम स्पर्श करोगे तभी वह हिलेगा

विश्वावसु राजी हो गए. राजा सपरिवार विश्वावसु को लेकर सागर तट पर पहुंचे. विश्वावसु ने कुंदे को छुआ. छूते ही कुंदा अपने आप तैरता हुआ किनारे पर आ लगा. राजा के सेवकों ने उस कुंदे को राज महल में पहुंचा दिया।

अगले दिन मूर्तिकारों और शिल्पियों को राजा ने बुलाकर मंत्रणा की कि आखिर इस कुंदे से कौन सी देवमूर्ति बनाना शुभ दायक होगा. मूर्तिकारों ने कह दिया कि वे पत्थर की मूर्तियां बनाना तो जानते हैं लेकिन लकड़ी की मूर्ति बनाने का उन्हें ज्ञान नहीं।

एक नए विघ्न के पैदा होने से राजा फिर चिंतित हो गए. उसी समय वहां एक बूढा आया. उसने राजा से कहा- इस मंदिर में आप भगवान श्री कृष्ण को उनके भाई बलभद्र तथा बहन सुभद्रा के साथ विराज मान करें. इस दैवयोग का यही संकेत है।

राजा को उस बूढ़े व्यक्ति की बात से सांत्वना तो मिली लेकिन समस्या यह थी कि आखिर मूर्ति बने कैसे ? उस बूढ़े ने कहा कि मैं इस कला में कुशल हूं. मैं इस पवित्र कार्य को पूरा करूंगा और मूर्तियां बनाउंगा. पर मेरी एक शर्त है।

राजा प्रसन्न हो गए और उनकी शर्त पूछी. बूढ़े शिल्पी ने कहा- मैं भगवान की मूर्ति निर्माण का काम एकांत में करूंगा. मैं यह काम बंद कमरे में करुंगा. कार्य पूरा करने के बाद मैं स्वयं दरवाजा खोल कर बाहर आऊंगा. इस बीच कोई मुझे नहीं बुलाए।

राजा सहमत तो थे लेकिन उन्हें एक चिंता हुई और बोले- यदि कोई आपके पास नहीं आएगा तो ऐसी हालत में आपके खाने पीने की व्यवस्था कैसे होगी ? शिल्पी ने कहा- जब तक मेरा काम पूर्ण नहीं होता मैं कुछ खाता-पीता नहीं हूं।

राज मंदिर के एक विशाल कक्ष में उस बूढ़े शिल्पी ने स्वयं को 21 दिनों के लिए बंद कर लिया और काम शुरू कर दिया. भीतर से आवाजें आती थीं. महारानी गुंडीचा देवी दरवाजे से कान लगाकर अक्सर छेनी-हथौड़े के चलने की आवाजें सुना करती थीं।

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महारानी रोज की तरह कमरे के दरवाजे से कान लगाए खड़ी थीं. 15 दिन बीते थे कि उन्हें कमरे से आवाज सुनायी पडनी बंद हो गई. जब मूर्ति कार के काम करने की कोई आवाज न मिली तो रानी चिंतित हो गईं।

उन्हें लगा कि वृद्ध आदमी है, खाता-पीता भी नहीं कहीं उसके साथ कुछ अनिष्ट न हो गया हो. व्याकुल होकर रानी ने दरवाजे को धक्का देकर खोला और भीतर झांककर देखा।

महारानी गुंडीचा देवी ने इस तरह मूर्ति कार को दिया हुआ वचन भंग कर दिया था. मूर्ति कार अभी मूर्तियां बना रहा था. परंतु रानी को देखते ही वह अदृश्य हो गए. मूर्ति निर्माण का कार्य अभी तक पूरा नहीं हुआ था. हाथ-पैर का निर्माण पूर्ण नहीं हुआ था।

वृद्ध शिल्प कार के रूप में स्वयं देवताओं के शिल्पी भगवान विश्वकर्मा आए थे. उनके अदृश्य होते ही मूर्तियां अधूरी ही रह गईं. इसी कारण आज भी यह मूर्तियां वैसी ही हैं. उन प्रतिमाओं को ही मंदिर में स्थापित कराया गया।

कहते हैं विश्वावसु संभवतः उस जरा बहेलिए का वंशज था जिसने अंजाने में भगवान कृष्ण की ह्त्या कर दी थी. विश्वावसु शायद कृष्ण के पवित्र अवशेषों की पूजा करता था. ये अवशेष मूर्तियों में छिपाकर रखे गए थे।

विद्यापति और ललिता के वंशज जिन्हें दैत्यपति कहते हैं उनका परिवार ही यहां अब तक पूजा करता है।

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How will the transcendence of the Vakri Guru be in the Sagittarius sign for 12 zodiac signs https://www.astrologyofmylife.com/how-will-the-transcendence-of-the-vakri-guru-be-in-the-sagittarius-sign-for-12-zodiac-signs/ https://www.astrologyofmylife.com/how-will-the-transcendence-of-the-vakri-guru-be-in-the-sagittarius-sign-for-12-zodiac-signs/#respond Tue, 30 Jun 2020 19:11:44 +0000 https://www.astrologyofmylife.com/?p=17166 वक्री गुरु का धनु राशि में गोचर कैसा रहेगा 12 राशियों के लिए गुरु महाराज अपनी नीच राशि से निकल अपनी मूलत्रिकोण राशि धनु में 30 जून 2020 को शाम 16:30 बजे प्रवेश करेंगे। इस समय गुरु महाराज वक्र गति में रहेंगे और ज्योतिष में यह माना जाता है कि शुभ ग्रह अपनी वक्री अवस्था …
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वक्री गुरु का धनु राशि में गोचर कैसा रहेगा 12 राशियों के लिए

गुरु महाराज अपनी नीच राशि से निकल अपनी मूलत्रिकोण राशि धनु में 30 जून 2020 को शाम 16:30 बजे प्रवेश करेंगे। इस समय गुरु महाराज वक्र गति में रहेंगे और ज्योतिष में यह माना जाता है कि शुभ ग्रह अपनी वक्री अवस्था में और शुभ फल देते हैं। धनु राशि में गुरु महाराज 20 नवंबर 2020 सुबह 06:26 मिनट तक रहेंगे, उसके बाद वह मकर राशि में जाएंगे। आइये जानते हैं कैसा रहेगा गुरु महाराज का गोचर विभिन्न चंद्र राशियों के लिए-*

Gemstone Suggestion

मेष राशि

इस राशि के लिए गुरु का वक्री गोचर काफी शुभ रहेगा। आप नकारात्मक विचारों से मुक्ति प्राप्त कर सकारात्मकता की दिशा में आगे बढ़ेंगे।

प्रोफेशनल फील्ड में जो जातक हैं उन्हें नए अवसरों की प्राप्ति होगी, साथ ही आप की प्रबंधन क्षमता में भी इज़ाफा होगा। सीनियर्स के साथ जो भी आप के गतिरोध हैं वो समाप्ति की ओर अग्रसर होंगे। आप का खुद पर विश्वास मजबूत होगा जिससे स्वयं निर्णय लेने में सक्षम होंगे! यह मेष राशि वालों के स्वभाव का एक निहित गुण है, जोकि गुरु की नीच अवस्था के चलते प्रभावी नहीं हो पा रहा था!

वक्री गुरु की इस स्थिति में आध्यात्मिकता की तरफ भी आपका झुकाव बढ़ेगा जिससे आपको स्वयं से जुड़ने में मदद मिलेगी और जो भी आपके अतीत की भावनाएं आपको परेशान कर रहीं थी उनसे बाहर आने में आप के लिए सहायक सिद्ध होगा। इससे आपको स्वास्थ्य लाभ भी प्राप्त होगा और आपकी विचार प्रक्रिया भी स्पष्ट होगी जिससे नयी दिशा की ओर आगे बढ़ने में मदद मिलेगी। यात्रा में भी लाभ मिलेगा।

Online Astrologer – Acharya Dr MSD Arya

विद्यार्थियों के लिए भी यह वक्री गोचर अच्छे समाचार लेकर आएगा, उच्च शिक्षा में आ रहे विघ्न समाप्त होते हुए नज़र आ रहे हैं। इसलिए अपने प्रयासों में ईमानदार रहेंगे तो सफलता मिलने में देर नहीं लगेगी।

वृषभ राशि

इस राशि के लिए गुरु का वक्री गोचर मिश्रित परिणाम लेकर आएगा। गुरु आपके नवम भाव से वापस आपके अष्टम भाव में गोचर करेगा।

यह गोचर परिवर्तन के साथ-साथ अनिश्चिता की ओर संकेत कर रहा है। इससे आप थोड़ी बेचैनी और चिंता महसूस करेंगे, भविष्य को लेकर थोड़ी बहुत आशंकाएं भी घर करेंगी क्योंकि यह गुरु ग्रह का निहित गुण है, वह थोड़ा चीज़ों को बड़ा कर दिखाते हैं। इसलिए हो सकता है जो भी परिवर्तन आएं वो शुरू में आपको विचलित करें ,परन्तु आपको यह समझना होगा यह समय आपके लिए इसलिए अच्छा है की यह आपकी आत्मनिरीक्षण और खुद को समझने करने में मदद करेगा।

इस समय आपको यह जानने में मदद मिलेगी कि आप की कहाँ कमी रह रही है, क्या आपको करने की जरूरत है जिससे आप सही दिशा प्राप्त कर सकें और आगे बढ़ सकें। इससे आपको आपके प्रोफेशन और पारिवारिक रिश्तों को समझने में भी सहायता प्राप्त होगी। प्रोफेशनल्स को यह समय शोध कार्य करने में, अपने अभ्यास में, अपने कौशल को बढ़ाने में उपयोग में लाना चाहिए जिससे उनके लिए नए रास्ते खुलेंगे। आकस्मिक लाभ भी प्राप्त हो सकते हैं।

आपसी रिश्तों में थोड़ा तनाव की स्थिति रह सकती है, परन्तु यह वक्री गुरु का गोचर आपको यह सिखाने आया है कि जो भी विषय, व्यक्ति आपके जीवन में गैरजरूरी है, वह स्वयं ही आपसे दूर हो जाएगा। जब आप यह समझ जाएंगे तो आसक्ति से, भावनात्मक जुड़ाव से दूर रहने में और बाहर निकलने में आपको मदद मिलेगी। इस समय गूढ़ विषयों को जानने में आपकी रुचि बढ़ेगी। किसी भी विषय को उसके आधारभूत और मूल से समझने के लिए यह अच्छा समय रहेगा, जो विद्यार्थी ऐसा करेंगे, उनको आगे बढ़ने में सहायता प्राप्त होगी। स्वास्थ्य के मामले में थोड़ा आपको सजग रहने की आवश्यकता रहेगी, पेट या पेट के निचले हिस्से से संबंधित दिक्कत आ सकती है ।

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मिथुन राशि

यह समय या गोचर मिथुन राशि वालों के लिए काफी शुभ रहेगा, वक्री गुरु आपके अष्टम स्थान से आपके सप्तम स्थान में वापस गोचर करेगा जो कि यह इंगित करता है कि रिश्तों में सामंजस्य बिठाने में आपको काफी मदद मिलेगी। जिन व्यक्तियों को प्रेम संबंधों में चुनौती आ रही थी, उन्हें रिश्ता सुधारने में मदद मिलेगी। जो जातक विवाह का इंतज़ार कर रहे थे, उन्हें अनुकूल अवसर प्राप्त होंगे।

व्यवसाय / प्रोफेशन में आ रही परेशानियों के हल मिलने शुरू हो जाएंगे, नए रास्ते मिलने शुरू होंगे। कार्यक्षेत्र में स्थिरता की ओर बढ़ेंगे, शौर्य और साहस में वृद्धि होगी जिससे अनिश्चितता से बाहर आने में मदद मिलेगी। मिथुन राशि का स्वाभाविक गुण अच्छे से विचारों और सूचनाओं का आदान प्रदान करना है, इसलिए इस गोचर में आप जितना लोगों से मिलेंगे जुलेंगे उतना आप को बढ़िया अवसर प्राप्त होंगे, उतना आपको अपनी आय बढ़ाने में मदद मिलेगी। यह वक्री गोचर आपको काफी अच्छा प्लेटफॉर्म देगा अपना कौशल दिखाने का, किसी भी मौके को हाथ से जाने न दें।

Horoscope

पिता के साथ संबंधों में मज़बूती आएगी, प्रोफेशन में आपकी किसी बड़े व्यक्ति से मुलाकात और उनकी सलाह जीवन को नयी दिशा की ओर मोड़ सकती है। स्वास्थ के संबंध में यह गोचर शुभ रहेगा, फिर भी अपने खान-पान में लापरवाही न बरतें, अन्यथा वजन बढ़ने जैसी दिक्कतें आ सकती हैं। मिथुन के लिए यह वक्री गुरु का गोचर काफी अनुकूल परिणाम लेकर आएगा, इसलिए अपने प्रयास लगातार जारी रखें।

कर्क राशि

यह गुरु का वक्री गोचर कर्क राशि वालों के लिए मिश्रित या औसत परिणाम देगा। यह गोचर कर्क राशि वालों के लिए व्यवधान उत्पन्न करेगा, परन्तु साथ ही आपकी साहस की वृति, या जुझारू प्रवर्ति में भी बढ़ोतरी करेगा जो कि इन व्यवधानों से पार पाने में आपके लिए सहायक होगा।

जो जातक जॉब कर रहे हैं ,प्रबंधन क्षेत्र , टीचिंग या कंसल्टेंसी के प्रोफेशन में हैं, उनके लिए यह गुरु का वक्री गोचर अनुकूल रहेगा या जो अपने कौशल से संबंधित कोई काम कर रहे हैं उन्हें अच्छी सफलता मिलेगी। जो जातक अपना व्यवसाय कर रहे हैं, उन्हें अपने संसाधनों के अनुरूप ही निर्णय लेने होंगे, किसी भी प्रकार के लोन या कर्ज लेने से बचना चाहिए, अन्यथा परेशानिओं का सामना करना पढ़ सकता है। इस गोचर का मुख्य संदेश यह है कि आपको भाग्य का सहारा न लेकर, अपने कौशल पर भरोसा रखना है।

Life Prediction

पारिवारिक रिश्तों में भी थोड़ा बहुत सामंजस्य बढ़ाने में मदद मिलेगी, किसी नए मेहमान का आगमन परिवार में हो सकता है। विद्यार्थियों के लिए यह गुरु की वक्र स्थिति अनुकूल रहेगा, खासकर उनके लिए जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह गोचर थोड़ा परेशान कर सकता है, खासकर चर्बी से संबंधित परेशानी, पेट से संबंधित परेशानी इसलिए अपने खान-पान का अवश्य ध्यान रखें और इससे भी जरुरी बात नकारात्मकता से जितनी दूर रहेंगे उतना लाभ स्वास्थ्य में होगा। व्यायाम, योगा इत्यादि को दिनचर्या में सम्मिलित करना आपको बहुत अच्छे परिणामों की प्राप्ति कराएगा !

सिंह राशि

यह गुरु का वक्री गोचर सिंह राशि के जातकों के लिए अनुकूल परिणाम लेकर आएगा। यह समय नयी योजनाएं बनाने में और उनको क्रिन्यान्वित करने के लिए बहुत शुभ रहेगा क्योंकि इस समय आपकी प्रबंधन क्षमता अपने चरम पर होगी। आपकी बुद्धि क्षमता, निर्णय लेने में स्पष्टता रहेगी, जिस की वजह से लोग आपसे महत्वपूर्ण विषयों पर सलाह लेने आएँगे और आपका समाज में रूतबा बढ़ेगा। इस समय आप सकारात्मकता से भरे हुए और गतिशील रहेंगे इसलिए इस समय जो भी आपके अपूर्ण कार्य हैं उन्हें पूरा कर लें। जितने भी व्यवधान आ रहे थे, वह सब दूर होंगे, नए अवसरों की प्राप्ति होगी। जो जातक जॉब मे हैं और परिवर्तन करना चाह रहे हैं, उन्हें कहीं अच्छी जगह अवसर प्राप्त हो सकते हैं।

प्रेम जीवन के लिए भी यह वक्री गोचर बहुत शुभ रहेगा चाहे आप नए संबंधों में जाना चाहते हैं या पुराने रिश्तों में सुधार लाना चाहते हैं, स्तिथियाँ आपके अनुकूल रहेंगी। संतान सम्बन्धी विषयों में आ रही परेशानी दूर होगी। यह समय विद्यार्थियों के लिए भी शुभ समाचार ले कर आएगा, उच्च शिक्षा में आ रही दिक्कतें दूर होंगी, जो विद्यार्थी शोध कार्य से जुड़े हुए हैं, उन्हें बहुत अच्छी सफलता की प्राप्ति होगी। अध्यात्म या गूढ़ विषय जैसे ज्योतिष इत्यादि में आपकी काफी रुचि बढ़ेगी, कुछ नया सीखने की जिज्ञासा बनी रहेगी।

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स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह समय बहुत अच्छा रहेगा, वक्री गुरु की लग्न पर दृष्टि एक रक्षा कवच का काम करेगी, बस थोड़ा बहुत जो ध्यान देना है वो अपने खान पान पर और व्यायाम पर देना है, क्योंकि इस समय वजन बढ़ने की काफी सम्भावना रहती है। परन्तु इस समय आपको एक और चीज़ से सावधान रहने की ज़रुरत है, वह है आपका अहम भाव क्योंकि आपको यह लग सकता है कि आप सब जानते हैं, और वहीं आप भूल कर जाएंगे ।

कन्या राशि

कन्या राशि के लिए भी यह वक्री गुरु के गोचर अच्छे परिणाम लेकर आएगा। यह गोचर आपके पंचम भाव से आपके चतुर्थ भाव में होगा जहां पर (पंचम भाव में) यह शनि महाराज के साथ विराजमान थे।

गुरु अपनी वक्र स्थिति में आपके लिए राहत लेकर आया है, यह इंगित करता है कि अब आप अपने प्रयास, चाहे वो आम जिंदगी हो या आपका कार्य-क्षेत्र, उन्हीं जगहों पर करेंगे जहां से आपको मन की शांति प्राप्त हो, जहां आप सुखद और सहज महसूस कर पाएँ। यह गोचर आपकी सुख सुविधाओं में भी वृद्धि करेगा, नए वाहन, मकान की प्राप्ति संभव है, पुराने ज़मीन जायदाद के लंबित पड़े मामले सुलझेंगे।

गुरु का यह वक्री गोचर अध्यात्म, मैडिटेशन, योग द्वारा खुद से जुड़ने के लिए भी बहुत अच्छा है, इससे जिन भी भावनात्मक परेशानियों से आप गुज़र रहे थे उनसे आपको छुटकारा पाने में मदद मिलेगी। माता को स्वास्थ्य में भरपूर लाभ मिलेगा, उनसे संबंधों में भी मज़बूती आएगी। जीवनसाथी से संबंधों में मधुरता आएगी, उनके काम- काज या प्रोफेशन में भी जो दिक्कतें आ रही थीं, वो दूर होंगी।

Married Life Report

नव संबंधों में जो लोग जुड़ना चाहते हैं, हो सकता है वह थोड़ा भावनाओं में सुरक्षा की चाह के चलते ऐसा करने में थोड़ा झिझकें, आपको यह समझाना होगा कि प्यार में कोई सुरक्षा नहीं होती। विद्यार्थी वर्ग के लिए भी समय अनुकूल है, परन्तु कई बार आप आराम पसंद बन सकते हैं, जिससे थोड़ी परेशानी बढ़ सकती है। आपको थोड़ा इस पर ध्यान देने की जरूरत रहेगी। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी गुरु का वक्री होना आपके लिए बहुत ही शुभ रहेगा, जो भी थोड़ी बहुत परेशानियां चल रही थीं, उनसे छुटकारा पाने में मदद मिलेगी।

तुला राशि

तुला राशि वालों के लिए गुरु का वक्री होकर यह राशि परिवर्तन चतुर्थ भाव से तृतीय भाव में होगा। जिसे पराक्रम, साहस, अभिलाषा और रुचि का स्थान माना जाता है, जो यह दिखाता है कि आपने जो अपनी सीमायें बाँधी थी, उनसे आप ऊपर उठने का प्रयास करेंगे, जिससे आपको नए अवसरों की प्राप्ति होगी। आप नए विचारों और प्रयोगों से पीछे नहीं हटेंगे, जिससे लाभ की सम्भावना में वृद्धि होगी। आपके कम्युनिकेशन स्किल्स में भी इजाफा होगा जिससे आप अपनी भावनाओं को और अच्छे से सबके सामने प्रस्तुत कर पाएंगे, जो आपके व्यवसाय और संबंध दोनों के लिए बहुत अच्छे परिणाम लेकर आएगा ।

यह समय कौशल को और निखारने का समय है, क्योंकि यह समय आपको आपके कौशल के अनुरूप अवसर प्रदान करेगा। यह समय आपके लिए स्वयं को खोजने का भी समय है, जो भी चीज़ें आपको प्रिय हैं उनको करें क्योंकि जितना आप अपने पसंद की चीजें करेंगे उतना खुद को आप उन्मुक्त पाएंगे जिससे आपकी निर्णय क्षमता काफी अच्छी होगी। जिसमें पिछले कुछ समय से परेशानी आ रही थी । आपके किये गए प्रयासों को भी सही दिशा प्राप्त होगी।

Prashna Kundli by Acharya Arya

भाई बहन-सहोदर का सहयोग पूर्ण रूप से प्राप्त होगा। जीवनसाथी का सहयोग भी आपकी तरक्की में योगदान देगा। भाग्य का भी भरपूर साथ मिलता हुआ नज़र आ रहा है। विद्यार्थी वर्ग खासकर वह विद्यार्थी जो किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं उनके लिए समय बहुत शुभ रहेगा। यह समय आपके लिए बहुत अच्छा है, परन्तु आप अपना काफी समय दूसरों को प्रसन्न करने में लगा देते हैं, यदि आप अपनी इस प्रवर्ति से बचेंगे तो यह गुरु का वक्री गोचर से आप और अधिक लाभ उठाने में कामयाब होंगे।

वृश्चिक राशि

वृश्चिक राशि के जातकों के लिये भी यह गुरु का वक्री होकर धनु राशि में गोचर काफी शुभ रहेगा। गुरु महाराज आपके तीसरे स्थान से, जो कि प्रयास का स्थान है, से दूसरे भाव में विचरण करेंगे जो की संचित धन, परिवार का स्थान है। यह दर्शाता है कि यह समय राहत देने वाला है, अथक प्रयासों के बाद भी पिछले कुछ समय से आपको सही दिशा नहीं मिल पा रही थी, वह दिशा अब मिलनी शुरु हो जायेगी। आय में भी बढ़ोतरी संभव होती नज़र आ रही है, प्रोफेशन, जॉब में नए अवसरों की प्राप्ति होगी। कोई नई ज़िम्मेदारी या नए पद से आपको नवाजा जा सकता है।

जो जातक काफी समय से अपने व्यवसाय में जाना चाहते थे, उनके लिए भी गुरु का वक्री होना अनुकूल है और जो पहले से अपना व्यवसाय कर रहे हैं, वह अपने संसाधनों का उपयोग सही से कर पाएंगे जिससे अच्छा मुनाफ़ा होने की उम्मीद है। इस समय में आपका सारा ध्यान धन संचय पर होना चाहिए।

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आप परिवार के साथ अधिक समय बिताने का प्रयास करेंगे जिससे पारिवारिक संबंधों में भी मधुरता आएगी। परिवार में बढ़ोतरी के भी अच्छे संकेत हैं। जो जातक काफी समय से परिणय सूत्र में बंधना चाहते हैं, उनके लिए शुभ समाचार की प्राप्ति संभव है। विद्यार्थियों के लिए शुभ संकेत रहेंगे, विद्या प्राप्ति के लिए अनुकूल वातावरण प्राप्त होगा, बाधाएं दूर होती हुई नज़र आ रही हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी गुरु का यह भ्रमण वृश्चिक जातकों के लिए अच्छा रहेगा।

धनु राशि

गुरु का यह वक्री गोचर आपके दूसरे भाव से जहां गुरु नीच भाव में विराजमान थे से अब आपके प्रथम भाव में होगा, जोकि काफी अच्छे फलों की ओर इशारा कर रहा है। सबसे पहला परिवर्तन जो आपको महसूस होगा वो आपके स्वभाव में होगा। कुछ समय से आप थकान, सुस्ती महसूस कर रहे थे वह अब दूर हो जाएगी और आप खुद को ऊर्जावान महसूस करेंगे।

आप सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ेंगे जो आपके स्वास्थ्य और निर्णय क्षमता में भी दिखायी देगा। धर्म, अध्यात्म में भी रुचि बढ़ेगी, आप के अंदर समाज को कुछ योगदान देने की भावना भी आयेगी और आप इसके लिए प्रयासरत भी रहेंगे। भाग्य का भरपूर साथ मिलेगा इसलिए जो भी अवसर आपके सामने प्रस्तुत हों उन्हें लेने से न चूकियेगा।

Gemstone Suggestion

गुरु आपकी राशि के लिए चतुर्थ भाव का भी स्वामी है इसलिए आपके जमीन -जायदाद से संबंधित मामले लंबित चल रहे थे वह गतिशील होंगे व नए मकान इत्यादि के रास्ते खुलेंगे। जो जातक परिणय सूत्र में बंधने का इंतज़ार कर रहे हैं उनके लिए गुरु का राशि परिवर्तन अच्छी खबर लेकर आएगा, वहीं जो जातक पहले से ही विवाहित या किसी समबन्ध में हैं, उनके लिए थोड़ा सी दिक्कत आ सकती है, सावधानी रखें क्योंकि कई बार आप अपने साथी के मित्र कम सलाहकार बनने का ज्यादा प्रयास करेंगे।

संतति के लिहाज से यह परिवर्तन शुभ समाचार लेकर आएगा। विद्यार्थी वर्ग भी उच्च शिक्षा की और अग्रसर होते हुए नज़र आ रहे हैं, परिवार का साथ भी खूब रहेगा। हर दृष्टिकोण से यह गोचर शुभ रहेगा यह कहना भी गलत नहीं है।

मकर राशि

गुरु का यह वक्री गोचर आपके लिए बहुत शुभता लेकर आएगा, आपके लग्न भाव से गुरु राशि परिवर्तन कर आपके द्वादश भाव में अपनी राशि में विराजमान होंगे। यह गोचर खासकर उन जातकों के लिए बहुत शुभ रहेगा, जिनका इम्पोर्ट / एक्सपोर्ट का काम है और जो लोग विदेश की किसी कंपनी में काम करते हैं। विदेश जाने वालों के लिए भी यह गोचर शुभ समाचार लेकर आएगा। आप का खुद पर विश्वास और बढ़ना शुरू हो जाएगा, दूसरों पर निर्भरता में कमी आएगी, जिससे आपको सही फैसले लेने में कामयाबी मिलेगी।

जितनी आप यात्रा करेंगे उतना अधिक लाभ प्राप्त होगा, परन्तु पहले से यात्रा के लिए अच्छा बजट प्लान बनाना सही रहेगा। आपकी आध्यात्मिक, धार्मिक क्रियाकलापों में रुचि बढ़ेगी, इसमें खूब बढ़ चढ़कर भाग लेंगे। परन्तु स्वास्थ्य की दृष्टि से यह समय थोड़ा कमज़ोर रह सकता है, थोड़ा अवांछित परिस्थियों का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए खान पान का ध्यान रखना जरूरी होगा। योग, प्राणायम, खेल- कूद, में भाग लेना आपके लिए बहुत अच्छा रहेगा।

Signature Design

संबंधों में भी नवीनता आएगी, ख़राब रिश्ते से या आप जिस रिश्ते में भावनात्मक परेशानियों का सामना कर रहे थे, उससे बाहर आने में मदद मिलेगी। अगर आप अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देंगे तो यह गोचर आपके लिए बाकी सब दृष्टियों से शुभ रहेगा।

कुम्भ राशि

कुम्भ राशि के लिए यह वक्री गुरु का परिवर्तन आय के नए स्रोत खोलेगा, खर्चों को नियंत्रण में रखने में कामयाब होंगे। जो भी आपकी योजनाएं थी, वह कार्यांन्वित होनी शुरू हो जाएंगी। यह गोचर यह दिखाता है कि अब आप लोगों से जितना मिलेंगे-जुलेंगे, उतना ही आपको लाभ प्राप्त होगा, कोई पुराना मित्र आपके लिए कोई नयी सम्भावना ला सकता है।

सामाजिक प्रतिष्ठा में भी बढ़ोतरी होगी। आप अब थोड़ा अधिक महत्वाकांक्षी होंगे, लक्ष्यों के प्रति और अधिक सजग होकर प्रयास करेंगे जिससे लाभ मिलने की काफी सम्भावना रहेगी। व्यापारी वर्ग के लिए भी यह परिवर्तन व्यवसाय को और आगे बढ़ाने के अवसर प्राप्त कराएगा।

Name Check & Suggestion by Numerology

बड़े भाई-बहनों से मनमुटाव समाप्त होंगे, सन्तति को लेकर भी वक्री गुरु की यह स्थिति काफी शुभ रहेगी, परिवार में बढ़ोतरी संभव है। यदि आप इस राशि के माता-पिता हैं तो संतान की तरक्की से काफी प्रसन्नता की प्राप्ति होगी। प्रेम संबंधों में तरोताज़गी आएगी, नयी ऊर्जा से भरे रहेंगे जिससे आपका संगी भी आपसे प्रसन्न रहेंगा।

आपकी अंतर्दृष्टि इस समय काफी अच्छी रहेगी, जिससे आपको नयी दिशा प्राप्त करने में सहायता मिलेगी। विद्यार्थी वर्ग को भी उच्च शिक्षा में परिवार का पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा, जिससे वह प्रगति के पथ पर अग्रसर होते हुए नज़र आएंगे। जो भी जातक अपनी शिक्षा पूर्ण कर नौकरी की तलाश में हैं, उन्हें भी अच्छे अवसरों की प्राप्ति होगी। स्वास्थय की दृष्टि से भी समय उत्तम रहेगा, बस थोड़ा खान-पान में ध्यान देने की आवश्यकता है, वसा युक्त भोजन न करना शुभ रहेगा।

मीन राशि

मीन राशि वालों के लिये वक्री गुरु का परिवर्तन लाभ भाव से जहां गुरु महाराज नीच के थे और शनि के साथ विराजमान थे, वहां से दशम भाव में अपनी मूल त्रिकोण राशि में होगा, जो कि नौकरी में तरक्की और बदलाव दिखा रहा है। यह परिवर्तन आपको और अधिक कार्य उन्मुख बनाएगा, अब आपका ध्यान टारगेट से हटकर या प्रशंसा की और से हटकर सिर्फ काम को सुचारू रूप से, नवीनता और सृजनात्मकता से कैसे किया जाए इस तरफ रहेगा, जिससे सफलता के साथ -साथ उच्च अधिकारियों का सम्मान और प्रोत्साहन भी आपको प्राप्त होगा।

पिता के स्वास्थ्य में सुधार के साथ-साथ उनसे संबंधों में भी मधुरता आएगी, उनसे आपको काफी प्रोत्साहन, सहयोग की भी प्राप्ति होगी, जिससे परिवार मे ख़ुशी का वातावरण रहेगा। आपकी वाक् शक्ति में भी इज़ाफा होगा, जिससे काफी लोग आपसे सलाह मशवरा लेंगे। सरकारी क्षेत्र से भी लाभ मिलने की सम्भावना रहेगी। घर या गाड़ी में इज़ाफा या नवीन कार्य की योजना बनेगी।

Vastu Check by Scientifically

शत्रु पक्ष पर विजय हासिल होगी, कोर्ट -कचहरी में लंबित पड़े मामले तेजी से आगे बढ़ेंगे। प्रेम के मामले में यह गोचर थोड़ा मिश्रित परिणाम देने वाला रह सकता है, आपको इसके लिए अपने व्यवसाय और परिवार में सामंजसय बिठाना पड़ेगा। आपका आत्मविश्वास इस समय बढ़ा हुआ रहेगा, इसलिए निर्णय लेने में समय न गवांये, क्योंकि मीन राशि वालों की सबसे बड़ी समस्या निर्णय लेने की होती है।

अपनी नैतिकता के चलते कभी-कभी आप आत्मग्लानि के शिकार भी हो जाते हैं, जिससे आप का स्वयं के किये गए निर्णयों पर से विश्वास डगमगा जाता है , जो गुरु की इस वक्र स्थिति में आपके परिणाम घटा सकती है । इसलिए अपनी इस प्रवर्ति से आप जितना बच कर चलेंगें, उतना आपके लिए अच्छा रहेगा !

Panch Mukhi/ Five Faced Rudraksha

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गांधारी के शाप को हंसते-हंसते स्वीकार करलिया श्री कृष्ण ने https://www.astrologyofmylife.com/shri-krishna-accepted-gandhari-curse-with-laughter/ https://www.astrologyofmylife.com/shri-krishna-accepted-gandhari-curse-with-laughter/#respond Sat, 30 May 2020 07:58:26 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=16704 गांधारी के शाप को हंसते-हंसते स्वीकार करलिया श्री कृष्ण ने महाभारत युद्ध के पश्चात् जब श्रीकृष्ण सहित सभी पांडव गांधारी से मिलने गए, तब पुत्रशोक में विह्वल गांधारी ने आंखों की पट्टी के भीतर से ही राजा युधिष्ठिर के पैरों की अंगुलियों के अग्रभाग को एक क्षण के लिए देखा। इतने देखने मात्र से ही …
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गांधारी के शाप को हंसते-हंसते स्वीकार करलिया श्री कृष्ण ने

महाभारत युद्ध के पश्चात् जब श्रीकृष्ण सहित सभी पांडव गांधारी से मिलने गए, तब पुत्रशोक में विह्वल गांधारी ने आंखों की पट्टी के भीतर से ही राजा युधिष्ठिर के पैरों की अंगुलियों के अग्रभाग को एक क्षण के लिए देखा। इतने देखने मात्र से ही युधिष्ठिर के पैरों के नाखून काले पड़ गए। गांधारीजी यह बात अच्छी तरह से जानती थीं कि महाभारत का पूरा युद्ध जिस योद्धा के बलबूते पर लड़ा गया है और जिसके कारण पाण्डवों को विजय मिली है, वह श्रीकृष्ण ही हैं। अत: गांधारीजी का सारा क्रोध्र श्रीकृष्ण पर ही केन्द्रित हो गया। वे श्रीकृष्ण को सम्बोधित करती हुई कहती हैं–

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‘मधुसूदन! माधव! जनार्दन! कमलनयन! तुम शक्तिशाली थे, तुममें महान बल है, तुम्हारे पास बहुत-से सैनिक थे, दोनों पक्षों से अपनी बात मनवा लेने की सामर्थ्य तुममें थी, तुमने वेदशास्त्र और महात्माओं की बात सुनी और जानी हैं, यह सब होते हुए भी तुमने स्वेच्छा से कुरुवंश के नाश की उपेक्षा की; जानबूझकर इस वंश का नाश होने दिया। यह तुम्हारा महान दोष है, अत: तुम इसका फल प्राप्त करो।’ .

इतना सब सुनकर भी श्रीकृष्ण शान्त, गम्भीर और मौन रहे। गांधारी के क्रोध ने प्रचण्डरूप धारण कर लिया और वे नागिन की भांति फुफकार कर बोली–

Varshphal Report

‘चक्रगदाधर! मैंने पति की सेवा से जो कुछ भी तप प्राप्त किया है, उस तपोबल से तुम्हें शाप दे रही हूँ–आज से छत्तीसवां वर्ष आने पर तुम्हारा समस्त परिवार आपस में लड़कर मर जाएगा। तुम सबकी आंखों से ओझल होकर अनाथ के समान वन में घूमोगे और किसी निन्दित उपाय से मृत्यु को प्राप्त होगे। इन भरतवंश की स्त्रियों के जैसे तुम्हारे कुल की स्त्रियां भी इसी तरह सगे-सम्बन्धियों की लाशों पर गिरेंगी।’

ऐसा घोर शाप सुनकर भला कौन न भय से कांप उठता, परन्तु श्रीकृष्ण ने उसी गम्भीर मुस्कान के साथ कहा–‘मैं जानता हूँ, ऐसा ही होने वाला है। वृष्णिकुल का संहारक मेरे अतिरिक्त और हो भी कौन सकता है? यादवों को देव, दानव और मनुष्य तो मार नहीं सकते, अत: वे आपस में ही लड़कर नष्ट होंगे।’

Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya

शाप सुनकर भी भगवान श्रीकृष्ण गांधारी से कहते हैं–’उठो! शोक मत करो। प्रतिदिन युद्ध के लिए जाने से पूर्व जब तुम्हारा पुत्र दुर्योधन तुमसे आशीर्वाद लेने आता था और कहता था कि मां मैं युद्ध के लिए जा रहा हूँ, तुम मेरे कल्याण के लिए आशीर्वाद दो, तब तुम सदा यही उत्तर देती थीं ‘यतो धर्मस्ततो जय:’ अर्थात् धर्म की जय हो।’

यह कहकर समत्वयोगी श्रीकृष्ण निर्विकार भाव से खड़े रहे और गांधारी मौन हो गयीं।

Prashna Kundli by Acharya Arya

प्रसंग का सार

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इस प्रसंग का सार यही है कि सुख-दु:ख को मेहमान समझकर स्वागत करें। दु:ख में विचलित न होकर धैर्य के साथ उसका सामना करें। क्योंकि वाल्मीकिरामायण में कहा गया है–‘दुर्लभं हि सदा सुखम्।’ अर्थात् सदा सुख मिले यह दुर्लभ है।

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Symptoms of Auspicious and Inauspicious Rahu https://www.astrologyofmylife.com/symptoms-of-auspicious-and-inauspicious-rahu/ https://www.astrologyofmylife.com/symptoms-of-auspicious-and-inauspicious-rahu/#respond Sat, 04 Jan 2020 09:32:42 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=12716 शुभ-अशुभ राहु के लक्षण ज्योतिष के जनक महर्षि पराशर के अनुसार राहु ग्रह को पितामह (दादा), समाज एवं जाती से अलग लोग (विद्रोही भी), सर्प, सामाजिक जहर का फैलाना, क्रानिक बीमारियां, भय, विधवा, दुर्वचन, तीर्थ यात्रायें, निष्ठुर वाणी, विदेश में जीवन, त्वचा पर दाग, सरीसृप, महामारी, किसी महिला से अनैतिक संबन्ध, नानी, व्यर्थ के तर्क, …
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शुभ-अशुभ राहु के लक्षण

ज्योतिष के जनक महर्षि पराशर के अनुसार राहु ग्रह को पितामह (दादा), समाज एवं जाती से अलग लोग (विद्रोही भी), सर्प, सामाजिक जहर का फैलाना, क्रानिक बीमारियां, भय, विधवा, दुर्वचन, तीर्थ यात्रायें, निष्ठुर वाणी, विदेश में जीवन, त्वचा पर दाग, सरीसृप, महामारी, किसी महिला से अनैतिक संबन्ध, नानी, व्यर्थ के तर्क, भडकाऊ भाषण, बनावटीपन, दर्द और सूजन, डूबना, अंधेरा, दु:ख पहुंचाने वाले शब्द, निम्न जाति, दुष्ट स्त्री, जुआरी, विधर्मी, चालाकी, संक्रीण सोच, पीठ पीछे बुराई करने वाले, पाखण्डी, बुरी आदतों के आदी, जहाज के साथ जलमग्न होना, डूबना, रोगी स्त्री के साथ आनन्द लेना, अंगच्छेदन होना, डूबना, पथरी, कोढ, बल, व्यय,आत्मसम्मान, शत्रु, मिलावट दुर्घटना, नितम्ब, देश निकाला, विकलांग, खोजकर्ता, शराब, झगडा, गैरकानूनी, तरकीब से सामान देश से अन्दर बाहर ले जाना, जासूसी करना, आत्महत्या, विषैला, विधवा, पहलवान, शिकारी, दासता, शीघ्र उत्तेजित होने इत्यादि का कारक होता है।

कौन कौन से दोष आ जाते हैं, राहु खराब होने पर :-

Online Astrologer – Acharya Dr MSD Arya

जैसे की कहा जाता है, पीपल की छाया में सोने वाले को किसी भी प्रकार का रोग नहीं होता परंतु यदि बबूल की छाया में सोते रहें तो श्वास रोग या चर्म रोग हो सकता है।

इसी प्रकार ग्रहों की छाया का भी हमारे जीवन पर प्रभाव पढ़ता है। नवग्रहों में राहु ग्रह हमारी बुद्धि भ्रमित करता है, लेकिन जो चतुराई हमारी बुद्धि में पैदा होती है, उसका कारक भी राहु ही है। ज्योतिष शास्त्र में राहु के दोषपूर्ण या खराब होने पर जातक चतुराई से घोटाले तो करता है, परंतु एक दिन अपने ही बुने जाल में बुरी तरह फंस जाता है।

क्यों होता है राहु खराब ? :-

Life Prediction

1 :- यदि कोई व्यक्ति अपने गुरु या फिर अपने धर्म का अपमान करता है, तो उस व्यक्ति का राहू ग्रह अवश्य बुरा फल देता है।

2 :- यदि कोई व्यक्ति शराब का सेवन नियमित करता है, या फिर पराई स्त्री के साथ सम्बन्ध बनाने की इच्छा रखता है, तो उसका राहू ग्रह अवश्य बुरा फल देता है।

3 :- यदि कोई व्यक्ति ब्याज वाले पैसों का प्रयोग घर में करता है तो, उस व्यक्ति का राहू ग्रह अवश्य बुरा फल देता है।

4 :- यदि कोई व्यक्ति चतुराई से किसी को धोखा देता है, और झूठ बोलने की आदत को नहीं छोड़ता तो उस व्यक्ति का राहू ग्रह बुरा फल देता है।

5 :- यदि कोई व्यक्ति हमेशा तामसिक भोजन करता है तो, उस व्यक्ति का राहू ग्रह बुरा फल देता है।

6 :- यदि कोई व्यक्ति खाना हमेशा घर से बाहर खाता है, या बाहर का खाना हमेशा खाता है तो, उस व्यक्ति का राहू ग्रह बुरा फल देने लगता है।

खराब राहु को कैसे पहचानेगे ? :-

Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya

1 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके ससुर, साले या साली से झगडा बढ़ने लगेगा।

2 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके सोचने की ताकत कम हो जायेगी।

3 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके जीवन में शत्रु बढ़ जायेंगे, और सोचने की क्षमता कम होने लगती है।

4 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके साथ दुर्घटना, पुलिस केस, या पत्नी के साथ लड़ाई झगडे में बढ़ोत्तरी हो जायेगी।

5 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो वो व्यक्ति छोटी छोटी बातों पर गुस्सा होने लगता है, और लोगों के साथ सही तालमेल नहीं बिठा पाता है।

6 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उस व्यक्ति का एक तरह से दिमाग खराब होने लगता है, और उस व्यक्ति के सर में फालतू में छोटी छोटी चोट लगने लगती है या चक्कर आते हैं।

7 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो वह व्यक्ति अधिक मदिरापान या फिर सम्भोग/हस्तमैथुन की तरफ भागने लगता है।

8 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो व्यक्ति नीच हरकते करने लगता है, और निर्दयी हो जाता है।

Career Report : One Year

राहु ग्रह खराब होने से होने वाले रोग :-

1 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो सबसे पहले उसको गैस से सम्बन्धित शिकायत बढ़ने लगती है।

2 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके बाल झड़ने लगते हैं, तथा बवासीर से सम्बन्धित भी समस्या होने लगती है।

3 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो वो जातक पागलों की तरह व्यवहार करेगा और लगातार मानसिक तनाव में रहेगा।

4 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके नाखून अपने आप ही टूटने लगते हैं और व्यक्ति के सर में पीड़ा या दर्द बनी रहती है।

5 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उस व्यक्ति को अचानक पता चलेगा की मुझे कोई बीमारी है और उस पर पैसा भी खूब खर्चा होगा तथा व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है।

राहु के शुभ होने पर

Married Life Report

व्यक्ति दौलतमंद होगा। कल्पना शक्ति तेज होगी। रहस्यमय या धार्मिक बातों में रुचि लेगा। राहु के अच्छा होने से व्यक्ति में श्रेष्ठ साहित्यकार, दार्शनिक, वैज्ञानिक या फिर रहस्यमय विद्याओं के गुणों का विकास होता है। इसका दूसरा पक्ष यह कि इसके अच्छा होने से राजयोग भी फलित हो सकता है। आमतौर पर पुलिस या प्रशासन में इसके लोग ज्यादा होते हैं।

राहु को प्रसन्न करने के उपाय

Prashna Kundli by Acharya Arya

राहु बीज मन्त्र: ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम: (108 बार)

पक्षियों को प्रतिदिन बाजरा खिलाएं.

एक नारियल ग्यारह साबुत बादाम काले वस्त्र में बांधकर बहते जल में प्रवाहित करें.

अपने घर के नैऋत्य कोण में पीले रंग के फूल अवश्य लगाएं.

तामसिक आहार व मदिरापान बिल्कुल न करें.

अपने पास सफेद चन्दन अवश्य रखना चाहिए. सफेद चन्दन की माला भी धारण की जा सकती है. प्रतिदिन

सुबह चन्दन का टीका भी लगाना चाहिए. अगर हो सके तो नहाने के पानी में चन्दन का इत्र डाल कर नहाएं.

हाथी को हरे पत्ते, नारियल गोले या गुड़ खिलाएं.

अधिक जानकारी के लिए आचार्य आर्य +91 99999 54145 पर सम्पर्क करें…

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Medicine Bath Report https://www.astrologyofmylife.com/medicine-bath-report/ https://www.astrologyofmylife.com/medicine-bath-report/#respond Fri, 27 Dec 2019 08:02:42 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=12352 अपनी राशि अनुसार कौनसा औषधि युक्त स्नान करना चाहिए जिसके बारे में आप जरूर जानना चाहेगे। 1. मेष- मंगल प्रधान होने के कारण इस राशि के व्यक्तियों को पानी में बिल्वपत्र के वृक्ष की छाल और चंदन का चूर्ण मिलाकर स्नान करना चाहिए। 2. वृष- वृष राशि शुक्र होने के कारण सुगंधित कपूर काचरी, इलायची, …
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अपनी राशि अनुसार कौनसा औषधि युक्त स्नान करना चाहिए जिसके बारे में आप जरूर जानना चाहेगे।

1. मेष- मंगल प्रधान होने के कारण इस राशि के व्यक्तियों को पानी में बिल्वपत्र के वृक्ष की छाल और चंदन का चूर्ण मिलाकर स्नान करना चाहिए।
2. वृष- वृष राशि शुक्र होने के कारण सुगंधित कपूर काचरी, इलायची, चन्दन की थोड़ी सी मात्रा पानी में मिलाकर स्नान करना चाहिए।

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3. मिथुन- मिथुन राशि के जातक बुध ग्रह से प्रभावित होते हैं अतः बुध को प्रसन्न करने के लिए गाय का गोबर जल से स्पर्श कर के स्नान करना चाहिए।
4. कर्क- कर्क राशि वाले व्यक्ति चन्द्र ग्रह से प्रभावित होते हैं। इनको अपने स्नान के जल मे सफेद चंदन की थोड़ी सी मात्रा डालकर स्नान करना चाहिए।

Varshphal Report

5. सिंह- सिंह राशि वाले जातक सूर्य ग्रह से प्रभावित होते हैं। आपको स्नान के जल में लाल पुष्प और केसर मिलाकर स्नान करना चाहिए।
6. कन्या- कन्या राशि बुध ग्रह से प्रभावित होने के कारण से पन्ना रत्न या विधायरा की जड़ के जल से स्नान करने से बुध ग्रह का प्रभाव पड़ेगा।
7. तुला- यह राशि शुक्र प्रधान है। ऐश्वर्य एंव धन की प्राप्ति के लिए आपको मोगरे के पुष्प, गुलाब जल व चांदी को जल में मिलाकर स्नान करना चाहिए।

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8. वृश्चिक- जलतत्व की राशि होने से आपको लाल गुलाब, मुंगा रत्न डालकर उस जल से स्नान करना चाहिए। मुंगा न मिलने पर इस रंग के पुष्प ले सकते हैं।
9. धनु- गुरु की राशि होने से मालती के फूल या हल्दी मिले जल से स्नान करने से गुरु का शुभ प्रभाव मिलता है।
10. मकर- शनि ग्रह की प्रसन्नता के लिए स्नान के जल में काले तिल, काले उड़द जल में मिलाकर उपयोग करना चाहिए।

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11. कुंभ- राशि स्वामी शनि होने से आपको शमी वृक्ष की लकडी, बिच्छुआ की जड़, तेलिया उड़द पानी में मिलाकर स्नान करना शुभ रहेगा।
12. मीन- जलतत्व प्रधान राशि होने से सुख, समृद्धि एंव ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए जल में मोगरे के फूल, पीली सरसो, गेंदे के पुष्प को डाल कर स्नान करने से गुरु के शुभ प्रभाव मिलते हैं।

Gemstone Suggestion

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Know Your Personality According to Zodiac Sign https://www.astrologyofmylife.com/know-your-personality-according-to-zodiac-sign/ https://www.astrologyofmylife.com/know-your-personality-according-to-zodiac-sign/#respond Fri, 27 Dec 2019 07:40:48 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=12347 किस वार को आपका जन्म हुआ है? जानिए अपना व्यक्तित्व राशि के अनुसार …. आप अपने जन्म कुंडली और राशि के अनुसार जान सकते हैं अपना व्यक्तित्व और भविष्य की विशेष जानकारी और उससे जुड़ा हुआ खास योग . मेष – समझदारी से स्थिति को संभालिए, कार्यस्थल पर स्थिति प्रतिकूल हो सकती है। आपके अच्छे …
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किस वार को आपका जन्म हुआ है? जानिए अपना व्यक्तित्व राशि के अनुसार ….

आप अपने जन्म कुंडली और राशि के अनुसार जान सकते हैं अपना व्यक्तित्व और भविष्य की विशेष जानकारी और उससे जुड़ा हुआ खास योग .

मेष –

समझदारी से स्थिति को संभालिए, कार्यस्थल पर स्थिति प्रतिकूल हो सकती है। आपके अच्छे स्वभाव के कारण आपको अच्छी आमदनी होने वाली है।
संपत्ति विवाद को जल्दी से निपटा लें अन्यथा स्थिति बिगड़ सकती है।

घरेलू मोर्चे पर परिवर्तन से आपको खुशी मिलेगी।
कमाई के अन्य स्रोत से मोटी आमदनी आने वाली है। कार्यस्थल पर स्थिति आपके पक्ष में रहेगी। अच्छे स्वास्थ्य के लिए किया गया प्रयास सफल होगा।
शुभ अंक : 15 शुभ रंग : सफेद

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वृषभ-
स्थिति से समझौता नहीं करने की वजह से कार्यक्षेत्र में आपको छटपटाहट हो सकती है। किसी मजबूरी की वजह से आप पारिवारिक समारोह में शामिल नहीं हो पाएंगे।

किसी बीमारी में घरेलू उपचार करना आपके लिए विशेष लाभदायी साबित होने वाला है। छुट्टी के दरमियान आपके जीवन में कोई आ सकता है। आपको प्यार होने वाला है, दिल थामकर बैठिए।
शुभ अंक : 8 शुभ रंग : बैंगनी

मिथुन –
कार्यस्थल पर आपके कामकाज की शैली पर सवाल उठाए जा सकते हैं इसलिए तैयार रहें। शैक्षणिक मोर्चे पर आपको अपना दिमाग शांत रखने की जरूरत है, नहीं तो आपका प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है।

घर में तनाव रहेगा। घर का कोई सदस्य अस्वस्थ भी हो सकता है। जीवनसाथी के साथ वक्त गुजारने से तनाव कम हो सकता है। कुछ लोगों को नौकरी में तरक्की मिल सकती है। शुभ अंक : 9 शुभ रंग : भूरा

Horoscope

कर्क –
रुकावटों को दूर करने में आप सक्षम हो सकते हैं। शैक्षणिक मोर्चे पर बहुत शुभ रहने वाला है। किसी के द्वारा छोड़ी हुई परियोजना आपके कंधे पर आ सकती है। दोस्तों से मुलाकात की संभावना है।

आपकी खूबियों की वजह से आपको कई सारा काम मिल सकता है जिसकी बदौलत आपकी आमदनी बढ़ने की संभावना है। रोमांटिक मोर्चे पर थोड़ा तनाव हो सकता है। शुभ अंक : 22 शुभ रंग : नीला

सिंह-
कार्यस्थल पर स्थिति आपके विपरीत रहेगी। आपको कुछ कठोर कदम भी उठाना पड़ सकता है। शैक्षणिक मोर्चे पर आपको किसी के साथ समझौता करना पड़ सकता है। घर में किसी के साथ बहस होने के कारण तनाव की स्थिति रहने वाली है। किसी सामाजिक समारोह की वजह से आपका काफी समय बर्बाद हो सकता है।

आप में से कुछ लोग किसी अपने की कंपनी के लिए मदद कर सकते हैं। संपत्ति का मुद्दा बिगड़ सकता है, लेकिन उसे कानूनी पचड़े में जाने से रोकें।
शुभ अंक : 5 शुभ रंग : हरा

Varshphal Report

कन्या-
शैक्षणिक मोर्चे पर आपके जुनून का सकारात्मक परिणाम मिल सकता है। कार्यस्थल पर आपकी काबिलियत का डंका बजेगा। बड़ी परियोजना मिल सकती है जिसके लिए आपको विदेश जाने का मौका मिलेगा। आपको किसी से प्यार हो सकता है।

घर की तलाश में लगे लोगों को पसंद का घर मिल सकता है, जो आपके बजट में होगा। पैसे को लेकर आपको थोड़ा सख्त होना होगा। समाज को नजरअंदाज करना सही नहीं होगा। स्वास्थ्य को लेकर सजग रहें।
शुभ अंक : 3 शुभ रंग : गहरा पीला

तुला –
मेहनत और काम के प्रति समर्पण की बदौलत आपको अपने काम में कामयाबी मिल सकती है। शैक्षणिक स्तर पर किसी प्रोजेक्ट में आप व्यस्त रहेंगे। घर में किसी युवक की सफलता से घर के सदस्यों का सिर ऊंचा हो सकता है।

आर्थिक मोर्चे पर आप मजबूत स्थिति में होंगे।
आप रोमांटिक मूड में रहेंगे। संपत्ति खरीदने से बचें। स्वास्थ्य सामान्य बना रहेगा।
शुभ अंक : 17 शुभ रंग : हरा

Matchmaking – Acharya Dr MSD Arya

वृश्चिक-
आप में से कुछ लोग नए करियर की शुरुआत कर सकते हैं। कार्यस्थल पर आप कई काम एकसाथ पूरा कर सकते हैं। सामाजिक स्तर पर आपको बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। इससे पहले कि आप बदनाम हों,
उसे खारिज कर देना सही होगा।

कुछ लोग ऑफिशियल काम से शहर से बाहर यात्रा पर जा सकते हैं। कोई नई संपत्ति खरीदे जाने के संकेत हैं। घरेलू मोर्चे पर आपको जिसके साथ की जरूरत है, वो आपकी मदद कर सकता है। स्वास्थ्य सामान्य बना रहेगा।
शुभ अंक : 17 शुभ रंग : गहरा मरकत

Career Report : One Year

धनु-
आप काफी व्यस्त रहने वाले हैं। शैक्षणिक स्तर पर किसी प्रोजेक्ट को पूरा करने में व्यस्त रह सकते हैं। पेशेवर मोर्चे पर निर्णय देने से पहले सारे तथ्य इकट्ठा कर लें।

प्रेमी चिंतित रह सकते हैं। मनोदशा बदलने की कोशिश करें। कोई बड़ा घरेलू उपकरण खरीदने का मन बना सकते हैं, खरीदने से पहले सावधानी रखना हितकर होगा। शुभ अंक : 10 शुभ रंग : नीला

मकर –
घर खरीदने के लिए लोन लेने की तरफ कदम बढ़ा सकते हैं। आपके ऊपर वो काम करने के लिए जोर दिया जा सकता है जिसे लेकर आप आशंकित हैं,
लेकिन ठंडे दिमाग से सोचने पर आप कदम बढ़ा सकते हैं। शुभ अंक : 11 शुभ रंग : दूधिया

कुंभ –
आपके लिए बहुत अच्छा रहने वाला है। पेशेवर मोर्चे पर जिस सफलता का आपको इंतजार था, वो संभव हो सकता है। शैक्षणिक मोर्चे पर आपकी असाधारण उपलब्धि आपकी प्रतिष्ठा बढ़ा सकती है।

आपको विरासत में धन या पैसा मिल सकता है। शादीयोग्य लोगों की जल्दी ही शादी हो सकती है। आपको किसी के प्रति प्यार का एहसास हो सकता है। किसी शहर का दौरा आपके लिए मजेदार होने वाला है।
शुभ अंक : 4 शुभ रंग : नीला

Gemstone Suggestion

मीन
स्वयं के हित के लिए आप घर का माहौल बिगाड़ सकते हैं। कुछ लोगों का प्यार धीरे-धीरे परवान चढ़ रहा है। विदेश जाने का आपका सपना पूरा होने वाला है।

संपत्ति खरीदने के लिए आप सभी औपचारिकता पूरी कर सकते हैं। पेशेवर स्तर पर आप जो भी फैसला लेते हैं,
उसकी जानकारी अपने वरिष्ठ को देना हितकर होगा। पैसा निवेश करने से पहले सबसे राय ले सकते हैं, पर फैसला अपने मन से ही करेंगे।
शुभ अंक : 3 शुभ रंग : गहरा पीला

Signature Design

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Manglik Person Nature (Manglik Dosh) https://www.astrologyofmylife.com/manglik-person-nature/ https://www.astrologyofmylife.com/manglik-person-nature/#respond Fri, 27 Dec 2019 07:20:42 +0000 http://www.astrologyofmylife.com/?p=12340 मांगलिक जातक का स्वभाव (Manglik person Nature) कोई जातक चाहे वह स्‍त्री हो या पुरुष उसके मांगलिक होने का अर्थ है कि उसकी कुण्‍डली में मंगल अपनी प्रभावी स्थिति में है. Horoscope शादी के लिए मंगल को जिन स्‍थानों पर देखा जाता है वे 1,4,7,8 और 12 भाव हैं.इनमें से केवल आठवां और बारहवां भाव …
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मांगलिक जातक का स्वभाव (Manglik person Nature)

कोई जातक चाहे वह स्त्री हो या पुरुष उसके मांगलिक होने का अर्थ है कि उसकी कुण्डली में मंगल अपनी प्रभावी स्थिति में है.

Horoscope

शादी के लिए मंगल को जिन स्थानों पर देखा जाता है वे 1,4,7,8 और 12 भाव हैं.इनमें से केवल आठवां और बारहवां भाव सामान्य तौर पर खराब माना जाता है.सामान्य तौर का अर्थ है कि विशेष परिस्थितियों में इन स्थानों पर बैठा मंगल भी अच्छे परिणाम दे सकता है.

मांगलिक होने का विशेष गुण यह होता है कि मांगलिक कुंडली वाला व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी को पूर्ण निष्ठा से निभाता है,कठिन से कठिन कार्य वह समय से पूर्व ही कर लेते हैं,नेतृत्व की क्षमता,उनमें जन्मजात होती है,ये लोग जल्दी किसी से घुलते-मिलते नहीं परन्तु जब मिलते हैं तो पूर्णतः संबंध को निभाते हैं. (Manglik Person Nature)

Life Prediction

मांगलिक जातक कठोर निर्णय लेने वाला,कठोर वचन बोलने वाला,लगातार काम करने वाला,विपरीत लिंग के प्रति कम आकर्षित होने वाला,प्लान बनाकर काम करने वाला,कठोर अनुशासन बनाने और उसे फॉलो करने वाला,एक बार जिस काम में जुटे उसे अंत तक करने वाला,नए अनजाने कामों को शीघ्रता से हाथ में लेने वाला और किसी भी लड़ाई से नहीं घबराने वाला होता है.

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अति महत्वकांक्षी होने से इनके स्वभाव में क्रोध पाया जाता है परन्तु यह बहुत दयालु,क्षमा करने वाले तथा मानवतावादी होते है, गलत के आगे झुकना इनकी पसंद नहीं होता और खुद भी गलती नहीं करते.इन्हीं विशेषताओं के कारण गैर मांगलिक व्यक्ति अधिक देर तक मांगलिक के सानिध्य में नहीं रह पाता.

Shubh Muhurat

 

लग्न का मंगल व्यक्ति की व्यक्तित्व को बहुत अधिक तीक्ष्ण बना देता है,चौथे का मंगल जातक को कड़ी पारिवारिक पृष्ठभूमि देता है.सातवें स्थान का मंगल जातक को साथी या सहयोगी के प्रति कठोर बनाता है.

आठवें और बारहवें स्थान का मंगल आयु और शारीरिक क्षमताओं को प्रभावित करता है.इन स्थानों पर बैठा मंगल यदि अच्छे प्रभाव में है तो जातक के व्यवहार में मंगल के अच्छे गुण आएंगे और खराब प्रभाव होने पर खराब गुण आएंगे.जयोतीष परामर्श अवश्य लें

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(Manglik Person Nature)

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